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एक टीम, दो प्रकाशन, तीन अखबार और सरकारी विज्ञापन की लूट

झारखंड में सरकारी विज्ञापन लूटने लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं. इस दिशा में दो प्रकाशनों ने गज़ब का रैकेट बना रखा है. एक प्रकाशन जमशेदपुर का है जिसका नाम है सम्प्रति प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड है. इसके पास अपना प्रेस है और एक छोटी सी सम्पादकीय टीम भी है. यह वर्षों से चमकता आईना नामक दैनिक अखबार का प्रकाशन कर रहा है. यह अखबार पाठकों तक नहीं पहुँचता. सिर्फ विज्ञापन दाताओं और सरकारी अधिकारियों के बीच वितरित होता है. इसका डीएवीपी, आईपीआरडी है. पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर के कई उपक्रमों में सूचीबद्ध है. प्रसार संख्या नगण्य होने के बावजूद पर्याप्त सरकारी विज्ञापन जुटा लेता है.

झारखंड में सरकारी विज्ञापन लूटने लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं. इस दिशा में दो प्रकाशनों ने गज़ब का रैकेट बना रखा है. एक प्रकाशन जमशेदपुर का है जिसका नाम है सम्प्रति प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड है. इसके पास अपना प्रेस है और एक छोटी सी सम्पादकीय टीम भी है. यह वर्षों से चमकता आईना नामक दैनिक अखबार का प्रकाशन कर रहा है. यह अखबार पाठकों तक नहीं पहुँचता. सिर्फ विज्ञापन दाताओं और सरकारी अधिकारियों के बीच वितरित होता है. इसका डीएवीपी, आईपीआरडी है. पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर के कई उपक्रमों में सूचीबद्ध है. प्रसार संख्या नगण्य होने के बावजूद पर्याप्त सरकारी विज्ञापन जुटा लेता है.

इसके एक डाइरेक्टर हैं ब्रजभूषण सिंह. वे रांची के मां करुणामयी प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड के साप्ताहिक और दैनिक अखबारों के संपादक हैं. इस प्रकाशन के जरिये 7 डेज वीकली अखबार 2005 से प्रकाशित हो रहा है. इसके मालिक डा. विकाश हाजरा हैं जो पेशे से डाक्टर हैं और धनबाद में एक अस्पताल चलाते हैं. मीडिया की उन्हें विशेष जानकारी नहीं है. साप्ताहिक अखबार की शुरूआत रवींद्र कुमार सिंह और अनुराग कश्यप ने की थी. उन्‍होंने एक सक्षम सम्पादकीय टीम बने थी. अखबार भी लोकप्रिय हो गया था. वे ब्रजभूषण सिंह के करीबी रिश्तेदार भी हैं लेकिन ब्रजभूषण सिंह बड़े धूर्त और शातिर पत्रकार के रूप में चर्चित रहे हैं. ब्रजभूषण सिंह का प्रारंभिक जीवन धनबाद में बीता है. इसलिए उन्हें पता था की डा. हाजरा काफी धनी व्यक्ति हैं उन्हें मीडिया का चस्का लग चुका है. बस ब्रजभूषण सिंह ने अपना जाल बिछाना शुरू किया. अखबार के प्रधान और कार्यकारी संपादक के विरुद्ध भ्रम फैलाना शुरू किया. इसमें धनबाद के उनके कुछ पुराने मित्रों ने सहयोग किया. डा. हाजरा और संपादक मंडल के बीच दूरी बढ़ती गयी और एक दिन रांची की पूरी टीम ने इस्तीफ़ा दे दिया. ब्रजभूषण सिंह संपादक बन गए. उन्होंने अपने एक पसंदीदा रिपोर्टर को एक्जक्यूटिव एडिटर के रूप में स्थापित करने की कोशिश की लेकिन संभल नहीं पाया. अखबार बंदी के कगार पर पहुँच गया.

इसी बीच देवेन्द्र गौतम नामक एक वरिष्ठ पत्रकार को डा. हाजरा ने अखबार निकलने की जिम्मेवारी दी. अखबार निकलने लगा लेकिन वे ब्रजभूषण सिंह के डमी बनने के लिए तैयार नहीं हुए तो उनके विरुद्ध भी षड्यंत्र शुरू कर दिया. अखबार का मुद्रण चमकता आईना के प्रेस से करवाने लगे. आजिज़ आकर देवेन्द्र गौतम ने भी अखबार छोड़ दिया. इस बीच धनबाद में एक टीम बनी लेकिन ब्रजभूषण सिंह ने उस टीम को भी तोड़ दिया. उसमें से सिर्फ एक विष्णु शंकर उपाध्याय को रहने दिया जो उनकी हाँ में हाँ मिलाने और चाटुकारिता के लिए तैयार थे. ब्रजभूषण सिंह ने डा. हाजरा को समझाया कि जमशेदपुर में आईना की टीम है ही. और लोगों को रखने की क्या ज़रुरत है. इस बीच डा. हाजरा ने एक रिपोर्टर के कहने पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में करोड़ों रुपये झोंक दिए. वह प्रोजेक्ट भी टाएँ-टाएँ फिस्‍स हो गया.

ब्रजभूषण ने इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया. प्रोजेक्ट फेल होने के बाद ब्रजभूषण ने डा. हाजरा को दैनिक अखबार निकालने की सलाह दी. वे चमकता आईना को ही डाक्टर के खर्च पर धनबाद से निकालना चाहते थे लेकिन डाक्टर हाजरा तैयार नहीं हुए तो आवाज़ 7 डेज़ के नाम से नया टाइटल अप्रूवल कराया. इसके सम्पादक भी ब्रजभूषण बने. ब्रजभूषण ने इसे जमशेदपुर के अपने प्रेस में छापना शुरू किया. इसका डीएवीपी करा लिया और सरकारी विज्ञापन की सेटिंग कर ली. अब इसके आईपीआरडी के प्रयास में लगे हैं. यह अखबार बाज़ार में नहीं जाता लेकिन विज्ञापन का खेल बखूबी कर लेता है. ब्रजभूषण सिंह आईना के पृष्ठों को पेस्ट कर 7 डेज का साप्ताहिक और दैनिक संस्करण निकाल रहे हैं. मुद्रण खर्च के नाम पर लाखों रूपये तो बटोर ही रहे हैं, संपादक पद के एवज में भी डा. हाजरा से प्रतिमाह 50 हज़ार रुपए प्राप्त कर रहे हैं. बताया जा रहा कि जल्द ही डा. हाजरा के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को ब्रजभूषण हाइजैक करने की तैयारी में हैं. डा. हाजरा का पैसा और मज़े ब्रजभूषण के.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.  

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