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प्रिंट-टीवी...

सोशल मीडिया के एक्‍सटेंशन बन गए हैं न्‍यूज चैनल

: इंटरनेट की धड़कन से टीवी चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से : पल्प फिक्शन से पल्प टेलीविज़न तक : न्यूज़ चैनल अपने आस पास के माध्यमों के दबाव में काम करने वाले माध्यम के रूप में नज़र आने लगे हैं। इनका अपना कोई चरित्र नहीं रहा है। गैंग रेप मामले में ही न्यूज़ चैनलों में अभियान का भाव तब आया जब अठारह दिसंबर की सुबह अखबारों में इस खबर को प्रमुखता से छापा गया। उसके पहले हिन्दी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से थी मगर अभियान के शक्ल में नहीं। यह ज़रूर है कि एक चैनल ने सत्रह की रात अपनी सारी महिला पत्रकारों को रात वाली सड़क पर भेज दिया कि वे सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं लेकिन इस बार टीवी को आंदोलित करने में प्रिंट की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। उसके बाद या उसके साथ साथ सोशल मीडिया आ गया और फिर सोशल मीडिया से सारी बातें घूम कर टीवी में पहुंचने लगीं। एक सर्किल बन गया बल्कि आज कल ऐसे मुद्दों पर इस तरह का सर्किल जल्दी बन जाता है।

: इंटरनेट की धड़कन से टीवी चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से : पल्प फिक्शन से पल्प टेलीविज़न तक : न्यूज़ चैनल अपने आस पास के माध्यमों के दबाव में काम करने वाले माध्यम के रूप में नज़र आने लगे हैं। इनका अपना कोई चरित्र नहीं रहा है। गैंग रेप मामले में ही न्यूज़ चैनलों में अभियान का भाव तब आया जब अठारह दिसंबर की सुबह अखबारों में इस खबर को प्रमुखता से छापा गया। उसके पहले हिन्दी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से थी मगर अभियान के शक्ल में नहीं। यह ज़रूर है कि एक चैनल ने सत्रह की रात अपनी सारी महिला पत्रकारों को रात वाली सड़क पर भेज दिया कि वे सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं लेकिन इस बार टीवी को आंदोलित करने में प्रिंट की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। उसके बाद या उसके साथ साथ सोशल मीडिया आ गया और फिर सोशल मीडिया से सारी बातें घूम कर टीवी में पहुंचने लगीं। एक सर्किल बन गया बल्कि आज कल ऐसे मुद्दों पर इस तरह का सर्किल जल्दी बन जाता है।

कुछ अखबार हैं जो बचे हुए हैं पर ज्यादातर अखबार भी सोशल से लेकर वोकल मीडिया की भूमिका में आने लगे हैं। टीवी के कई संपादक सोशल मीडिया के दबाव को स्वीकार करते हुए मिल जायेंगे। जैसे ही सचिन तेंदुलकर ने रिटायरमेंट की घोषणा की वैसे ही एक बड़े संपादक ने ट्विट किया कि गैंगरेप की खबरें पहले चलेंगी और सचिन की बाद में। इसी क्रम में इसी सोशल मीडिया पर मौजूद दक्षिणपंथी टीवी की आलोचना करने लगे कि ओवैसी की खबर सिकुलर मीडिया जानबूझ कर नहीं दिखा रहा है। चौबीस दिसंबर का भाषण अभी तक नहीं दिखाया जबकि सबको मालूम है कि उस दिन टीवी दिल्ली गैंगरेप के मामले में डूबा हुआ था, लेकिन दक्षिणपंथी सोशल मीडिया के दबाव में कई चैनल जल्दी आ गए और गैंगरेप की ख़बरें छोड़ ओवैसी के पीछे पड़ गए। वैसे यह खबर भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी, चर्चा करनी ही चाहिए थी लेकिन तब सिर्फ यही खबर क्यों। सचिन तेंदुलकर वाली खबर क्यों नहीं। वो किस मामले में कम महत्वपूर्ण था। अलग अलग सामाजिक समूहों के दबाव में टेलीविज़न दायें बायें होने लगा है। इसी बहाने कुछ मुद्दे पर सरकार को भी चेतना पड़ा। ज़ाहिर है टेलीविजन का इकलौता प्रभुत्व और प्रभाव खत्म हो गया है। ख़ैर।

गैंगरेप मामले मे रिपोर्टिंग कैसी हुई इस पर आने से पहले कुछ बात कहना चाहता हूं। जैसे पल्प फिक्शन होता है वैसे ही पल्प टेलीविजन होता है। भारत में ये पल्प टेलीविज़न का दौर है। पहले आप यह बात हिन्दी न्यूज़ चैनलों के बारे में यह बात कह सकते थे लेकिन अब इंग्लिश चैनल भी यही हो गए हैं। भाषा, प्रस्तुति और प्रोग्राम के मामले में हिन्दी इंगलिस चैनलों का अंतर पहले से कहीं ज्यादा कम हो गया है। हिन्दी और इंग्लिश चैनलों पर ज़्यादतर बहसिया फार्मेट के ही कार्यक्रम चल रहे हैं। पल्प को हिन्दी में लुग्दी कहते हैं। बहुत लोग मुझसे पूछते हैं कि आप चैनल को लैनल क्यों कहते हैं तो मैं लुग्दी से लैनल बनाकर लैनल बोलता हूं। इसका मतलब यह नहीं कि जो पल्प है वो खराब ही है या उसकी लोकप्रियता कम है। बस उसके पेश करने की शैली का मूल्यांकन या विश्लेषण मीडिया के पारंपरिक मानकों से नहीं किया जा सकता।

चैनलों की भाषा, संगीत और तस्वीर पर बालीवुड की भाषा और बहुत हद तक हिन्दी डिपार्टमेंट की दी हुई ललित निबंधीय हिन्दी का बहुत प्रभाव है, मगर लुग्दी टच होने के कारण मैं चैनलों की हिन्दी को लिन्दी बोलता हूं। तो लिन्दी लैनल और इंग्लिश वाले इन्दी लैनल। क्योंकि अब इंग्लिश बोलने का टोन भी हिन्दी जैसा हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पर अच्छी पत्रकारिता नहीं होती है, वो भी होती है और वो कभी कभी पल्प टेलिविजन के दायरे में भी होती है। गैंग रेप मामले में भी बहुत कुछ अच्छा भी हो गया। अंदाज़ी टक्कर में। शैलियों पर बालीवुड और हिन्दी डिपार्टमेंट की हिन्दी के अलावा एक और प्रभाव है टीवी पर। वो है मेरठ माइंडसेट का। हर कहानी को रहस्य और रोमांच में लपेट कर मनोहरकथा की तरह पेश करना। जैसे जाग गया देश, मां कसम बदलेगा हिन्दुस्तान, चीख नहीं जाएगी बेकार, मैं लड़की हूं। इस तरह के शीर्षक और वायस ओवर आपको सुनाई देंगे। सिर्फ गैंग रेप ही नहीं ऐसे किसी भी मामले में जिसे लेकर सोशल मीडिया से भरम फैलता है कि पब्लिक यही सोचती है तो उसकी सोच में बड़े पैमाने पर गाजे बाजे के साथ घुस चला जाए। लैनलों में जो संगीत का इस्तमाल होता है उसका अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए। इसका ज्ञान मुझे कम है। सरसरी तौर पर लगता है कि रेप और डार्क सीन या रेघाने वाली आ आ की ध्वनियों का असर दिखता है। अब यह अलग सवाल है कि इसे व्यक्त करने का दूसरा बेहतर फार्मेट क्या हो सकता था, तो जो नहीं है और जो नहीं हुआ उस पर क्यों बात करें, जो हो रहा है उसकी कमेंटरी तो कर ही सकते हैं।

लैनलों ने जो अभिव्यक्ति के लिए जो फार्मेट गढ़े थे उसका त्याग कर दिया है। स्टोरी टेलिंग की जगह स्टेटस अपटेडिंग हो गई है। लैनल सोशल मीडिया का एक्सटेंशन हो गया है। इसकी समस्या यह है कि अखबार की तुलना में स्पीड की दावेदारी सोशल मीडिया ने खत्म कर दी है। ऐसे मौकों पर न्यूज रूम ध्वस्त हो जाते हैं। न्यूज रूम का पूरा ढांचा ध्वस्त हो जाता है। अमिताभ बच्चन कबीर बेदी, किरण बेदी और राहुल बोस जैसों के ट्विट से शुरू होता है और लैनलों पर घटना को लेकर पूरा माहौल बन जाता है। टीवी अपनी खोजी और गढ़ी हुई खबरों की अनुकृति कम करता है। कुल मिलाकर चैनलों का ट्विटराइजेशन यानी ट्वीटरीकरण हो गया है। स्क्रीन पर चौबीस घंटे बक्से बने होते हैं उसमें लोग बोल रहे होते हैं। ट्विटर या फेसबुक की तरह। आयें बायें सायं। गैंगरेप की घटना के बाद टीवी भी सोशल मीडिया का एक्सटेंशन बन गया। आप कह सकते हैं कि रायसीना हिल्स का विस्तार बन गया। जिस तरह सोशल मीडिया में बातें होती हैं उसी तरह से टीवी में होने लगी।

एक टीवी पर एक लड़की को बास्टर्ड बोलते सुना। खुद मेरे शो में कुछ लोग अनाप शनाप शब्दों का इस्तमाल कर गए। स्मृति ईरानी और संजय निरुपम का प्रसंग को ट्वीटरीकरण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। यह टीवी की नहीं, सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति है। ट्वीटर और फेसबुक अकाउंट से ओपिनियन और सवाल लिये जाने लगे। खाताधारियों को बुलाया जाने लगा। आप ध्यान से देखिये, लैनल सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति के माध्यम बन गए हैं। कम से कम ऐसे मौकों पर तो बन ही जाते हैं। स्क्रीन पर बगल में तस्वीर चल रही है लेकिन सब अपने अपने दिमाग के हिसाब से बोलते जा रहे हैं। कोई परंपरा की बात कर रहा है, भारतीय मूल्यों की बात कर रहा है तो कोई पाश्चात्य मूल्यों को दोष दे रहा है। अनियंत्रित गुस्सा, गाली सब प्रसारित हो रहा है। इससे क्या हुआ कि मेन स्ट्रीम मीडिया का जो अंग था टीवी उसका मार्जिनलाइजेशन होने लगा। वैसे तो सारे मीडिया अब सोशल मीडिया पर है इसलिए सोशल मीडिया ही मेनस्ट्रीम मीडिया है।

एंकर लिंक से लेकर पीटूसी तक सब सोशल मीडिया के रिफ्लेशक्शन लगते हैं। इसमें आप हिन्दी और इंगलिस चैनलों में अंतर नहीं कर सकते हैं। जनमत के नाम पर हर तरह के मत हैं। बस हंगामे की शक्ल होनी चाहिए। इस काम में कई ऐसे मुद्दे ज़रूर आए जिनसे सरकार की शिथिलता टूटी है। यह भी देखना चाहिए। टीवी के सोशल मीडिया में बदलने से, उसके रायसीना में बदलने से बहुत फर्क आ रहा है। यह एक तरह का एक्टिविज्म है जर्नलिज्म नहीं है। उसमें भी खास तरह का एक्टिविज़्म है। इंटरनेट की धड़कन से टेलीविज़न चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से।

तो हम दिल्ली गैंगरेप मामले में सिर्फ रिपोर्ट नहीं कर रहे थे। हम बहाव में बह रहे थे। चैनल जल्दी ही अपनी बनाई हुई कैटगरी से आज़ाद हो गए। तभी ल्यूटियन ज़ोन के कई बड़े पत्रकार इस बात से हैरान थे कि ये रायसीना तक कैसे जा सकते हैं, कैसे प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से मिलने की बात कर सकते हैं, हमें तो इंटरव्यू मिलता नहीं, इन्हें प्रक्रिया प्रोटोकोल नहीं मालूम है। पीएम सिर्फ विदेश यात्रा से लौटते वक्त अपने प्लेन में मीडिया से बात करते हैं। वो या तो ऐसी बातें कह रहे थे या फिर इन बातों की पृष्ठभूमि में भीड़ की आलोचना करने लगे। उन्हें लगा कि ल्युटियन ज़ोन तो प्रोटेक्टेड जोन है यहां कैसे लोग आ सकते हैं वो भी बिना नेता के, वो भी बिना गरीब हुए, किसान हुए। अभिजित मुखर्जी ने तो बाद में डेंटेट पेंटेड की बात कही लेकिन इस भीड़ को कमोबेश इन्हीं शब्दों में पहले से भी खारिज किया जा रहा था। हो सकता है कि ये आलोचनाएं सही हो मगर ल्युटियन कंफर्ट ज़ोन में सिस्टम का पार्ट बन चुके या सिस्टम की आदतों को आत्मसात यानी इंटरनलाइज कर चुके कई बड़े पत्रकारों ने संदेह की नज़र से देखा। यह भी एक कारण तो था ही।

अब इस बहस में अखबार की रिपोर्टिंग को भी लाना चाहिए लेकिन वो मेरा विषय नहीं है। उनकी भाषा और प्रस्तुति पर भी बात होनी चाहिए जो हम नहीं करते हैं। लैनलों की रिपोर्टिंग नीयत में सही थी। वो आजकल चालाक नेता की तरह जनभावना भांप लेते हैं और बयान देने की तर्ज पर अभियान चलाने लगते हैं।  वो तो इसी भाव में रिपोर्ट कर रहे थे कि जैसे आंदोलन के साथ हैं। इस जनाक्रोश के साथ हैं लेकिन जो रिपोर्टिंग हो रही थी और जिस शैली में हो रही थी वो अपने आप में समस्याग्रस्त (प्रोब्लेमेटिक) है। आप उस टीवी से अचानक नारीवादी होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो चार महीने पहले करवां चौथ के मौके पर अपने डिबेट के एक बक्से में चांद को लाइव काट कर रखे हुए था। महिला एंकर तक करवां चौथिया लिबास या भाव में डूबी हुईं थीं। बता रही थीं कि करवां चौथ कैसे करें । टीवी तो भारतीय पंरपरा में नारी के गुण कर्तव्य और अवधारणाओं को इन त्योहारों के कवरेज से गढ़ता चलता है। कभी तो उसने सवाल नहीं किया कि देवी रूप का क्या मतलब है। तो वो रायसीना या जंतर मंतर से अपनी रिपोर्टिंग में देवी के रूप की कैसे आलोचना कर सकता है। बल्कि एंकर से लेकर रिपोर्टर तक की बातों में इस तरह की पंक्तियां आ रही थीं। जिस देश में देवी को पूजा जाता है उस देश में कैसे हो गया। ये भाव था। वही मानव संसाधन जो साल भर घोर पारंपरिक या कई मामलों में स्त्री विरोधी छवियों को गढ़ता है उसी को आप चार दिनों में नारीवादी मूल्यों के प्रति सचेत कैसे बना देंगे। यह ज्यादती होगी।

तो टीवी के पास कोई अपनी भाषा तो नहीं थी। उसके पास अपनी कोई छवि नहीं है। इतनी आलोचना होने के बाद सभी लैनलों पर एक शर्मसार बैठी हुई, सिसकती हुई नारी के ही ग्राफिक्स चल रहे हैं। सिलुएट के अंधेरे में गुम नारी की तस्वीर है। जैसे ही तीन मंत्रियों ने तीन बेटी होने की बात की एक चैनल पर स्टोरी ने क्लास वार के रूप में टर्न ले लिया। आपकी तीन बेटिया हर वक्त सलामी के पहरे में रहती होंगी, क्या वो ऐसे सुनसान बस स्टैंड पर जाती होंगी, बिना जाने कि उनकी क्या स्थिति है,लेकिन रिपोर्टर उनकी विशिष्टता को चुनौती देने लगा। थोड़ी देर के लिए वर्ग युद्ध छिड़ गया। बाद में यह बात भी आई कि बेटी का पिता होने से संवेदनशीलता विशिष्ठ हो जाए यह ज़रूरी नहीं है। दूसरी तरफ मैं लड़की हूं टाइप मेरठ फ्रेम की आत्मकथाएं चलने लगी। फर्स्ट पर्सन अकाउंट में। टीवी भी सोशल मीडिया की तरह फैला हुआ था।

हालांकि इसी बीच वो एडवोकेसी भी कर रहा था लेकिन उसकी भाषा स्लोगन और छंदों में इतनी फंसी हुई लगी कि ऊब और आक्रोश के अलावा समझ की गुजाइश कम नज़र आ रही थी। हिंसा को ही एक्शन मान कर दिखाया गया। शर्म की ढलती शाम के ढांचे टूट रहे हैं, सहमी हुई सांसे बोल रही हैं, दुबके परिंदों की पांखें बोल रही हैं, अब कौन कहे कि दुबके परिंदे का मतलब क्या है। क्या अभी तक आप उन लड़कियों को दुबके परिंदे बोल रहे थे। आप ही जब ऐसा समझ रहे थे तो सरकार और सिस्टम और समाज की क्या बात करें। हालांकि टीवी इस मामले में अपनी भूमिका को सकारात्मक तरीके से देखेगा और कई मामलों में हुआ भी,उसके चाहते हुए और न चाहते हुए दोनों। लेकिन वही बात है जैसे कई लड़के जो खुद को अच्छा समझते हैं या जिन्हें लड़कियां भी अच्छा समझते हैं वो पूरी तरह से अच्छे नहीं होते कम से कम नारीवादी संदर्भ में। सबकुछ नाटकीय क्यों लगने लगता है ये समझ नहीं आता। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे ही लगता है। यह लेख तमाम लैनलों को ध्यान में रखकर लिखा गया है।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग कस्‍बा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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