नववर्ष का पहला दिन तो मस्त रहा। काश ऐसे ही मिलते रहें लोग। शाम जब खबरों में उलझा था तभी फोन आया। सोचा कोई खबर होगी लेकिन वहीं पुराना स्टाइल कहां हैं? कैसे हैं मान्यवर? मैं समझ नहीं पाया। बोले माधवकान्त मिश्रा बोल रहा हूं। मैंने कहा कि सर प्रणाम। नया वर्ष मंगलमय हो। बोले कि ऐसे नहीं काम चलेगा। आ जाइये तब होगा नव वर्ष मंगलमय। मैंने कहा कि समय निकाल कर दिल्ली आउंगा तो जरूर मिलूंगा। पहले भी आर्शीवाद लेता था अब तो पत्रकार से संत हो गये हैं तो संत का आशीर्वाद लूंगा।
बोले कि मैं आपके के शहर इटावा में हूं। काम निपटा कर मैं होटल पहुंचा तो संन्यासी वेश में देश के चोटी के पत्रकार माधवकांत मिश्रा पूर्णतया संत रूप में मिले। सुखद यह कि भाभी जी भी साथ में थीं। इलाहाबाद महाकुंभ मेले में जा रहे हैं। बातचीत हुआ तो बोले अब तो लोग भगवान से भी नहीं डरते। राजपीठ ही सब कुछ है, व्यास पीठ का आदर कम हो रहा है। दामिनी मामले पर दिल्ली में जुटी नौजवानों की भी को मैंने सुख संकेत बताया तो बोले कि मुझे तो डर लग रहा है, अगर सही दिशा न मिली तो लोग हिंसक न हो जाएं। इनको समझाने की जरूरत है। काफी लंबी बातचीत हुई। पहले दिन बहुत अच्छा लगा सुबह वे घर आएंगे तब और चर्चा होगी।

पंडित माधवकांत मिश्रा न्यूयार्क से प्रकाशित इंडिया वीकली यूएसए के सलाहाकर संपादक मेनका गांधी की सूर्या इंडिया, राष्ट्रीय सहारा, पाटिलपुत्र टाइम्स और न जाने कितने अखबारों के सम्पादक रहे हैं। उन्होंने आस्था चैनल की शुरुआत की। अब पूरी तरह संत हो गये। विधिवत गंगा में खड़े होकर दीक्षा ली। उनकी तांत्रिक विद्याओं में तो पहले से ही रूचि थी। रुद्राक्ष का अभियान उन्होंने घर-घर पहुंचाया। उन्हें समाज की खराब चीजों से बेहद विरक्ति हो गयी है। संत समाज की गड़बड़ियों से भी वे चिन्तित दिखे। फिर भी कुछ नया कर दिखाने को निकले हैं। बहुत बहुत बधाई।
इटावा के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से साभार.





