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जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में सैलरी के लाले, दिख रहे तालाबंदी के आसार

: भाई-भतीजावाद ने बिगाड़ कर रख दी अखबार की स्थिति : जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में कर्मचारियों का नया साल बिगड़ने वाला है. यहां काम कर रहे लगभग सौ कर्मचारियों का नवम्‍बर नवम्‍बर महीने की ही सैलरी अब तक नहीं मिली है, जबकि दिसम्‍बर भी खतम होने वाला है. कर्मचारी परेशान हैं. अच्‍छे अच्‍छे बैनरों को छोड़कर जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने वाले लोग अब परेशान हैं. उन्‍हें अपने फैसले पर कोफ्त हो रही है. बताया जा रहा है कि यहां से जुड़े नौ जिलों में भी पिछले पांच-छह महीने से कर्मचारियों को सैलरी और अन्‍य खर्च नहीं दिए गए हैं.

: भाई-भतीजावाद ने बिगाड़ कर रख दी अखबार की स्थिति : जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में कर्मचारियों का नया साल बिगड़ने वाला है. यहां काम कर रहे लगभग सौ कर्मचारियों का नवम्‍बर नवम्‍बर महीने की ही सैलरी अब तक नहीं मिली है, जबकि दिसम्‍बर भी खतम होने वाला है. कर्मचारी परेशान हैं. अच्‍छे अच्‍छे बैनरों को छोड़कर जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने वाले लोग अब परेशान हैं. उन्‍हें अपने फैसले पर कोफ्त हो रही है. बताया जा रहा है कि यहां से जुड़े नौ जिलों में भी पिछले पांच-छह महीने से कर्मचारियों को सैलरी और अन्‍य खर्च नहीं दिए गए हैं.

खबर मिली है कि प्रबंधन हेड यूनिट में काम करने वाले कर्मचारियों को आश्‍वासन दे रहा है पर जिलों में कार्यरत लोगों को कह दिया गया है कि आप विज्ञापन जुटाओ और उसी से अपनी सैलरी तथा खर्च निकालो. प्रबंधन के इस फरमान के बाद जिलों में असंतोष व्‍याप्‍त हो गया है. बताया जा रहा है कि लांचिंग के कुछ समय बाद ही अखबार की स्थिति गड़बड़ हो गई. कारण बताया गया कि अनुभवी लोगों की जगह दोस्‍ती-यारी निभाने के चक्‍कर में ऐसे लोग भर लिए गए जो पत्रकारिता की मानक पर बहुत खरे नहीं उतर रहे थे.

यहां वहां से छंटे-छंटाए लोग भर लिए जाने के चलते शुरुआत से ही स्थितियां गड़बड़ हो गईं. और यह एक खास बिरादरी का अखबार दिखने लगा. कुछ जिलों में ऐसे लोगों को ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया, जिन्‍हें जुम्‍मा जुम्‍मा साल-दो साल के पत्रकारिता का भी अनुभव नहीं था. इसके चलते सीनियर तथा जिलों में अपनी पहचान रखने वाले लोग अखबार से नहीं जुड़े, जिसका परिणाम यह हुआ कि रिवेन्‍यू माडल विकसित नहीं हो सका. जिलों में भी हिंदुस्‍तान से आए एक सीनियर रिपोर्टर की चली, जिसके चलते अच्‍छे लोगों की बजाय जुगाड़ वाले लोग ही जिलों में तैनात हो पाए.

खर्च बढ़ने तथा रिवेन्‍यू माडल विकसित नहीं होने के चलते प्रबंधन ने अपने हाथ खड़े कर लिए. प्रबंधन ने तय किया था कि प्रत्‍येक छोटे जिलों को 25 हजार रुपये में चलाया जाएगा तथा बड़े जिलों पर इससे थोड़ा ज्‍यादा खर्च किया जाएगा. इतना कम धनराशि में भी कुछ लोगों ने किसी तरह कार्यालयों का संचालन किया, परन्‍तु रिवेन्‍यू जनरेट नहीं होने के चलते जिलों को मिलने वाले ये खर्च भी बंद कर दिए गए. नियुक्ति से लेकर अखबार चलाने में भी संपादक एवं सीजीएम की भूमिकाएं सीमित कर दी गईं तथा कुछ खास लोगों को प्रमोट कर दिया गया, जिससे यह अखबार लांचिंग के समय ही कोई अलग छाप नहीं छोड़ पाया.

बनारस के जमे जमाए अखबारों में अपनी पहचान बनाना तो दूर यह अखबार अब बंदी के कगार पर पहुंचता दिख रहा है. बताया जा रहा है कि बनारस के एक बिल्‍डर अनुराग कुशवाहा का पैसा इसके संचालन में लग रहा है लेकिन वो भी अखबार से बहुत फायदा न देखते हुए पैसे देने बंद कर दिए हैं, जिसके चलते कर्मचारियों की सैलरी अटकी पड़ी है. सैलरी अनियमितता के चलते पहले भी कई लोग अखबार को अलविदा कह चुके हैं. अब देखना है कि यह अखबार चल पाता है या फिर तालाबंदी ही इसकी अंतिम परिणिति होती है.

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