सुधीर- समीर की गिरफ्तारी क्या हुई, मीडिया मठाधीशों में बहस छिड़ गई। बहस का चरित्र साकारात्मक हो तो नवोदित पत्रकारों को भी दिशा मिले लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा नहीं हो रहा है। स्थिति तो यह बन गई है कि ये मठाधीश एक-दूसरे की चड्ढी उतारने पर पिल पड़े हैं। फेसबुक से लेकर कई सोशल वेब साइट पर कथित वरिष्ठ पत्रकार ज्ञान की वाणी उड़ेल रहे हैं। मीडिया में वाद की जगह विभिन्न खेमों में बंटे पत्रकार भाई अपने ही पेशे की "मां-बहन" करने पर उतारू हैं।
अबतक जो बातें अक्सर ( खेमेबाजी को लेकर) बातचीत का मुद्दा होती थी लिखित रूप में सामने आने लगी है। यह सब जानते हैं ( मीडिया जगत में) कि आप लाख काबिल हो इन मठाधीशों का जबतक आपके उपर हाथ नहीं होगा, मीडिया हाउस में नौकरी नहीं मिल सकती है। लेकिन उन लोगों का यह चरित्र सार्वजनिक होने लगा, यह दुखद है। दिलचस्प तो यह है कि इस मुद्दे पर मीडिया जगत से बाहर कोई बहस नहीं हो रही है, या फिर सामने नहीं आ रही है। नेताओं की बिरादरी मीडियाकर्मियों से खुन्नस पाले रहता है, वो भी चुप है लेकिन हमलोग खुद एक- दूसरे का चरित्र हनन करने पर उतारू है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है कि मीडिया को चलाता कौन है और नियंत्रण किसके हाथ में है। एक-दो हाउस को छोड़ दे तो हमारा मालिक कोई न कोई सेठ है। सेठ को समाज से क्या सरोकार हो सकता है- समझा जा सकता है। सेठ यदि कोई अखबार या चैनल चलाता है तो उसका उद्देश्य साफ है…. मुनाफा कमाना या मीडिया के नाम पर अपने अन्य व्यवसायों को सुरक्षित रास्ता मुहैया कराना। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसकी पूरी व्यवस्था बनी होती है। जाहिर है एसे में सुधीर संपादक की जगह बिजनेस हेड बन गए। बिजनेस हेड की भूमिका में आने के बाद वो भला संपादक का संस्कार कैसे और क्यों ढोते? हो सकता है मालिक का दवाब हो या बिजनेस हेड होने की पेशागत मजबूरी वो कथित गलती कर बैठे। ऐसे में इस समय होना यह चाहिए था (यह मेरी निजी राय है) कि सभी मीडियाकर्मी इस बाजारवाद और मालिकों की मनमानी के खिलाफ एकजुट होकर पत्रकारिता की पवित्रता को बचाने में जुट जाते लेकिन अफसोस हम आपस में ही उलझ गए।
यह बहस का विषय हो सकता है कि मीडिया अब मिशन नहीं प्रोफेशन है। लेकिन भाई प्रोफेशन का भी एक संस्कार होता है। यह भी एक तल्ख सच्चाई है कि नेता चोरी करे, पुलिस घूस ले, शिक्षक कोचिंग का व्यवसाय करे लेकिन भाई आप तो पत्रकार हैं– ईश्वर आपको कुछ भी गलत करने की इजाजत नहीं देता है। सामाजिक आईने में आज भी पत्रकार की तस्वीर कुर्त्ता- पायजामा पहने, कंधे पर झोला लटकाए और आंखों पर मोटे फ्रेम वाला चश्मा लगाए एक समाज सुधारक की है। भला यह संभव है….. बिल्कुल नहीं और समाज को भी इस बात को समझना होगा। साथ ही मीडियाकर्मियों को भी समझना होगा कि एक सीमा में रहें ताकि व्यवसाय के साथ-साथ अपने संस्कार से भी न्याय कर सकें।
लेखक सुनील पांडेय मौर्य टीवी में इनपुट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं.






