आज बहुत दिनों बाद एक साथ दुगनी ख़ुशी मिली. आज तक का मेरा जिगरी दोस्त आरिज़ चंद्रा करीब ६ महीने की बीमारी से लड़ाई जीतकर वापस पुलिस मुख्यालय के बाहर दिखा और करीब तीन महीने पहले एनडीटीवी से छंटनी के नाम पर बाहर किये गए विवेक गुप्ता को आईबी7 में नौकरी मिल गयी. हालांकि आरिज़ को बोलने में अभी लड़खड़ाहट हो रही है, पर उसमें जो विलपावर है मुझे मालूम है वह बहुत जल्द इससे उबर जाएगा.
आरिज़ और विवेक दोनों के प्रसंग यहाँ एक और खास कारण से बहुत महत्वपूर्ण है. ये प्रसंग बेरोज़गारी या नौकरी जाने के डर से जुड़े हुए हैं. विवेक की मेहनत और इमानदारी को मुंबई में पूरी मीडिया जानती है पर जिस तरह से उसे और एनडीटीवी में कई लोगों को निकाला गया और जिस तरह से रवीश कुमार जैसे बड़े व खुद को आदर्शवादी बताने वाले पत्रकार मुंह बंद कर बैठे रहे वह बहुत ही दुखदायी प्रसंग था, आरिज़ भी बीमारी के दौर में अपनी नौकरी को लेकर बहुत चिंतित था. हालांकि उसके संस्थान की तरफ से उसे लगातार मेडिकल सपोर्ट दिया जाता रहा. फिर भी डर तो डर ही होता है. आरिज़ की मम्मी मुझे बता रही थीं कि एक बार जब बॉम्बे अस्पताल में आईपीएस अधिकारी देवेन भारती आरिज़ को देखने को आये तो आरिज़ बीमारी में नौकरी के जाने की आशंका को लेकर रो पड़ा. उस वक़्त भारती साहब ने वायदा किया कि वह आरिज़ के बॉस से बात करेंगे.
मैं १९९६ में अपने १५ साथियों के साथ बेरोजगारी का भयावह दौर देख चुका हूँ इसलिए हर बेरोजगार की पीड़ा को अच्छे से समझता हूँ. जब कोई बेवजह किसी की नौकरी लेता है तो वह भूल जाता है कि एक की नौकरी से सिर्फ एक आदमी बर्बाद नहीं होता पूरा परिवार प्रभावित होता है. एक पीढ़ी जो अपने और परिवार के बड़े बड़े सपने देखती है किस तरह कई बार बेरोजगारी के कारण अपराध की दहलीज़ तक या आत्महत्या तक पहुँच जाती है पर दुःख इस बात का है कि यह बात नौकरी लेने वालों को समझ में नहीं आती. वो अपना परिवार देखते हैं अपनी ख़ुशी देखते हैं दूसरों की नहीं.
मुंबई के क्राइम रिपोर्टर सुनील मेहरोत्रा के फेसबुक वॉल से साभार.






