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दैनिक जागरण में प्रकाशित किस आंकड़े को सही मानें पाठक?

पटना से एक जागरूक पाठक ने पत्र भेजा है कि दैनिक जागरण ने 29 नवम्‍बर के एडिशन में प्रकाशित अपने दो खबरों में राजधानी पटना की जनसंख्‍या अलग-अलग लिखी है. पाठक का कहना है कि अपने को नम्‍बर एक अखबार बताने वाले जागरण में क्‍या अंदाजे से या फिर मनमानी तरीके से आंकड़ों को प्रकाशित किया जाता है? उसका कहना है कि आखिर अखबार पढ़ने वाला किस आंकड़े को सही माने? उन्‍होंने दोनों खबरों को भी भेजा है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

पटना से एक जागरूक पाठक ने पत्र भेजा है कि दैनिक जागरण ने 29 नवम्‍बर के एडिशन में प्रकाशित अपने दो खबरों में राजधानी पटना की जनसंख्‍या अलग-अलग लिखी है. पाठक का कहना है कि अपने को नम्‍बर एक अखबार बताने वाले जागरण में क्‍या अंदाजे से या फिर मनमानी तरीके से आंकड़ों को प्रकाशित किया जाता है? उसका कहना है कि आखिर अखबार पढ़ने वाला किस आंकड़े को सही माने? उन्‍होंने दोनों खबरों को भी भेजा है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

छुट्टी के दिन भी सड़कों पर रफ्तार नहीं पकड़ सके वाहन

कार्यालय प्रतिनिधि, पटना : 19.6 लाख से अधिक की जनसंख्या, साढ़े पांच लाख से अधिक वाहन वाली राजधानी पटना में गाड़ी चलाना सिरदर्द बन चुका है। अब जाम के लिए पीक आवर या अन्य किसी कारण की जरूरत नहीं है। हालात, ऐसे हैं कि अवकाश के दिन भी बुधवार को जगह-जगह जाम लगा रहा। और इसका कारण था यातायात प्रबंधन को सुगम बनाने को जिम्मेदार ट्रैफिक पुलिस। उनकी निष्क्रियता और वाहनों चालकों में जल्दी पहुंचने की होड़ हालात को और विकराल बना देती है।

अपराह्न 1 बजे : आयकर गोलंबर से डाकबंगला चौराहा को जाने वाली सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लगी है। कोतवाली से बुद्धमार्ग की ओर मुड़ने पर भी कमोवेश वही हाल थे। मीठापुर ओवरब्रिज में टैंकर तथा बड़ी बसों के कारण वाहनों की कतार रेंगने को विवश हैं। करबिगहिया की ओर स्टेशन से आगे तक वाहन रेंगने को विवश थे। दूसरी ओर भी जाम था, उसमें पीली बत्ती वाली कई गाडि़यां फंसी थी। एक्जीबिशन रोड से लेकर डाकबंगला चौराहा और वहां से पटना जंक्शन तक धीमे चलना वाहनों की मजबूरी थी। जंक्शन पर बड़ी बसों व आटो के कारण भयंकर जाम था। शाम को पांच बजे : इन रास्तों पर शाम पांच बजे तक इसके सिवाय कोई परिवर्तन नहीं था कि वाहनों की संख्या कुछ और बढ़ गई थी। वाहनों को रेंगने के लिए भी काफी इंतजार करना पड़ रहा था।


सिलेंडर की सियासत में पिसता उपभोक्ता

हमारे कार्यालय संवाददाता, पटना : 14.2 किलोग्राम के एक सिलेंडर ने आम लोगों के जीवन में भूचाल पैदा कर दिया है। एक तरफ महंगाई की मार दूसरी तरफ सब्सिडी वाले सिलेंडरों में कटौती के कारण सिलेंडरों का इस्तेमाल करने वाली शहरी क्षेत्र की बढ़ी आबादी इस आस में थी कि शायद कटौती के जख्म पर राज्य सरकार कुछ मरहम रखेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 13 सितंबर को आया हिलाने वाला फैसला : इसी साल केन्द्र सरकार ने देश की आबादी को झटका दिया और सब्सिडाइज्ड सिलेंडरों में कटौती कर दी। निर्देश हुआ कि एक साल में किसी भी उपभोक्ता को छह से अधिक सब्सिडाइज्ड सिलेंडर नहीं मिल सकेंगे। केन्द्र के इस फैसले का सीधा असर शहरों में रहने वाली आबादी पर पड़ा। बिहार के लगभग दस करोड़ लोगों में से 35 लाख लोगों के सामने समस्या थी कि अब कैसे घर का बजट बनाया जाएगा। शहरी लोग हुए सबसे ज्यादा हलकान परेशान : केन्द्र सरकार के इस फैसले की चपेट में शहर में रहने वाली ज्यादा आबादी आई। पटना की आबादी साढ़े 18 लाख है। जिनमें से 72.7 फीसदी घरों में जलावन में एलपीजी छोड़ दूसरा कोई साधन नहीं है। उम्मीद में उठी राज्य सरकार की ओर आंखें : लोगों को उम्मीद थी राज्य सरकार उसके दुखों पर मरहम रखेगी और कम से कम तीन सिलेंडरों पर अपने कोष से सब्सिडी देगी। जैसा किसानों की डीजल योजना में होता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

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