भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को हटाना जितना फजीहत भरा काम है उससे कम उन्हें बनाये रखना भी नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पार्टी को अपने अध्यक्ष को लेकर ही इतनी फजीहत का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाने वाली भाजपा खुद ही अपने अध्यक्ष के कारनामों को लेकर घिर गयी है। भले ही पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने से मना कर दिया हो मगर यह सभी मान रहे हैं कि नितिन गडकरी अब कुर्सी पर ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं रह गये हैं।
भारतीय जनता पार्टी का यह दुर्भाग्य है कि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष को दुबारा भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। इससे पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण एक स्टिंग आपरेशन में एक लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए कैमरों पर दिख चुके है। इन्हीं आरोपों के चलते अभी कुछ दिन पहले ही वह जेल से रिहा हुए हैं। इस घटना को काफी समय बीत चुका। मगर जब भी भ्रष्टाचार की बात होती है तब-तब लोग बंगारू लक्ष्मण का नाम लेना नहीं भूलते। यह बात पार्टी को हमेशा असहज स्थिति में ला देती है।
भाजपा किसी तरह इन आरोपों से पीछा छुड़ा ही पायी थी कि पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की कम्पनी ‘‘पूर्ति‘‘पर लगे आरोपों ने एक बार फिर बंगारू लक्ष्मण की याद लोगों के जहन में ताजा कर दी है। इन आरोपों के बाद पूरी पार्टी सकते की हालत में आ गयी है। किसी नेता को नहीं सूझ रहा कि वह इन आरोपों पर क्या जवाब दे। जब पूर्ति कम्पनी के कागजातों की जांच शुरू हुई तो एक के बाद एक कई घोटाले सामने आने लगे। इस कंपनी में निवेश करने वाले कई कम्पनियों के निदेशकों के नाम और पते ही फर्जी निकले। मजे की बात यह रही कि कोई निदेशक गार्ड निकला तो कोई ड्राइवर। जाहिर था यह सब घोटाला करने के लिए फर्जी तरीके से तैयार किया गया था।
इसके अलावा यह बात भी सामने आयी कि गडकरी ने खुद लोकनिर्माण मंत्री रहते जिस कंपनी को करोड़ों का ठेका दिया था उसी ठेकेदार की कंपनी ने गडकरी को करोड़ों का कर्ज दे दिया। यह बात सभी जानते हैं कि किस तरह ठेका मिलता है और किस तरह ठेकेदार नेताओं को कर्जा देते हैं। यह सारे गडबड़झाले किसी बड़ी या व्यापारिक कंपनी में होते तब भी सही था, यह सारे काले कारनामे उस व्यक्ति की कंपनी में हो रहे थे जो देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष है। अभी इन सब घोटालों से भाजपा उबर भी नहीं पायी थी कि नितिन गडकरी ने स्वामी विवेकानंद के आईक्यू की तुलना दाउद इब्राहिम से करके मानों बम फोड़ दिया। यह पार्टी के लिए बेहद आघात पहुंचाने वाली बात थी। इस बयान के बाद देश भर में भारी हंगामा हुआ। बाद में भारी दबाव के बाद हालांकि गडकरी ने इस बयान के लिए खेद तो व्यक्त कर दिया था मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी बौद्धिक रूप से कितने सक्षम हैं इसका उदाहरण वह पहले भी अपने व्यापार के बारे में बताते हुए जता चुके हैं। उन्होंने चीनी से संबंधित अपने व्यापार के लिए कहा कि चीनी बनाने से ज्यादा कमाई शराब के लिए एल्कोहल बनाने में होती है और विजय माल्या की शराब की कंपनियों में उन्हीं का एल्कोहल सप्लाई होता है। इस बात से भी भाजपा के लोग भौंचक्के थे मगर राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ भला कोई क्या बोल सकता था। इससे पहले उन्होंने एक बड़ी रैली में कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए लोगों से कहा था कि याद है न ‘‘अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में। उनका मतलब कांग्रेस को वोट देने का था मगर दादा कोंणके के इस वाक्य के क्या अर्थ निकाले जा सकते है यह कोई सहज ही सोच सकता है। इस अश्लील वाक्य ने पूरी पार्टी को शर्मिंदा कर दिया था। स्वामी विवेकानंद के बयान के बाद जिस तरह राम जेठमलानी खुलकर गडकरी के खिलाफ आये और उनके पुत्र महेश जेठमलानी ने राष्ट्रीय कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया उससे साफ था कि पार्टी में बगावत शुरू हो गयी है। माना जा रहा था कि जेठमलानी के पीछे खुद नरेन्द्र मोदी हैं जिन्हें अरूण जेटली और सुषमा स्वराज का भी समर्थन हासिल है।
मगर नितिन गडकरी अध्यक्ष बने ही इसलिए है क्योंकि उन्होंने संघ के बड़े से बड़े प्रचारकों को बढिय़ा लजीज खाना खिलाया है। इस बार भी संघ को लगा कि इस तरह बेइज्जत होकर नितिन गडकरी को हटाने से गलत संदेश जायेगा लिहाजा संसद के शीतकालीन सत्र तक गडकरी को बनाये रखने का संदेश दिया है। माना जा रहा है इसके बाद गडकरी की सम्मानजनक विदाई का रास्ता खोजा जायेगा। मगर इन सबसे पार्टी का बहुत नुकसान हो रहा है। पी7 न्यूज चौनल के यूपी के ब्यूरोचीफ ज्ञानेन्द्र शुक्ला का मानना है कि राजनैतिक शुचिता का यह पैमाना है कि इतने गंभीर आरोपों के बाद गडकरी को खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए था। इससे पार्टी की फजीहत कुछ बच सकती थी। वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का मानना है कि यह राजनीति में बहुत खतरनाक संदेश

है। इसका अर्थ साफ है कि जिसके पास पूंजी होगी राजनीति वही करेगा। भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू होकर रह गये हैं। बिजनेस स्टैर्डड के यूपी के ब्यूरो प्रमुख सिद्धार्थ कालहंस का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी का असली चरित्र इन आरोपों के बाद सामने आया है। जिस तरह गडकरी ने अपनी कंपनी में करोड़ों रुपये की हेरा फेरी की है उसके बाद तो भाजपा को तत्काल गडकरी को हटा देना चाहिए था। मगर उन्हें बनाये रखने के संदेश से साफ है कि भ्रष्टाचार अब भाजपा के लिए भी कोई मायने नहीं रखता।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.