भड़ास4मीडिया से मैं एक सवाल पूछना चाह रहा था, आज मौका मिला। क्या पत्रकारिता राजनेताओं के भरोसे चलती है। मैं अपने बारें में बताता हूं, वैसे तो मैं पत्रकारिता से नहीं जुड़ा हुआ हूं लेकिन इसमें रूचि जरूर रखता हूं, इसलिए मैं अखबार और चैनल को ज्यादा महत्व देता हूं। सवाल करने का मकसद मेरा एक अनुभव है, जो मैंने राजस्थान के टीवी चैनल की खबरों में महसूस किया है। क्योंकि ज्यादातर ईटीवी को राजस्थान में देखा जाता है, लेकिन ये चैनल कौन नेता कहां जा रहा है, क्या कर रहा है, किस अधिकारी का जन्मदिन है, ये सब जानकारी ब्रेक्रिंग की पट्टी में देता है।
कोटा में 17 नंवबर को हुई घटना ने मुझे झकझोर भी दिया। असल में कोटा के एक कंपनी की मालकिन से प्रताडित होकर एक व्यक्ति ने फांसी लगा ली। घटना 17 नंवबर की सुबह की है। मृतक की पत्नी ने थाने में कंपनी की मालकिन के खिलाफ आरोप भी लगाए और यह मामला भी कैथूनीपोल थाने में चल रहा है। इस बात की खबर सभी चैनल वालों और अखबार वालों को मिली। कवरेज भी हुआ, लेकिन चली सिर्फ एक चैनल पर और छपी सिर्फ एक अखबार में। असल में जिस कंपनी का यहां जिक्र कर रहे हैं काफी रसूखदार हैं उसके मालिक और कोटा के ही एक दिग्गज नेता जी के साथ उनकी कंपनी की पार्टनरशिप है। तो खबर अखबार के संपादकों को और चैनल्स के ब्यूरो को कहकर रूकवा दी गई।
यह खबर न ही पत्रिका में छपी, न ही भास्कर में। यहां तक की ईटीवी और सहारा ने भी खबर दबा दी, लेकिन राजस्थान में नए-नए आए न्यूज चैनल इंडिया न्यूज ने ये खबर 17 की रात को ही प्रसारित कर दी थी और दूसरे दिन रात तक इस खबर का प्रसारण किया गया, जिससे कोटा के उद्योग जगत में हडकंप मच गया था। इसके बाद हिम्मत दिखाई दैनिक नवज्योति ने। नवज्योति के उस रिपोर्टर ने भी किसी दबाव में न आकर कंपनी की मालकिन के काले कारनामों की परतें उधेड़ दी। इतने चैनल और इतने अखबार होने के बाद भी किसी की मौत को दबा दिया गया ये कैसी पत्रकारिता है। कोटा सलाम करता है इंडिया न्यूज और दैनिक नवज्योति को, जो किसी दबाव में नहीं आए। लेकिन सवाल फिर वही की और चैनलों पर क्यों खबर नहीं दिखाई गई, ऐसा नहीं है कि ये पहला मामला हो। कई बार नेताओं के कहने से खबरे रूकती और चलती हैं।
ऐसे में मेरा आपसे निवेदन है कि आप अपने हिसाब से इस लेख को प्रकाशित करें जिससे लोगों, पत्रकारों और उन राजनेताओं तक ये मैसेज जाए कि पत्रकारिता किसी के दबाव में नहीं होती है और इन मीडिया संस्थानों और इनके संपादकों को भी चाहिए कि वे किसी दबाव में न आकर अपना फर्ज पूरा करें, आखिर आस तो आप लोगों से ही है समाज को बदलने की। साथ ही सलाम इंडिया न्यूज के रिपोर्टर और नवज्योति के रिपोर्टर और प्रबंधन को। सधन्यवाद। जय हिंद।
रामेश्वर तपन
कोटा, राजस्थान





