महाराष्ट्र के दिवंगत नेता बाला साहेब ठाकरे को श्रद्धांजलि देने में अंग्रेजी टी.वी. और प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं रहा। उनकी भड़काऊ राजनीति, तानाशाही और हिंसक बयानबाजी का आलोचक रहा देश का अंग्रेजी मीडिया बाला साहेब की मौत पर उनका गुणगान करता नजर आया। इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। मरणोपरान्त हर जाने वाले की प्रशस्ति में कसीदे काढ़े जाते हैं पर महत्वपूर्ण बात यह है कि केसरिया चोगा पहनकर, गले में रुद्राक्ष की माला लटकाकर, छत्रपति शिवाजी महाराज की वैदिक ध्वजा फहराकर और सिंह के चित्र को दर्शाते हुए सिंहासन पर आरूढ़ होने वाले बाला साहेब ने एक प्रखर हिन्दूवादी छवि का निर्माण किया और उसे अंत तक निभाया।
इस छवि के बावजूद उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति को अपने इशारों पर नचाया। सत्ता में हों या बाहर उन्होंने अपना रुतबा कम नहीं होने दिया पर उनके व्यक्तित्व के इस हिन्दूवादी पक्ष को अंग्रेजी मीडिया ने दिखाने की कोशिश नहीं की। अंग्रेजी मीडिया अमूमन अपनी छवि धर्मनिरपेक्षता की बनाकर रखता है। इसीलिए जब-जब बाला साहेब ने प्रखर हिन्दूवादी तेवर अपनाया, तब-तब मुख्यधारा का मीडिया बाला साहेब के पीछे पड़ गया पर अब उनकी मौत पर उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष क्यों भुला दिया गया? यह सही है कि बाला साहेब का व्यक्तित्व व वक्तव्य विरोधाभासों से भरे होते थे पर उनकी इस हिन्दूवादी छवि ने उन्हें देश भर के उन हिन्दुओं का चहेता बनाया जो प्रखर हिन्दूवादी नेतृत्व देखना चाहते हैं।
छोटी-छोटी घटनाओं से बाला साहेब ने ऐसे कई संदेश दिए। जब मुम्बई के मुसलमान जुम्मे की नमाज अदा करने के लिए हर शुक्रवार मुम्बई की सड़कों पर मुसल्ला बिछाने लगे और मुम्बई पुलिस इस नई मुसीबत से निपट नहीं पा रही थी तो बाला साहेब ने हर शाम हर मन्दिर के सामने सड़क पर भीड़ जमा कर महाआरती करने का ऐलान कर दिया। नतीजतन दोनों पक्षों ने बिना हीलहुज्जत किए अपना फैलाव समेट लिया। बंगलादेशी शरणार्थियों के आकर बसने पर सबसे पहला विरोध बाला साहेब ने ही किया था।
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व रहा है जिसने हिन्दू वोट बैंक को भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा लेकिन हमेशा इस तरह के सख्त कदम उठाने से परहेज किया। इतना ही नहीं पूरे देश में राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन चलाने के बाद जब अयोध्या में विवादास्पद ढांचा गिरा तो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण अडवानी ने इसे शर्मनाक हादसा कहा जबकि बाला साहेब से जब पूछा गया कि इस ढांचे को गिराने में शिव सैनिकों का हाथ था तो उन्होंने तपाक् से कहा कि उन्हें अपने सैनिकों पर गर्व है।
दूसरी तरफ हिन्दू हक के हर मुद्दे पर कड़े तेवर अपनाने वाले बाला साहेब ने आपातकाल से लेकर राष्ट्रपति के चुनाव तक के मुद्दों पर कांग्रेस के साथ खड़े रहने में संकोच नहीं किया। इंका के वरिष्ठ नेता सुनील दत्त के फिल्मी सितारे बेटे संजय दत्त को रिहा कराने में वह आगे आए। इससे यह तो साफ है कि बाला साहेब ने जो ठीक समझा उसे ताल ठोंक कर किया चाहे किसी को ठीक लगे या गलत। इसलिए उनकी छवि एक प्रखर हिन्दूवादी नेता की बनी।
मुसलमानों को लुभाने की नाकाम कोशिशों में जुटा भाजपा नेतृत्व आज भी ऐसी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है इसलिए दुविधा कायम है। दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काफी हद तक बाला साहेब का अनुसरण करने की सफल कोशिश की है और उसका फल भी उन्हें मिला है। नरेन्द्र मोदी को भी मुख्यधारा के मीडिया ने धर्मनिरपेक्षता के तराजू में तोलकर बार-बार अपराधी करार दिया है पर हर बार मीडिया के आकलन से बेपरवाह मोदी ने अपना रास्ता खुद तय किया है।
बाला साहेब को श्रद्धांजलि देने गए भाजपा के नेताओं को इस मौके पर आत्म मंथन करना चाहिए। क्या वे इसी तरह भ्रम की स्थिति में रहकर आगे बढ़ेंगे या अपनी विचारधारा में स्पष्टता लाकर अपनी रणनीति साफ करेंगे। आज तो वे कांग्रेस की दसवीं कार्बन कॉपी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आते। उधर मीडिया को भी यह सोचना पड़ेगा कि इस लोकतांत्रिक देश में समाज के हर हिस्से और विभिन्न विचारधाराओं को एक रंग के चश्मों से देखना सही नहीं है।
धर्मनिरपेक्ष से लेकर साम्प्रदायिक लोगों तक और गांधीवादियों से लेकर नक्सलवादियों तक को अपनी बात कहने और अपनी तरह जीने का मौका भारत का लोकतंत्र देता है। इसलिए मीडिया की निष्पक्षता तभी स्थापित होगी जब वह समाज के विभिन्न रंगों की प्रस्तुति पूरी ईमानदारी से करे। एक कार्टून पत्रकार से महाराष्ट्र के शेर बनने तक की बाला साहेब की यात्रा हममें से बहुतों की विचारधारा के अनुरूप नहीं थी पर इस यात्रा के ऐसे आयामों के महत्व को कम करके आंका नहीं जा सकता।
पंजाब केसरी के लिए विनीत नारायण का लेख.