अमर उजाला का बिकना जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए बहुत ही बुरी खबर है. इस बड़े टेकओवर के बाद तय हो गया है कि मीडिया की मंडी में वहीं टिक पाएगा जो अपने कर्मचारियों का खून चूसेगा, जो दलाली से पैसे बनाएगा, जो पत्रकारिता के जरिए दूसरे गोरे-काले धंधे करेगा. अगर तकनीकी तौर पर देखे तो अमर उजाला के मुश्किलों की शुरुआत उसी समय हो गई थी जब अग्रवाल और माहेश्वरी परिवार अलग हो गए थे. पर इस पर सबसे बड़ा वज्र तब गिरा जब कंपनी के तेज तर्रार डाइरेक्टर अतुल माहेश्वरी का असमय निधन हो गया.
इसके बाद से ही अमर उजाला जैसा बड़ा संस्थान डोलने-डगमगाने लगा था. राजुल माहेश्वरी तथा अतुल के पुत्र इस बड़े वेंचर को संभाल नहीं पाए. डीवी शॉ से लिए गए कर्ज ने कंपनी की नींव हिला दी. कंपनी के डाइरेक्टरों ने तमाम प्रयास के बाद ही अमर उजाला को बिकने से नहीं बचा सके. काफी समय पहले से ही अमर उजाला के बिकने की खबरें आ रही थीं. पर मीडिया में इस तरह की खबरें आए दिन उड़ती रहती हैं. कभी प्रभात खबर के बिकने की खबर आती है तो कभी किसी और अखबार के, इसलिए इन खबरों की पुष्टि नहीं हो पाने चलते इन खबरों के प्रकाशन से बचा जा रहा था, पर अब सबकुछ तय हो चुका है.
अब इस सौदे की आधिकारिक घोषणा बाकी रह गई है, जो तमाम कानूनी अड़चनों को पूरा होने के बाद कभी भी की जा सकती है. अमर उजाला के बिकने से तय हो गया कि हर चीज बिकने के दौर में जनसरोकार के लिए कहीं भी जगह नहीं बच गया है. ना तो मीडिया में और ना राजनीति या समाज में. टिकेगा वही जो दौर में गलत को सही और सही को गलत करेगा. मीडिया संस्थानों में पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मियों के भीषण शोषण के दौर में भी अमर उजाला में कर्मचारियों का अन्य संस्थानों से बेहतर ख्याल रखा जाता था. अन्य अखबारों से बेहतर सैलरी यह संस्थान अपने पत्रकारों को देता था, इसके बाद भी यह खुद को बिकने से नहीं बचा पाया.