brahmaveer singh : मीडिया एक बिजनेस है। इसमें करोड़ों-अरबों की पूंजी लगती है। हिसाब-किताब के लिए सीए बैठते हैं। मोलभाव के लिए मार्केटिंग की पूरी टीम। कर्मचारियों की नियुक्ति से लेकर बाहर किए जाने तक, वही तरीका है जो किसी कारखाने में अमल लाया जाता है। विज्ञापन लाने के लिए सरकारी नुमाइंदों को उपहार देने से लेकर, कारपोरेट घरानों के साहबों को कहीं-कहीं वो सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं, जिनसे लाइलाज बीमारियां फैलती हैं। न तो इसमें लोकतंत्र का कोई स्तंभ है न छत। मीडिया की नलिकाओं में रक्त पूंजी से बहता है। न कि नैतिकता और भावनाओं से।
प्राचीन हों या अर्वाचीन…जो भी हमपेशा बंधु पूर्ण नैतिकता का दावा करते हैं वे उसी वक्त संदेह में आ जाते हैं। जीवन और समाज की तरह यहां भी सबकुछ समतल नहीं है। कहीं खुरदरा है कहीं गड्डे और गंदगी भरी फिसलन। मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते कहां-कहां से गुजरता है, यह वक्त, नीयत, किस्मत और काबिलियत का मसला है। खुद को सबसे अलग और ऊपर मानने वाले नब्बे फीसदी मीडियाकर्मी परिवार चलाने की मजबूरी के चलते पत्रकार बनते हैं। हमारे जैसे दस फीसदी पत्रकार कई सालों से अच्छी-खासा वेतन पाते-पाते क्लर्क जैसी हैसियत पाने के बाद कह सकते हैं कि हम जज्बे के साथ आए।
मगर असलियत यही है कि हमारे जैसे दस फीसदी ऐसा मानते हैं वो सौ फीसदी झूठ बोलते हैं। शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जो जज्बे की खातिर पत्रकार बनने की इच्छा पाल पहुंचा हो। जो आया जीवन में कुछ भी करने में शायद अवसर न मिलने की वजह से आया। इस खांचे में सिर्फ वो नहीं समाते जो पहले दिन से ही बड़े पदों पर बैठते हैं और लाखों का पैकेज उठाते हैं। वरना एक सामान्य पत्रकार की हैसियत हिंदुस्तान में वेतनमानों के लागू होने के बाद चपरासियों से भी बदतर है। ऐसा भी नहीं है कि वेतनमान लागू होने से पहले भी कोई बेहतर नहीं थी। इतनी बदहाली में कोई बेरहम समाज को बदलने के लिए चपरासी क्यों बनना चाहेगा? समाज को बदलने की हुंकार वैसी ही है जैसा लाख-दो लाख रुपए की रिश्वत देकर पुलिस की नौकरी पाना और चौराहे पर ढींग हांकना कि हम तो कानून की रक्षा के लिए पुलिस में शामिल हुए। खैर…अवपाद हर जगह होते हैं। बतौर ईश्वर के अवतार कोई इस दावे को खारिज करता है तो माफ करे।
माफी इसलिए क्योंकि हर वक्त और हर हाल में तमाम खराबियों और निराशाजनक हालात में कुछ बेहतर दिखता है। कुछ लोग हैं जिन्होंने इस पेशे को ईमान से जिया और धर्म की तरह माना। उसके एवज में उन्हें हासिल उतना ही हुआ जितने के वे लायक थे। मसलन जिंदा रहने के लिए रोटियां। जो जीवन में खुद कहीं एक आशियाने की नींव तक न रख सके। न परिजनों के लिए समृद्धिभरा भविष्य दे सके। समाज का तानाबाना ही ऐसा है कि यहां सारा खेल उपयोगिता का है। ईमानदारी या नैतिकता का नहीं। हमारे-आपसे बने समाज में ही नैतिकता और ईमानदारी के बदले कुछ नहीं मिलता। जीवन संचालन के लिए निहायत ही जरूरी सुविधाएं तो बिल्कुल नहीं। बगैर पूंजी के महज नैतिकता के दम पर चंद रोज में समाज खुद हम-आपको मरने के लिए छोड़ देगा। हम व्यवहारिक समाज के हिस्से हैं। पूंजी द्वारा संचालित समाज के लोग। समाज ने हैसियत को पूंजी से जोड़ लिया तो फिर उसी को हासिल करने की आपाधापी में तमाम अनैतिक कर्म होने लगे हैं। और बड़ी पूंजी…वो तो कभी नैतिकता की सपाट गली से गुजरकर नहीं आती। पूंजी का तो चरित्र ही अधर्म का है। वह किसी की जेब तभी भारी करती है जब किसी की हल्की कर देती है। किसी के पास दो सौ तभी होते हैं जब वह दूसरे के हिस्से के सौ उड़ा देता है। जिसकी काबिलियत दूसरे हिस्से को उड़ाने की होती है वही पूंजीपतियों का लाड़ला होता है। यह नियम हर जगह के लिए प्रथम है। मीडिया के लिए भी। अगर किसी पत्रकार को समृद्ध जीवन चाहिए तो उसके लिए तय नैतिक-अनैतिक नियमों को निभाना ही होगा। लाखों चाहिए तो करोड़ों लाकर देने होंगे। फिर वह जिंदल से आए या फिर सौ जिंदलों से अलग-अलग…। सुधीर लाए या अहलुवालिया…या फिर वो तमाम वो लोग जो किसी छिपे कैमरे की जद में न आ सके या फिर उनका वास्ता नवीन जिंदल जैसे घाट-घाट का पानी पीने वाले दुस्साहसी से अब तक नहीं पड़ा है।
Sushil Agrawal : Badhai dear, hajaro-lakho journalist ki baat, sahi aur balance words ke sath rakhne ke liye, Continue with same zeal. Best wishes
Satish Agnihotri : brahma ji ke veer ye to sab maze ke liye karte honge aap apniu bataain………..lol
Rakesh Gupta : अपने अपने पेशे की मजबूरियां हैं कम लोग ही हिम्मत कर पाएंगे ऐसे स्वीकार करने में !!
Satish Agnihotri : मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते कहां-कहां से गुजरता है, यह वक्त, नीयत, किस्मत और काबिलियत का मसला है। ………..in sab main neeyat saaf hone chahiye…..
Brahmaveer Singh : सतीश जी, नीयत हमेशा स्वच्छ होनी चाहिए। हर मनुष्य में देवत्व मौजूद है। समाज के संपर्क में कभी वह कलुषित होता है कभी निखर कर देवतुल्य हो जाता है। हम सबका दायित्य लोगों को देवतुल्य बनाने का है। बाकी जैसी समाज की इच्छा।
Satish Agnihotri : main daava kar sakta hoon aapki madhur bhaashaa se aap zaroor dharam karam main bad chad kar hissa lete hain…..
Satish Agnihotri : waaise main is baat ko bahut ahmiyat deta hoon ki insaan ka character badiya hona chahiye aur kaam aisaa jis ko batane main sharam mehsoos naa ho chahe kaam chota ho ya badaa…….
Brahmaveer Singh : sathish ji jindgi itna vaqt nahee deti..aajkal dharm karm poonji walo ka kaam hai..aam aadmi ki itni haisiyat kahan
Nitin Bhansali : III Kadva sach kaha hai Brahmveer bhaiya
Navin Dewangan : कौन कहता है कि पत्रकारो ने समाज सुधारने का ठेका ले रखा है,अजी साहब हम तो अपने मालिको के तिजोरी भरने के ठेकेदार है…हमारी हैसियत चरवाहे की उस कुत्ते की तरह है, जिसे बकरियो को घेर कर लाने के एवज में रोटी के कुछ टुकडे मिल जाते है..कुत्ता भी बकरी बनने के फिराक में आखिर क्यूं नही रहेगा..? और इसके लिए वह हर वक्त मौके के तलाश में रहेगा..रही बात चारवाहे कि तो उसको न तो कुत्ते से हमदर्दी है और न ही बकरीयों से..
Satish Agnihotri : bhagwaan ka naam lene ke liye kisi ke sifarish ya permission nahin chahiye…….
Tehseen Zaidi : एक नंबर….
Sanjiv Varma : bramahveer ji aapne sahee kaha. aaj jo kuchh bhi ho raha hai uske lia kaheen na kaheen samaj bhi jimmedar hain. aour journlist bhi samaj ka hee aak ang hain.
Deepak Dubey : kamaal ki drafting…
Ramesh Ramareddi : Press aur police ko lagta hai wo kuch bhe kar sakta hai
Satish Pandey : पत्रकार की मजबूरी हैं।
Pawan Keswani : बहुत अच्छा प्रयास है ,शुभकामनायें !ब्रह्मविर जी
Sandeep Rathore : chaa gaye babuji. kay yah baat pahle samajh me nahi aai thi.
Amit Jaldhari : तुमने वह सब बेबाकी से कहा जो बाकी सब केवल सोचते हैं। बधाई।
Raju Hindustani : Rajkumar Gwalani विधानसभा की रिपोर्टिंग के लिए भी पैसे अपने राज्य में विधानसभा की रिपोर्टिंग के लिए भी लाखों रुपए की बंदरबाट पत्रकारों को की जा रही है। यह बात हम हवा में नहीं कह रहे हैं।
Ajay Kumar : this is real truth of media
Dwarika Prasad Agrawal : समाज का तानाबाना ही ऐसा है कि यहां सारा खेल उपयोगिता का है। ईमानदारी या नैतिकता का नहीं। हमारे-आपसे बने समाज में ही नैतिकता और ईमानदारी के बदले कुछ नहीं मिलता। जीवन संचालन के लिए निहायत ही जरूरी सुविधाएं तो बिल्कुल नहीं। । समाज ने हैसियत को पंूजी से जोड़ लिया तो फिर उसी को हासिल करने की आपाधापी में तमाम अनैतिक कर्म होने लगे हैं। और बड़ी पूंजी…वो तो कभी नैतिकता की सपाट गली से गुजरकर नहीं आती। पंूजी का तो चरित्र ही अधर्म का है। VAAH……Brahmaveer ji….
Dwarika Prasad Agrawal : समाज ने हैसियत को पंूजी से जोड़ लिया तो फिर उसी को हासिल करने की आपाधापी में तमाम अनैतिक कर्म होने लगे हैं। और बड़ी पूंजी…वो तो कभी नैतिकता की सपाट गली से गुजरकर नहीं आती। पंूजी का तो चरित्र ही अधर्म का है। VAAH Brahmveer ji…
Brahmaveer Singh : sandeep bhai..jab samajh aaya tab tak kuchh karne layak hee nahee bache…ya fir koi doosra rasta dikha hee nahe us vaqt
Brahmaveer Singh : dhanyavaad dwarika ji…
ब्रह्मवीर सिंह के फेसबुक वॉल से साभार.






