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खुलासों में पत्रकारिता के सरोकार

 

खुलासों के चलते मीडिया एक बार फिर भ्रष्ट मानसिकता वाले लोगों के निशाने पर हैं, इसमें नेता, कारोबारी सहित तमाम अफसर भी शामिल हैं, जो मीडिया पर लगाम लगाकर अपना कालिख भरा दामन छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी शुरुआत जी न्यूज-नवीन जिंदल विवाद के बाद हुई, जिसमें मीडिया के संपादकों की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं कि क्या पत्रकारिता में नए तरीके से जवाबदेही तय की जानी चाहिए? पत्रकारिता में प्रयोगवाद पर रोक लगाया जाना चाहिए? क्या पत्रकारिता मूल्यविहीन हो रही है? सिद्धांत और वसूलों के बिना लेखन या संपादन उचित है? और तो और टीवी पत्रकारिता पर पत्रकारिता मूल्यों को त्यागने तक का आरोप लग रहा है। रूपहले पर्दे से लेकर राजनेता तक मीडिया को घेरने में लगे हैं।

 

खुलासों के चलते मीडिया एक बार फिर भ्रष्ट मानसिकता वाले लोगों के निशाने पर हैं, इसमें नेता, कारोबारी सहित तमाम अफसर भी शामिल हैं, जो मीडिया पर लगाम लगाकर अपना कालिख भरा दामन छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी शुरुआत जी न्यूज-नवीन जिंदल विवाद के बाद हुई, जिसमें मीडिया के संपादकों की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं कि क्या पत्रकारिता में नए तरीके से जवाबदेही तय की जानी चाहिए? पत्रकारिता में प्रयोगवाद पर रोक लगाया जाना चाहिए? क्या पत्रकारिता मूल्यविहीन हो रही है? सिद्धांत और वसूलों के बिना लेखन या संपादन उचित है? और तो और टीवी पत्रकारिता पर पत्रकारिता मूल्यों को त्यागने तक का आरोप लग रहा है। रूपहले पर्दे से लेकर राजनेता तक मीडिया को घेरने में लगे हैं।
 
बात सरकार के भ्रष्टाचार को लेकर हो रहे केजरीवाल के खुलासों की करें या केजरीवाल पर भ्रष्टाचार नहीं उजागर करने का आरोप लगाने वाली निर्मला शर्मा की करें, अपनी बात कहने के लिए सभी मीडिया को और ज्यादा खुला बनाने की मांग करते हैं, लेकिन जब बात खुद पर लग रहे आरोपों की हो तो मीडिया को उसकी हद समझाई जाती है, इस मामले में सरकार अपने विज्ञापनों को हथियार बनाती है।
 
जीवन मूल्यों को बढ़ावा देने वाली पत्रकारिता लेखन का विकास सैकड़ों साल पुराना है। पत्रकारिता समाज और व्यक्ति के विकास में अहम भूमिका निभाता है। पत्रकारिता लेखन की प्रक्रिया की शुरुआत पुनर्जागरण काल से माना जाता है। जब माना गया कि व्यक्ति का जीवन समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्तिगत जीवन को बिना आदर दिये सभ्य समाज की बात करना बेमानी होगा। इस सोच को समाज निर्माण और पत्रकारिता लेखन का प्रथम बिंदु माना गया। इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए आज मीडिया की भी जवाबदेही तय करने की बात हो रही है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। जिसके लिए मानक तैयार करने का काम जल्दबाजी में तो कत्तई नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता लेखन बेहतर समाज के निर्माण की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया है उन विकृतियों को समाज के समाने लाने की, जिसके चलते शोषणवादी समाज में आम आदमी का दम घुटता है। जिसकी बानगी आप रुचिका मामले में देख सकते हैं। जिसमें अफसरशाही का तानाशाही भरा शोषणवादी चेहरा बेनकाब हुआ। ऐसे में शोषणवादी लोगों और उनकी सोच को नंगा किये बिना बेहतर समाज बनाने की बात छलावा मात्र ही साबित होगी।
 
पत्रकारिता से वास्तुनिष्ठता या बिना किसी का पक्ष लिए लेखन की मांग करना बेहद बेतुका है, वस्तुनिष्ठता या आब्जेक्टिविटी विचारशून्यता में ही संभव है। इस तरह की वस्तुनिष्ठता की मांग करने वालों में वो तबका सबसे आगे रहता है जिसके ऊपर समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करने की जवाबदेही होती है, जिसमें नाकाम रहने पर वो केवल तथ्यों की बात करना चाहता है, ताकि विश्लेषण के जरिए उसकी नाकामयाबी उजागर ना हो।
 
समाज की विकृतियों को लोगों के सामने लाने का दायित्व पत्रकारिता पर हैं। इसी पत्रकारिता पर समाज के अंदर उन नए मूल्यों को भी स्थापित करने का दायित्व है, जो मानव जीवन में नई ऊर्जा भर दें। पुनर्जागरण काल से ही इतिहास का लेखन-अध्ययन भी एक ऐसी ही सोच के साथ किया जाने लगा… जिससे बीते कल को समझकर, आने वाले कल को बेहतर कर सकें। समाज को समझने के लिए तमाम सिद्धांत पेश किये गए। ताकि समाज की विकृतियों को समझ और त्यागकर मानव जीवन को और बेहतर बनाया जा सके।
 
पत्रकारिता समाज का आईना है। ऐसे में सामाजिक संबंधों को समझने और उसमें से विकृतियों को निकाल फेंकने की प्रक्रिया सतत है। ये विमर्श पत्रकारिता तक ही नहीं सीमित है। ना ही पत्रकारिता इसके दायरे से बाहर है। इसका उदाहरण निर्माता –निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘रण’ में देख सकते है, जो टीवी पत्रकारिता के बारे में प्रचलित तथाकथित धारणा से रूबरू कराती है। मीडिया में व्याप्त कमियों पर चोट करती है। भले ही धारणा बहुत ज्यादा सच्चाई के करीब नहीं हो, लेकिन ऐसा मंथन एक स्वस्थ समाज का परिचायक जरुर है। टीवी पत्रकारिता में हास्य कार्यक्रमों और राखी के तथाकथित ड्रामा को मिलने वाली जगह को भी प्रयोगवाद की पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है।
 
इसी विमर्श के चलते उत्तर आधुनिकतावादी विचारक सत्य की खोज को बेकार की कसरत बताते हैं, क्योंकि सत्य विशिष्ट संस्कृति और परिपेक्ष्य पर निर्भर है। ऐसे में थोड़े बदलाव भी सत्य के स्वरूप को बदलने का माद्दा रखते हैं। लेकिन ये बात कहीं से भी राजनीतिक कुटिलता और उन जटिलताओं का जायज नहीं ठहराती, जिसके चलते आम आदमी के विकास की संभावनाओं में बाधा पहुंचती हो।
 
फ्रांसिस फूकोयामा अपनी पुस्तक ‘द इंड ऑफ आइडियोलॉजी एंड लास्ट मैन’ में लिखते हैं कि उदार जनतंत्र में मानव विकास की 

वो सभी संभावनाएं मौजूद हैं, जो व्यक्ति के विकास को संपूर्णता के अवसर प्रदान करती हैं। इसी विकास के अवसर को आम आदमी की पहुंच तक बनाए रखने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की है। गौर करें तो काफी हद तक पत्रकारिता के पहरुये इस जिम्मेदारी को निभाने में कामयाब भी दिख रहे हैं। लेकिन सुधार की गुंजाइश हमेशा ही बरकरार रहेगी।
 
लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ टीवी पत्रकार है. पत्रकारिता में लगातार 12 साल काम कर रहे प्रसून कई राष्ट्रीय चैनलों में काम करने के अलावा एक न्यूज चैनल के हेड रह चुके हैं… और मानवाधिकार क्षेत्र में इनका विशेष अध्ययन है. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल से जुड़े हुए हैं.
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