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बदतर स्थिति में जा रहा है हिंदुस्‍तान, धनबाद

 

मीडिया जगत के लिए एक बुरी खबर है। धनबाद से प्रकाशित हिन्दुस्तान की स्थिति डगमगा रही है। यहां व्याप्त आन्तरिक कलह ऐसा कि एक-दूसरा विभाग एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाता। बस चल रही है कमाओ खाओ वाली नीति। तुम भी कमाओ और हम भी कमायें। हाल के वर्षों में यह सब डेवलप हुआ है। इससे अखबार की साख गिर रही है। बाघमारा के विधायक ढुल्लू महतो प्रकरण में हिन्दुस्तान की काफी छीछालेदर हुई थी। जिसमें प्रभात खबर ने बाजी मारी। सिंह मेंशन के नीरज कुमार जब चुनाव मैदान में उतरे तो उनके साथ भी सपोर्ट का छल कर उगाही की गयी। यह सब यहां की जनता की जुबान पर है।  धनबाद से हिन्दुस्तान का प्रकाशन मात्र 23 हजार कापियों से वर्ष 2002 से प्रारंभ हुआ था। मात्र तीन जिले धनबाद, गिरिडीह और बोकारो में सिमटा धनबाद एडीशन एक ही साल में पचास हजार सर्कुलेशन को पार कर गया। प्रभात खबर तो पीछे रहा ही, जागरण भी हिन्दुस्तान की बुलंदियों को न छू सका। 

 

मीडिया जगत के लिए एक बुरी खबर है। धनबाद से प्रकाशित हिन्दुस्तान की स्थिति डगमगा रही है। यहां व्याप्त आन्तरिक कलह ऐसा कि एक-दूसरा विभाग एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाता। बस चल रही है कमाओ खाओ वाली नीति। तुम भी कमाओ और हम भी कमायें। हाल के वर्षों में यह सब डेवलप हुआ है। इससे अखबार की साख गिर रही है। बाघमारा के विधायक ढुल्लू महतो प्रकरण में हिन्दुस्तान की काफी छीछालेदर हुई थी। जिसमें प्रभात खबर ने बाजी मारी। सिंह मेंशन के नीरज कुमार जब चुनाव मैदान में उतरे तो उनके साथ भी सपोर्ट का छल कर उगाही की गयी। यह सब यहां की जनता की जुबान पर है।  धनबाद से हिन्दुस्तान का प्रकाशन मात्र 23 हजार कापियों से वर्ष 2002 से प्रारंभ हुआ था। मात्र तीन जिले धनबाद, गिरिडीह और बोकारो में सिमटा धनबाद एडीशन एक ही साल में पचास हजार सर्कुलेशन को पार कर गया। प्रभात खबर तो पीछे रहा ही, जागरण भी हिन्दुस्तान की बुलंदियों को न छू सका। 
 
कोयलांचल के पत्रकार आज भी मानते हैं कि यह सब तक के ऐडीटोरियल हेड ज्ञानवर्द्धन मिश्र और यूनिट हेड एपी सिंह का कमाल था। कर्मियों की जुबान पर इनका ‘‘हाउ टू वर्क एंड हाउ टू कंट्रोल‘‘ का जुमला आज भी आ जाता है। आज की तारीख में हिन्दुस्तान का धनबाद एडीशन पांच जिले का हो गया है अर्थात इसके साथ दुमका और जामताड़ा को भी टैग कर दिया है। देवघर जिला कार्यालय से खबरें यहीं आती हैं और पेज बनता है लेकिन छप कर जाता है भागलपुर से। तात्पर्य यह कि जिस रफ्तार से प्रसार संख्या में वृद्धि होनी चाहिये थी वैसा हो नहीं सका और यह लाख के नीचे ही लटका है। प्रिन्ट आर्डर भले ही लाख के आसपास है लेकिन बाजार में सेल का ग्राफ तेजी से गिर रहा है। एजेंट को इतनी ‘सौगात‘ मिलती है कि कापी घटाने में उसे ही घाटा नजर आता है। 
 
मुख्यालय में बैठे अधिकारी और संपादक भले ही गदगद हों लेकिन सच्चाई यही है। ज्ञानवर्द्धन मिश्र छह वर्ष तक एडिटोरियल हेड रहे और इस अवधि में कंटेंट की बदौलत अखबार को नंबर वन पर बनाये रखा वह भी मात्र चार रंगीन पेज की बदौलत जबकि प्रभात खबर और जागरण प्रतिदिन आठ-दस पेज रंगीन पेज दे रहा था। इनके जाने के चार वर्ष की छोटी अवधि में ही दो आरई आये और गये और अब तीसरे आरई कमान सम्हाल रहे हैं। लेकिन आशातीत परिणाम दिख नहीं रहा है। इसी प्रकार यूनिट हेड श्री सिंह के हटाये जाने के बाद तीसरे यूनिट हेड दुश्मनों से लोहा ले रहे हैं। हिन्दुस्तान के धनबाद एडीशन के लड़खड़ाने के पीछे यहां कार्यरत कर्मचारियों का अचानक निकल जाना भी रहा है। 
 
कोयलांचल के इन्साइक्लोपीडिया माने जाने वाले रंजन झा, अजय सिन्हा, संजीव कुमार झा, मृत्युंजय पाठक, प्रदीप सुमन, दीपक सवाल, अभय कुमार को कंपनी ने तबज्जो ही नहीं दिया। संजीव झा को छोड़ बाकी छह-छह वर्ष खटने के बाद भी स्ट्रिंगर ही रहे, इन्हें स्टाफर नहीं बनाया गया। धनबाद से रिकमंडेशन जाते रहे लेकिन रांची में ही अटक जाता रहा। बड़ों के इशारे पर टीम भावना को खंडित करने का कुचक्र भी चलता रहा। नतीजा हुआ कि हिन्दुस्तान की बगिया को सींचने वाले ये लोग इस्तीफा देकर निकल गये और आज धनबाद में ही प्रभात खबर और जागरण में दुगुने-तिगुने वेतन पर कार्यरत हैं। यही नहीं स्वयंप्रकाश, अनुराग कश्यप, शैलेन्द्र कुमार सिंह, सियाराम, चुन्नूकांत जैसे एक्सपर्ट ने भी हिन्दुस्तान से निकल जाना ही बेहतर समझा। आज ये सब कहीं स्टेट हेड हैं तो कहीं आरई या ब्यूरो हेड। यही नहीं मैनेजमेंट साइड से यूनिट हेड एपी सिंह के अलावा मीडिया मार्केटिंग इंचार्ज चेतन आनंद, मनीष कुमार, उपेन्द्र कुमार, सुनील वर्मा आदित्य कुमार, अनिमेष सिंह भी हिन्दुस्तान से निकल लिये। अधिसंख्य लोग प्रभात खबर के अंग बने हैं।
 
हिन्दुस्तान मैनेजमेंट को इस बात की गोपनीय जांच करानी  चाहिये कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हुई जिसमें ज्ञानवर्द्धन मिश्र और एपी सिंह के साथ-साथ इन अनुभवी लोगों को हिन्दुस्तान छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। लड़खड़ाते हिन्दुस्तान की स्थिति सुधर सकती है। बशर्ते प्रधान संपादक शशिशेखर और वाइस प्रेसिंडेंट अमित चोपड़ा 2005 की टीम को एक साथ एबजार्ब कर लें और देखें कि उनकी यह लवली यूनिट रांची एडीशन को कैसे पीछे करती है। मुनाफे में चल रही कंपनी को सैलरी मद में थोड़ा पैसा लगाना तो पड़ेगा लेकिन एचटीएमवीएल प्रबंधन का यह फैसला न केवल कोयलांचल बल्कि समूचे झारखंड की मीडिया सर्किल में धमाका पैदा कर देगा।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजा गए पत्र पर आधारित.  
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