पूर्वी उत्तर प्रदेश का बखिरा ताल इस समय मेहमान पक्षियों का शरणस्थली बना हुआ है। विदेशी मेहमान पक्षी अपने साथियों के साथ कलरव करते इस ताल में दिखाई दे रहे हैं। पूर्वांचल का यह ताल 2894 वर्ग किमी में फैला हुआ है। 1990 में सरकार द्वारा इसे बखिरा पक्षी विहार घोषित किया गया है।
1085 किमी की परिधि में आस-पास के गॉवों में पक्षियों के साथ में कोलाहल मची हुयी है। लगभग 10 हजार की संख्या में एक साथ पक्षियों का उड़ना और कोलाहल करना सबको मंत्रमुग्ध करता है। इन्हें देखने के लिये स्थानीय जिलों से सैलानी तो आ ही रहे हैं, वहीं पक्षीय विशेषज्ञ भी अपना डेरा जमाये हुये हैं।
शैवाल, अन्य छोटे पौधे, घोंघे, कीड़े और बहुतायत में मछलियां यहां पक्षियों को आकर्षित करती हैं। विभिन्न किस्मों के छोटे जलीय जीव लगभग 5000 किमी से अधिक दूर से आने वाले साईवेरियन पक्षियों के लिए खाने का माध्यम बनते हैं। वन विभाग इनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिये उत्सुक दिखायी दे रहा है।


क्यों आते हैं पक्षी
साईबेरिया देशों में दिसम्बर से मार्च तक तापमान लगभग शून्य से 20 डिग्री तक नीचे चला जाता है। वहां ताल नदियॉ, झीलें सब बर्फ के रूप में तब्दील हो जाती हैं। ऐसे में पक्षियों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। ठिठुराने वाली ठंड के कारण खाना बनने वाले जीव या तो मर जाते हैं जमीन में छिपकर शीतनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिये पक्षियों को अपना भोजन खोजना और जिन्दा रहना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पक्षी भारत जैसे गरम देशों में चले जाते हैं जहॉ आसानी से अपना भोजन मिल जाता है और झीलों में पानी, हरीयाली बनी रहती है। जहॉ एक ओर ग्लोबल वार्मिंग की दिक्कत वहीं कजाकिस्तान उजबेकिस्तान और तुर्कीमिस्तान में इनके प्रतिकूल मौसम भारत के तरफ इनको खींच लाती है। दिसंबर के महीने में भी ठंडक सामान्य से भी ज्यादा ठीक रहता है। यहां इन्हे संरक्षण एवं संवर्धन भी प्राप्त होता है। बखिरा में सैलानी पक्षियों के प्रवास में दो फीसदी की वृद्धि इस वर्ष दर्ज हो चुकी है।
कैसे करते हैं यात्रा
विदेशी पक्षी लाखों की संख्या में जब हमारे देश में आते हैं तब एक प्रश्न उठता है कि यह हमें ये यात्रा के दौरान दिखाई क्यों नहीं देते? दरअसल ये रात के समय ही उड़ान भरते हैं और इनके बड़े-बडे़ झुण्ड लगभग 8 हजार मीटर से भी उपर से उडा़न भरते हैं, ऐसे में हम उन्हें देख नहीं सकते। लगभग प्रत्येक साल आने वाले ये पक्षी अपने जेनेटिक गुण के कारण रास्ते की जानकरी अच्छी तरह से याद रखते हैं।
मेहमान कैसे-कैसे
इन बखिरा ताल में आगन्तुकों में साईबेरियन सारस, किंग फिशर, गुलाबी मैना, ग्रेटर फ्लेमिंगों, कामन ग्रीन शैंक, नार्दन पिन लेट, रोजी पेलिकन, गैडवेल, कैमा हेरीवन, सुर्खाव समेंत दर्जनों विदेशी मेंहमानों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है।
बखिरा ताल की सुरक्षा
ताल की सुरक्षा के लिये विभाग ने लगभग ताल को 20 जोन में बॉट दिया है। ताल के अगल-बगल किटनाशक दवाओं का प्रयोग पूर्णतया से बंद करा दिया है। इनके संरक्षण के लिये वाच टावर से रखवाली की जा रही है। वहीं पक्षी विशेषज्ञ और बखिरा के रेन्जर आर0 एन0 चौधरी पक्षियों को सुरक्षा के लिये वर्कशाला आयोजित कर लोंगो को जागरूक कर रहे हैं।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.





