नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय की तरफ से 31 अगस्त को सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्ट कॉरपोरेशन के खिलाफ दिए गए फैसले की समीक्षा मंगलवार को हो सकती है। यह समीक्षा याचिका आज न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन के सामने रखी गई। सहारा के वकील ने इस पर हालांकि टिप्पणी से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस केहर के पीठ ने इन दोनों कंपनियों को निवेशकों को 24,029 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था। यह रकम निवेशकों से ओएफसीडी के जरिए उगाही गई थी।
अदालत ने इस पर 15 फीसदी सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया था। इन फर्मों को रकम के साथ-साथ सभी जरूरी दस्तावेज 10 दिन के भीतर सेबी के पास जमा कराने थे। नियामक को ऐसे रिफंड का काम 30 नवंबर तक पूरा करना था। चूंकि सहारा ने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं कराए, लिहाजा सेबी ने उच्चतम न्यायालय में अवमानना की याचिका दायर की। 30 नवंबर को सहारा 5120 करोड़ रुपये जमा कराने को लेकर उच्चतम न्यायालय पहुंच गया। चूंकि सेबी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था क्योंकि यह अदालती आदेश के मुताबिक लौटाई जाने वाली रकम का एक हिस्सा भर था। तब मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले पीठ ने सेबी को यह रकम स्वीकार करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही सहारा को दो किस्तों में बाकी रकम जमा करने का निर्देश दिया गया था। पहली किस्त 5 जनवरी को दी जानी थी।
सहारा समूह अब दावा कर रहा है कि उसे कुछ और चुकाने की दरकार नहीं है क्योंकि ओएफसीडी निवेशकों के सिर्फ 2620 करोड़ रुपये ही बकाया है। इसका कहना है कि अतिरिक्त 2500 करोड़ रुपये संभावित विवाद या आकलन में होने वाली गड़बड़ी की स्थिति से निपटने के लिए दिए गए थे। बताया जा रहा है कि सहारा ने समीक्षा याचिका के साथ एक शपथपत्र भी दायर किया है, जिसमें आकलन के बाबत विस्तार से जानकारी दी गई है। (बीएस)





