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फर्स्‍ट एस्‍टेट की हैसियत हासिल कर चुका है मीडिया

 

भारतीय मीडिया इस समय खुद को सरकार और अदालतों दोनों की ओर से घिरा हुआ महसूस कर रहा है। इसे यह आभास हो रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं जानकारी प्राप्त करने के नागरिकों के अधिकार को तत्काल खतरा दरपेश है। यह कुछ हद तक वास्तविकता को बढ़ा-चढ़ा कर देखने वाला दृष्टिकोण है। वास्तविकता यह है कि तेजी से प्रगति कर रही सूचना टैक्नोलॉजी के बूते मीडिया ‘फोर्थ एस्टेट’ (चौथे पाए) की बजाय ‘फर्स्‍ट एस्टेट’ (प्रथम पाए) वाली हैसियत हासिल कर चुका है। तमाम क्षेत्राधिकारों में सेंध लगाती हुई इसकी ग्लोबल पहुंच ने इसे ऐसी प्रहारक क्षमता से लैस कर दिया है जो सरकारों व अदालतों को भी नसीब नहीं।

 

भारतीय मीडिया इस समय खुद को सरकार और अदालतों दोनों की ओर से घिरा हुआ महसूस कर रहा है। इसे यह आभास हो रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं जानकारी प्राप्त करने के नागरिकों के अधिकार को तत्काल खतरा दरपेश है। यह कुछ हद तक वास्तविकता को बढ़ा-चढ़ा कर देखने वाला दृष्टिकोण है। वास्तविकता यह है कि तेजी से प्रगति कर रही सूचना टैक्नोलॉजी के बूते मीडिया ‘फोर्थ एस्टेट’ (चौथे पाए) की बजाय ‘फर्स्‍ट एस्टेट’ (प्रथम पाए) वाली हैसियत हासिल कर चुका है। तमाम क्षेत्राधिकारों में सेंध लगाती हुई इसकी ग्लोबल पहुंच ने इसे ऐसी प्रहारक क्षमता से लैस कर दिया है जो सरकारों व अदालतों को भी नसीब नहीं।
 
अब तो स्थिति ऐसी है कि अफसरी ज्यादतियों एवं न्यायालयों द्वारा अधिकारों के सीमोल्लंघन के साथ ही अब मीडिया की स्वच्छंदता को भी शुमार करना होगा। अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने व परिणामस्वरूप कमाई में वृद्धि करने को ध्यान में रखते हुए मीडिया ने लोक-लुभावन स्वायत्तता (नागरिकों के कुछ भी जानकारी हासिल करने के निर्बाध एवं सर्वशक्तिमान अधिकार) के नाम पर न केवल गवर्नैंस बल्कि सामाजिक समरसता को भी अस्त-व्यस्त कर दिया  है। यहां तक कि इससे संस्थानों की विश्वसनीयता को चुनौती खड़ी हो गई है और अराजकता का खतरा पैदा हो गया है।
 
व्यक्ति की प्राइवेसी उसका अनमोल अधिकार है। हालांकि यह भी इसके समकक्ष ही स्वीकार्य एवं सुस्थापित है कि सार्वजनिक व्यक्तियों के निजी मामले हमेशा और पूरी तरह इस पर्दे के पीछे नहीं छिपाए जा सकते। इसी प्रकार प्रतिष्ठा भी व्यक्ति का एक अन्य अनमोल अधिकार है और यह किसी व्यक्ति विशेष अथवा संस्थान विशेष के बारे में लोगों की जानकारी पर आधारित होती है। अत: इसी कारण यह हर हालत में न केवल असंदिग्ध होनी चाहिए बल्कि देखने वालों को भी इस बात का आभास होना चाहिए।
 
यही कारण है कि संस्थागत प्राइवेसी एवं प्रतिष्ठाएं ऐसी चीज हैं कि यदि इन पर बिना सोचे-समझे तथा प्रासंगिक कानूनी प्रक्रियाएं अपनाए बिना मीडिया द्वारा सार्वजनिक रूप में दोषारोपण किया जाता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसलिए यह अनुमति कदापि नहीं दी जा सकती कि मीडिया जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहा है उसकी परिणति किसी उत्कंठा, पूर्वाग्रह या अनियंत्रित भीड़ द्वारा कानून के  हाथ में लेने के रूप में हो।
 
चूंकि बुद्धिमत्तापूर्ण एवं संतुलित रिपोटिंग एवं टिप्पणियों की मर्यादाओं का मीडिया के कुछ अंगों द्वारा उल्लंघन लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए किसी प्रकार के नियमन की आवाजें उठना कदाचित आश्चर्यजनक नहीं। स्व-नियंत्रण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन केवल इसी से ही काम नहीं चलेगा। यह अवधारणा भी पूरी तरह मनगढ़ंत है और समकालीन विश्व की वास्तविकताओं के प्रति किसी हद तक अज्ञानता की सूचक है।
 
लोकतांत्रिक समाजों में मीडिया का नियमन सर्वथा गैर-हाजिर है। नियंत्रण स्थापित करने के यदा-कदा दुर्भाग्यपूर्ण प्रयासों के बावजूद भारतीय मीडिया काफी हद तक विश्व के स्वतंत्रतम मीडिया में से एक है और ऐसी स्वच्छंदता हासिल कर चुका है जो चिंताजनक  है। मंत्रिमंडल के कागजात, फाइलों पर की गई टिप्पणियां, आयोगों की रिपोर्टें, कैग की जांच रिपोर्टें और प्रारंभिक आपराधिक जांच में हुई  प्रगति के समाचार अक्सर समय से पूर्व ही लीक कर दिए जाते हैं। अत: बिना सोचे-समझे इनका खुलासा किया जाता है।
 
इनमें से अधिकतर करतूतें स्पष्ट तौर पर हताश तत्वों या निहित स्वार्थों द्वारा किसी मुद्दे से ध्यान भटकाने, एजैंडे नए सिरे से तय करने,  बनावटी खतरों का ढोल पीटने और निर्दोष व भोले-भाले लोगों की कीमत पर लोकराय को रास्ते से भटकाने के लिए अंजाम दी जाती हैं। इसके बावजूद ‘व्हिसल ब्लोअर्स’ और विशेष परिस्थितियों में सचमुच के ‘सटिंग आप्रेटर्स’ को जनहित में सरंक्षण दिया जाना चाहिए।
 
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार प्रतिपादित किया है कि यदि ट्रायल कोर्ट के मैजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोप तय करने की प्रक्रिया खतरे में है तो वह न्याय के हित में उच्च अदालत को मुकद्दमे की संबंधित कार्रवाई मीडिया में जारी किए जाने पर रोक लगाने के लिए आवेदन कर सकता है। ऐसी बातें रोज-रोज तो देखने में आती नहीं हैं और ऐसा भी नहीं है कि वरिष्ठ अदालत आंखें मूंद कर निचली अदालत की प्रत्येक मांग स्वीकार कर लेगी। अदालतें मीडिया की स्वतंत्रता की प्रबल पक्षधर रही हैं और उन्होंने ही इसके दायरे एवं क्षेत्राधिकार को विस्तार दिया है। इसलिए अदालतों पर किसी दुर्भावना का आरोप लगाना बहुत ही बेहूदा एवं  बचकाना होगा।
 
इसकी तुलना में सुप्रीम कोर्ट का यह दिशा-निर्देश कहीं अधिक विवादास्पद है कि आर.टी.आई. आयोग की अदालती पीठों में न्यायिक  पृष्ठभूमि वाले लोगों को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि कानून एवं कानूनी व्याख्या के मामले अक्सर दरपेश आते हैं लेकिन आदेश भी अकारण जारी नहीं किया गया था। इस तरह के दिशा-निर्देशों का मकसद आर.टी.आई. आयोग की शक्तियां हड़पना नहीं बल्कि प्रक्रियाओं को युक्तिसंगत एवं सक्षम बनाना है।
 
इस बात का भी निपटारा होना चाहिए कि चयन समितियों का गठन कैसे किया जाएगा। इन मुद्दों पर चर्चा तो की जा सकती है लेकिन इन्हें सिरे से रद्द करना गलत है। नौकरशाह लम्बे-चौड़े एवं महान अनुभव वाले प्रशंसनीय व्यक्ति होते हैं लेकिन  बुद्धिमत्ता का पट्टा कोई उन अकेलों ने नहीं उठा रखा है।
 
प्रधानमंत्री के इस कथन पर भी कई एतराज उठे हैं कि आर.टी.आई. को प्राइवेसी के अधिकार पर हावी नहीं होने देना चाहिए और इस परेशान करने वाले प्रश्र पूछने और ‘मछलियों को फंसाने’ के अभियान हेतु प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी भी आधारहीन नहीं है। इसके अलावा उनकी यह टिप्पणी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि जनहित में सरकारी-निजी भागीदारी को भी किसी न किसी प्रकार के संरक्षण की जरूरत है ताकि सार्वजनिक हितों को आघात न पहुंचे हालांकि बिल्कुल ही आर.टी.आई.  के  दायरे  से बाहर  किए  जाने  पर नौकरशाह किसी बात के लिए जिम्मेदार ही नहीं ठहराए जा सकेंगे।
 
न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता वाले प्राइवेसी अधिकार विशेषज्ञ समूह ने कहा है कि व्यक्ति के निजता के अधिकार के उल्लंघन को माफ किया जा सकता है। यदि यह ‘पत्रकारिता के उद्देश्यों’ के व नागरिकों के जानकारी प्राप्त करने की भावना से किया गया हो।  हालांकि इस समिति ने यह तय करने की जिम्मेदारी प्रैस कौंसिल व भारतीय प्रसारण मानक संघों पर छोड़ दी है कि ‘सार्वजनिक उद्देश्य से’ उनका क्या अभिप्राय है। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया की परिणीति एक स्पष्ट आचार संहिता के रूप में होगी लेकिन स्वतंत्र प्रैस और निष्पक्ष मुकद्दमे की प्रक्रिया को सूक्ष्मता से संतुलित करना होगा।
 
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा की धांधलियों को ‘अनैतिक तो है लेकिन अवैध नहीं’ करार दिया। वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सोनिया के दामाद राबर्ट वाड्रा का यह कह कर बचाव किया कि वह अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद और अडवानी की बेटी के ‘काले कारनामों’ के  बारे में जानते हैं लेकिन अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध सार्वजनिक दूषणबाजी नहीं करेंगे। गडकरी और दिग्विजय दोनों का ही व्यवहार शर्मनाक है। क्या हम ऐसे व्यवहार को ही अपने सार्वजनिक जीवन की मर्यादा बनाएंगे?
 
इस्पात उद्योगपति जिंदल बनाम टी.वी. प्रकरण से यह सिद्ध हो गया है कि ‘सदा बहार शॄमदगी’ के तौर पर मीडिया में ‘पेड-न्यूज’ व प्राइवेट संधियों का बोलबाला है। हिमाचल में चुनाव शीघ्र होने वाले हैं और वहां उम्मीदवारों द्वारा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति के खुलासे किए गए हैं। कई मामलों में सम्पत्ति  में  दोहरी-तिहरी  वृद्धि  दिखाई  गई  है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस मामले में एक-दूसरे से आगे हैं। ये सम्पत्ति राजनीतिज्ञों ने कैसे जमा की है? क्या हिमाचल के सेब के पेड़ों पर पैसा लगता है? चुनाव के इस मौसम में ऐसा लगता है कि सेब भी सोना उगल रहे हैं।         
 
लेखक बीजी वर्गीज वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. पंजाब केसरी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.  
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