समाजवादी सरकार का दोहरा चरित्र उसके लिए लोकसभा चुनाव में संकट पैदा कर सकता है। वह 2009 के मुकाबले 2014 के चुनाव में और मजबूत होने की बजाये कमजोर हो जाये तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। एक तरफ केन्द्र की कांग्रेस सरकार का किसान विरोधी रवैया बरकरार है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी साम्प्रदायिकता की आड़ में केन्द्र सरकार की खेवनहार बनी है। वह समझती है कि जनता उसके बहकावे में आ जाएगी, लेकिन उसे यह नहीं पता है कि केन्द्र की कांग्रेस गठबंधन सरकार की गलत नीतियों के कारण मंहगाई बढ़ती जा रही है तो उसके भ्रष्ट नेताओं के कारण देश में भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है। इन दोनों ही विपत्तियों की मार सभी जातियों और वर्गों के लोगों को खाई जा रही है।
अपनी ‘दुकान’ चलाने के लिए समाजवादी नेताओं ने जनता की सभी समस्याओं की तरफ से मुंह मोड़ लिया है जो ठीक नहीं कहा जा सकता है। डीजल मंहगा हो गया, रसोई गैस, ईंधन मंहगा हुआ, परिवहन भाड़ा बढ़ गया, खाद-बीज की किल्लत हो गई। किसान की खेती मंहगी हो गई। उसकी उपज के दाम देने में तमाम बाधाएं पैदा की जा रही है। गेहूं, धान किसान सभी दुःखी हैं। कई राज्यों में तंगहाली और बदहाली से परेशान किसान आत्महत्या तक को मजबूर हो गए हैं। केन्द्र की कृषि विरोधी नीतियों के चलते ही देश में 2012-13 में प्रमुख फसलों की पैदावार में 2.8 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है। इन सब को अनदेखा कर सपाई नेता उलट बयानी करके जनता को भ्रमित करने में लगे हैं। उसके नेता भाजपा से दूरी के नाम पर कांग्रेस की करतूतों पर योंहि पर्दा डालते रहे तो निश्चित ही जनता भी उसे कांग्रेस की तरह माफ नहीं करेगी। सभी मौकों पर वह साम्प्रदायिकता का भूत खड़ा करके अपना साम्प्रदायिक कार्ड नहीं चला सकती है। उसके सांसदों और नेताओं की भी जनता के प्रति कुछ जवाबदेही बनती है।
बात कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों के कारण बने मौजूदा हालात की कि जाए तो आर्थिक शोध संस्थान सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन एकोनामी ने कहा है कि बुवाई क्षेत्र में कमी आती जा रही है। इससे प्रमुख फसलों का उत्पादन घटता जा रहा है। कृषि मूल्य नीति पर सरकार की परामर्शदात्री संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने वर्ष 2013-14 के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि किए जाने से इंकार कर दिया है। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की आर्थिक मामलों की सीमिति (सीसीईए) गेहूं पर फैसला करने से नवम्बर महीने में किनारा कर गई। कृषि मंत्रालय का प्रस्ताव था कि एमएसपी में 115 रूपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की जाए किन्तु गेहूं का समर्थन मूल्य पिछले वर्ष की 1,285 रूपए प्रति कुंतल की दर से ही तय किया जा रहा है। यह कांग्रेस की किसान विरोधी नीति का ही परिणाम है कि देश के किसानों को तो उनकी फसल का उचित मूल्य भी नहीं दिया जा रहा है जबकि इन्हीं किसानों की फसल ऊॅचे दामों पर विदेशों को निर्यात की जा रही है। वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की मजबूत मांग के चलते निर्यात निविदा पर 300 डालर से लेकर 324 डालर प्रति टन की कीमत मिल रही है। भारतीय गेहूं की उचित कीमतों के चलते निर्यात सब्सिडी 1275 करोड़ रुपए से घटकर मौजूदा वित्त वर्ष में 500 करोड़ रुपए से भी कम रह जाने की सम्भावना है।
ये आंकड़े जाहिर करते हैं कि भारतीय किसानों के साथ किस तरह उपेक्षापूर्ण हो रहा है। समाजवादी पार्टी किसानों को खुश करने के लिए कहती तो जरूर है कि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए से ज्यादा दिया जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी ने हमेशा किसानों और गांव-गरीब के हितों की चिन्ता की है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रदेश के बजट का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषि क्षेत्र के लिए रखा था। समाजवादी पार्टी एफडीआई का विरोध इसलिए करती है क्योंकि यह किसान विरोधी कदम है। किसानों को इससे कोई फायदा नहीं होगी, लेकिन जब किसान विरोधी सरकार से समर्थन वापस लेने का उसका साथ नहीं देने की बात होती है तो सपा को कथित रूप से साम्प्रदायिकता याद आ जाती है। अगर समाजवादी पार्टी की बातों पर विश्वास कर लिया जाए तो ऐसा लगता है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के नाम पर वह हमेशा ही कांग्रेस के पाले में खड़ी रहेगी, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई और विकल्प होगा भी नहीं। उसकी तो इतनी कभी ताकत होने से रही कि अपने बूते वह केन्द्र में सरकार बना सके।
समाजवादी नेता खुद तो किसान विरोधी राजनीति कर रहे हैं लेकिन कहते यह घूम रहे हैं कि पिछली बसपा सरकार को गांव और किसान दोनों से बैर था। पांच वर्षों तक बसपा राज में केवल पत्थरों, पार्कों, स्मारकों पर सरकारी खजाना लुटाया जाता रहा। समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों के हित की कई योजनाएं प्रारम्भ की है। उन्हें पेंशन, अनुदान, कर्ज माफी, मुफ्त सिंचाई की सुविधाएं दी है। उनकी बंधक जमीन की नीलामी पर रोक लगा दी है। गन्ना किसानों को उचित लाभकारी मूल्य दिलाए जाने का मुख्यमंत्री ने स्वयं आश्वासन दिया है। किसानों को समय से बीज, खाद मिले इसके लिए कड़े निर्देश दिए गए है। समाजवादी पार्टी सरकार किसानों की आर्थिक समृद्धि, कृषि उत्पादकता में वृद्धि एवं कृषि सुधारों को मजबूती देने के लिए कृतसंकल्प है, लेकिन यह सब कागजी बातें अधिक है और हकीकत इसमें कम है। सच्चाई तो यही है कि न तो बसपा को किसानों की चिंता थी और न ही मुलायम को किसानों की चिंता है। दोनों ही वोट बैंक की राजनीति में लगे हैं। यही वजह है उत्तर प्रदेश लगातार पिछड़ता जा रहा है। सभी वर्ग के लोगों का जीना मुहाल हो गया है। मुलायम को समझना चाहिए कि साम्प्रदायिकता का कार्ड खेल कर वह लम्बे समय तक प्रदेश की जनता को बूवकूफ नहीं बना सकते हैं क्योंकि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।
सपा को समझना चाहिए कि हिन्दुस्तान की राजनीति में सिर्फ उसके ही नेताओं के कंधों पर आदर्श की बात करने और किसी कौम या बिरादरी का ठेकेदार बनने की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। वह जिन कौमों के लिए हितैषी बनने की बात बार-बार दोहराते हैं, अगर उनकी बातों में सच्चाई होती तो यह इन कौम के लोगों ने उन्हें कब का दिल्ली का ताज भी पहना दिया होता जिसका वह वर्षों से सपना देखते आए हैं। वह जब किसी पर एक उंगली उठायेंगे तो तीन स्वतः उनकी तरफ उठेंगी। वह जब किसी नेता या पार्टी पर साम्प्रदायिकता की तोहम्मत लगा कर हमला बोलते हैं तो उन्हें भी तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए बदनाम होना पड़ता है। कुछ राजनैतिक पंडित तो यहां तक कहते हैं कि मुलायम की सोच अगर व्यापक होती और वह कुछ कौमों को साथ
लेकर चलने की बजाए सबको साथ लेकर चलने पर ज्यादा तवज्जो देते तो उनके जैसे काबिल और जमीन से जुड़े नेता को देश की जनता कब का प्रधानमंत्री पद पर बैठा चुकी होती। तब, मुलायम को कांग्रेस के सामने यह लाचारी नहीं दिखाना पड़ती कि वह तो आपसे समर्थन ले सकते हैं या दे सकते हैं, 273 का आंकड़ा नहीं छू सकते।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.






