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आदिवासी प्रदेश के विवि में आदिवासियों के लिए जगह नहीं

: रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में सामने आयी गडबड़ी : इसे विवि की लापरवाही कहिये या फिर शासन की कमजोरी कि आदिवासी बाहुल्य वाले राज्य छत्‍तीसगढ़ में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अपने ही प्रदेश में संविधान में वर्णित आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। शासन द्वारा विशेष वर्गों में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के तमाम प्रयासों पर किस तरह पानी फेरा जा रहा है इसका उदाहरण पत्रकारिता विवि में पीएचडी कोर्स के  प्रवेश में बरती गई लापरवाही से सामने आ रही है। आरक्षित वर्ग के अनेक अभ्यर्थियों ने पीएचडी प्रवेश में आरक्षण रोस्टर का पालन नहीं करने के साथ धांधली का आरोप लगाया है। चयन से वंचित छात्रों ने छग राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग में मामले की शिकायत की है।

: रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में सामने आयी गडबड़ी : इसे विवि की लापरवाही कहिये या फिर शासन की कमजोरी कि आदिवासी बाहुल्य वाले राज्य छत्‍तीसगढ़ में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अपने ही प्रदेश में संविधान में वर्णित आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। शासन द्वारा विशेष वर्गों में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के तमाम प्रयासों पर किस तरह पानी फेरा जा रहा है इसका उदाहरण पत्रकारिता विवि में पीएचडी कोर्स के  प्रवेश में बरती गई लापरवाही से सामने आ रही है। आरक्षित वर्ग के अनेक अभ्यर्थियों ने पीएचडी प्रवेश में आरक्षण रोस्टर का पालन नहीं करने के साथ धांधली का आरोप लगाया है। चयन से वंचित छात्रों ने छग राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग में मामले की शिकायत की है।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि में हाल ही में शुरू किए गए पीएचडी कोर्स विवादों में घिर गया है। आरक्षित वर्गों के छात्रों ने विवि प्रशासन पर आरोप लगाया है कि पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में यूजीसी द्वारा निर्धारित नियमों की अनदेखी कर चयन सूची जारी किया गया है। छ.ग. के अभ्यर्थियों की बजाय आरक्षित सीटों में बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ देने का भी आरोप लगाया हैं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि नियुक्ति संबंधी मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ हैं कि जनसंचार विभाग में हाल ही में शुरू किया गया पीएचडी कोर्स को लेकर विवाद सामने आने लगा हैं।

विवि में पिछले तीन वर्षों से पीएचडी प्रवेश की प्रक्रिया जारी थी। यूजीसी मापदंडों के अनुरूप तथा अन्य कई खामियों की वजह से 2011 में उक्त प्रक्रिया पूरी हो पाई। इसके लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन भी किया गया। प्रवेश से वंचित छात्रों में निलीमा मिंज, जितेन्द्र सोनकर और नरेश कुमार साहू ने बताया कि विवि ने आरक्षण रोस्टर को दरकिनार कर दिया है। अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग आयोग को किए गए शिकायत में उनका कहना हैं कि यूजीसी द्वारा समस्त विवि में पीएचडी व एमफिल में प्रवेश के लिए गजट प्रकाशित करने का नियम बनाया हैं, यूजीसी 2009 नियम का जिक्र करते हुए छात्रा नीलिमा मिंज ने बताया कि उक्त नियम में स्पष्ट उल्लेख हैं कि पीएचडी के लिए संबंधित विवि राज्य के आरक्षण नियम का पालन करें और निर्धारित सीट का प्रचार प्रसार कर उतनी ही सीट पर प्रवेश दें, लेकिन विवि प्रशासन ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया और प्रवेश के दौरान आरक्षण सीट का उल्लेख नहीं किया।

शिकायतकर्ताओं का यह भी कहना हैं कि विवि ने आराक्षित सीट में अन्य राज्य के अभ्यर्थियों को प्रवेश दिया हैं, कुछ आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी ऐसे भी हैं जिनके अंक अधिक होने के बावजूद सामान्य वर्ग में उन्हें प्राथमिकता नहीं दी गई। शिकायतकर्ता ने छ.ग. में खासकर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि में आरक्षित वर्ग के साथ अन्याय का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की हैं। इधर अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग में भी शिकायत करते हुए छात्र जितेंद्र सोनकर, नरेश कुमार साहू ने कहा है कि पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में चहेतों को जान बूझकर लाभ पहुंचाया गया है। बताया गया कि ओबीसी की सीट पर अन्य राज्य के अभ्यर्थी को प्रवेश देकर छत्‍तीसगढिय़ों के हित को मार दिया गया है। जनसंचार विभाग से जब 6 सीट पर विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें आरक्षण उल्लेख होना चाहिए था लेकिन अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए 10 सीट में प्रवेश दिया गया हैं। सूचना का अधिकार से प्राप्त दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद अनुसूचित जाति के छात्र मनोज ने कहा कि अनुसूचित जाति के उम्मीदवार का अंक अधिक होने पर उसे सामान्य वर्ग में रखा जाना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

छात्रा नीलिमा का कहना हैं कि जनसंचार विभाग में पीएचडी के लिए कुल 59 अभ्यर्थी परीक्षा के लिए नामांकित किए गए थे, जिसमें से आदिवासी उम्मीदवारों में अनुसूचित जनजाति की वह अकेली उम्मीदवार थी। पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में विवि द्वारा यदि परीक्षा से पूर्व आरक्षण रोस्टर बना लिया जाता तो उनका दाखिला सुनिश्चित हो जाता। विवि ने परीक्षा में शामिल कर लिया, पर प्रवेश परीक्षा में फेल कर अनुसूचित जनजाति वर्ग के सीट को विलोपित करने जैसा काम किया। चूंकि इस वर्ग की वह अकेली छात्रा थी इस लिहाज से उसका प्रवेश बिना परीक्षा के निर्विरोध होना था, नहीं तो आरक्षित वर्ग की सीट रिक्त रखने चाहिए थी।

पत्रकारिता विवि में लंबे समय से पीएचडी प्रवेश की प्रक्रिया जारी थी, जिसके लिए अनेक छात्रों ने तैयारी की थी। खास बात यह है कि कुषाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि के उन डिग्रीधारियों छात्रों का दाखिला यहां नहीं हो सका जिन्हों ने यहां रहकर पढ़ाई किया जबकि अन्य राज्य के ओपन विवि से एक वर्षीय मास्टर डिग्री दूरवर्ती मोड से परीक्षा पास करने वाले ही विवि द्वारा आयोजित पीएचडी प्रवेश परीक्षा में पास हो सके हैं, जिनका दाखिला हुआ है उनका संम्बंध पहले से विवि से है। छात्रों का संदेह प्रवेश प्रक्रिया में धांधली का है।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पीएचडी कोर्स के लिए दस उम्मीदवारों का चयन किया गया। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी से खुलासा हुआ कि यूजीसी के निर्देशों और आरक्षण नियमों को ताक पर रख विश्वविद्यालय में प्रभाव रखने वाले पत्रकारों और अफसरों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाया गया है। कीर्ति सिसोदिया सामान्य वर्ग – मप्र, संजय कुमार ओबीसी- बिहार, राजेश कुमार ओबीसी- बिहार, राकेश कुमार पाण्डेय सामान्य- उप्र, उदय नारायण त्यागी एससी- मप्र, कमल ज्योति जाहिरे एससी- छग, विभाष कुमार झा- सामान्य छग, नृपेन्द्र कुमार शर्मा सामान्य- छग, राजेन्द्र मोहंती – सामान्य,उड़ीसा व रश्मि वर्मा एससी- दिल्ली के निवासी का चयन हुआ है। जबकि नियमों के तहत राज्य के संस्थानों में नौकरी और उच्च शिक्षा के लिए राज्य के आरक्षण रोस्टर का पालन करना अनिवार्य है।

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