Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

ज़ी बनाम ज़िंदल : पत्रकारिता एवं पुण्‍य प्रसून दोनों की साख पर सवाल

ज़ी न्यूज बनाम जिंदल मामले में स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी बड़े चैनल के संपादकों को गिरफ्तार किया गया…दिल्ली पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी कार्रवाई मीडिया के किसी बड़े ग्रुप पर नहीं करेगी… जी ग्रुप ने इसे कांग्रेस सरकार द्वारा मीडिया को बंधक बनाने जैसा कहा है…. तो सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा है कि ये सरकारी नहीं, कानूनी मामला है… यानि सरकार पुलिस की कार्रवाई को सही बता रही है…. विद्वान पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने इसे आपातकाल से जोड़ा है जिसकी कड़ी आलोचना हो रही है…क्योंकि आपातकाल के समय मीडिया पर सेंसरसिप लगाने के अलग कारण और तत्कालीन परिस्थितियां थीं…उस समय 100 करोड़ के घूस लेने के आरोप में किसी को जेल नहीं भेजा गया था…जबकि सुधीर और समीर पर 100 करोड़ की उगाही के आरोप है.

ज़ी न्यूज बनाम जिंदल मामले में स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी बड़े चैनल के संपादकों को गिरफ्तार किया गया…दिल्ली पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी कार्रवाई मीडिया के किसी बड़े ग्रुप पर नहीं करेगी… जी ग्रुप ने इसे कांग्रेस सरकार द्वारा मीडिया को बंधक बनाने जैसा कहा है…. तो सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा है कि ये सरकारी नहीं, कानूनी मामला है… यानि सरकार पुलिस की कार्रवाई को सही बता रही है…. विद्वान पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने इसे आपातकाल से जोड़ा है जिसकी कड़ी आलोचना हो रही है…क्योंकि आपातकाल के समय मीडिया पर सेंसरसिप लगाने के अलग कारण और तत्कालीन परिस्थितियां थीं…उस समय 100 करोड़ के घूस लेने के आरोप में किसी को जेल नहीं भेजा गया था…जबकि सुधीर और समीर पर 100 करोड़ की उगाही के आरोप है.

कौन सच्चा है कौन झूठा…ये कहना मुश्किल है…बेशक इसकी निष्‍पक्ष जांच होनी चाहिए… लेकिन जिस तरह की तेजी इस मामले में पुलिस ने दिखाई है… उसी तरह की तेजी कोयला घोटाले और अन्य घोटाले से जुड़े नेताओं पर जांच एजेसिंया क्यों नहीं दिखाती …..ये अपने आप में बड़ा सवाल है… संपादक को बिजनेस हेड बनाने की जिस परंपरा की शुरुआत ज़ी न्यूज ने की… वह उसे भारी पड़ी… अब वो ज़माना नहीं रहा जब संपादक पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए मालिक के आदेश को मानने से इनकार कर देते थे… अब पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे पत्रकार के लिए भी ज़ी न्यूज के मालिक और उनका आदेश सर्वोपरि है… आखिर सवाल लाखों की सैलरी का जो है… शायद इसलिए मीडिया के सरोकार पर सैलरी भारी पड़ी.

ज़ी न्यूज ने वर्षों से जो प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता हासिल की थी… वो इस घटना से बर्बाद हो गई…. सुधीर चौधरी की बतौर संपादक या पत्रकार कोई खास प्रतिष्ठा नहीं है… वो पहले भी विवादों में रह चुके हैं लेकिन यहां सवाल रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त उस वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का है जिसकी छवि पत्रकारिता के छात्रों के लिए आदर्श रही है… लेकिन जिस तरह से उन्होंने ज़ी बनाम ज़िंदल मामले में शुरुआत से ही अपने संपादक के लिए बचाव की मुद्रा में रहे और कमर वहीद नकवी के बयान को तोड़ मरोड़कर अपने बुलेटिन में पढ़ा उससे उन पर सवाल उठने लाज़िमी हैं… अपुष्ट खबरों की माने तो अब उन्होंने ज़ी न्यूज से इस्तीफा दे दिया है… अगर ये खबर सही है तो फिर उन्हें ये इस्तीफा पहले ही दे देना चाहिए ताकि उनकी प्रतिष्ठा बची रहती.

कुछ लोगों का मानना  है कि सुधीर और समीर जैसे ब्लैकमेलर संपादक लगभग हर मीडिया हाउस में है… पकड़ गए तो चोर बच गए तो साहूकार… ये कहावत ऐसे संपादकों पर लागू होती है… कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला के चैनल न्यूज 24 के एडिटर अजीत अंजुम की नज़र में किसी एक चैनल या एक संपादक अगर गलत करता है तो इसका मतलब ये नहीं कि सभी संपादक या चैनल ऐसे हैं….हो सकता है ये सच हो लेकिन जिस तरह से टीवी चैनलों की कारगुजारियों पर सवाल उठ रहे हैं… दर्शकों का टीवी न्यूज चैनल से विश्वास कम हो रहा है उसे दूर करने के लिए तथाकिथत बड़े संपादक क्या कर रहे हैं… सेल्फ रिगुलेशन की बात कहने मात्र से ही क्या वास्तव में कोई सुधार हो रहा है?

यहां सवाल केवल ज़ी न्यूज का नहीं है… आज के दौर  की पत्रकारिता पर उठे सवाल हैं… हलांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में ज़ी न्यूज दोषी है या नहीं क्योंकि कोयला घोटाले में ज़िंदल ग्रुप भी कोई पाक साफ नहीं है… पेड न्यूज के मामले में पहले से ही बदनाम टीवी न्यूज चैनल बाजार या मालिक के दबाव में आकर अगर पत्रकारिता की पवित्रता को ताक में रख देंगे तो फिर आम जनता के मन से मीडिया के प्रति मोहभंग होना स्वाभाविक है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि बाकी चैनल्स भी ज़ी न्यूज बनाम ज़िंदल प्रकरण से सीख लें कि वे इस तरह का कुकृत्य किसी कीमत पर नहीं करेंगे ताकि पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को अक्षुण्य रखा जा सके.

लेखक अरुणेश कुमार द्विवेदी मंगलायतन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्‍म में लेक्‍चरर हैं.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...