Shambhunath Shukla : पत्रकारिता का पेशा आपको बोर नहीं होने देता। कुछ न कुछ करने को हर समय रहता है। भले आप डेस्क पर हो या फील्ड में। रोज नया कुछ करने को है, यह सोच-सोच कर आपके अंदर उत्साह बना ही रहता है। इतना कुछ घूमना है और इतना कुछ जानना है कि एक जीवन कम पड़ जाता है। मैंने १९७२ में बीएससी पार्ट वन करने के बाद ही घर छोड़ दिया था। मुझे लगता था कि घर में रहा तो मैं कुछ भी नया नहीं कर पाऊंगा। या तो परिवार के तमाम लोगों की तरह हल चलाऊंगा या फिर कहीं किसी जगह आढ़त खोलकर बैठ जाऊंगा और यही चिढ़ मुझे एक ऐसे पेशे में ले गई जहां अनंत संभावनाएं थीं और हर जगह के रास्ते खुले थे।
मैं घर से भाग गया और कलकत्ता चला गया लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि उस समय वहां नक्सलवाद के नाम पर युवाओं को सरेआम भूना जा रहा था। सिद्धार्थशंकर राय की सरकार थी और अजय मुखर्जी उनके गृह मंत्री। श्याम बाजार, शोभा बाजार, बेंटिक रोड, बहूबाजार, कालेज रोड और बड़ा बाजार में बंगाली छोकरों को पुलिस पकड़कर मार देती। लालबाजार पुलिस हेडक्वार्टर में पुलिस कम एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बैठते थे जिन्हें छोकरों को मार देने में मजा आता था। भाकपा तो खैर सरकार को मदद कर रही ही थी माकपा भी इस मामले में पुलिसिया ज्यादतियों को मूक समर्थन दे रही थी।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से साभार.





