: उपन्यास अंश : बडा मनहूस है इस बार का इलेक्शन. ठीक पहले सूखा पडा. गांव में १६ आना धान किसी को नहीं है. आधे लोगों का आठ आना धान मराता खाता चला गया. धान की बालियां बरछी की तरह खडी हैं. चंवर ने नहीं सम्हाला होता तो गांव के ज्यादातर किसान परदेस भागने पर मजबूर हो जाते. लोग सोच रहे हैं बखार कितनी भरेगी, कै महीने तक मिलेगा भात. अगर बेटा मनीआडर नहीं भेजा तो क्या होगा?…… इसी में लोग घर-घर घूमकर वोट मांग रहे हैं.
एक-एक घर पर नजर है. यहां तक कि सरपंच जी की बंगलादेशी पत्नी गांव की अपनी ४ सताजीय दीदियों के पास चार बार हो आई है, आपनार चार टे वोट अमूल्य. लोग उतने उत्साहित नहीं है. हल कुदाल, खाद-बीया के चक्कर में महाजनों के यहां व हितई-पहुनई दस्तक दे रहे हैं लोग. भोला बाबू ने तो मुखिया जी से ही हंसते-हंसते कह दिया था कि हम आपको वोट देंगे, आप हमें खाद-बीया दिलवाइये. बिस्कोमान का चक्कर लगाते-लगाते तो अगहन आ जाएगा. गांव के प्राथमिक विद्यालय के पास वाले मैदान में मुखिया जी की जनसभा भी हुई थी. ५ साल की उपलब्धियों का गुणगान किया उन्होंने. विकास के आंकडों की स्लिप भी हाथ में थी. बताया कि उनके शासनकाल में मियां टोली में अण्डों का उत्पादन कितना बढा है, हरिजन टोली में बने टोकरे इस बार जवार में छाए रहे, गोलू धोबी की आमदनी में २४ प्रतिशत का इजाफा हुआ है.
अकेला ने तैयार किये थे आंकडे. पर जनसभा में मार होते-होते रह गयी. मण्डल टोली के एक उग्र तत्व ने भरी जनसभा में पूछा मुखिया जी से, मिया टोली में अण्डों का उत्पादन बढा तो इसमें आपका क्या योगदान था? हरिजन टोली में क्या मुफ्त में बांस बांटे गये थे? इस पर मुखिया जी के लठैत उस तत्व को सबक सिखाने के लिए डांड में अंगौछा बांधकर उद्धत हो उठे थे, पर उन्होंने मना कर दिया, इस समय शांति बहुत जरूरी है, जो होगा सो एके दिन. अकेला की पदोन्नति हो गयी है, उसे मुखिया जी ने राजनीतिक सलाहकार बना दिया है. उसी की सलाह पर मुखिया जी ने अपने पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए एक आठ सदस्यीय टीम गठित करने की घोषणा की और उसमें हर टोले के एक-एक व्यक्ति को शामिल किया गया. मतदान से ४ दिन पहले ही टीम की रपट आ जाएगी.
चिनगारी को टीम में शामिल नहीं किया मुखिया जी ने. कवि हृदय आदमी है चिनगारी, भावनाओं के ज्वार में वह कही सच न बोल दे, इसलिए मुखिया जी पहले ही सजग हो गये. हर टोले के अपने एक-एक कट्टर समर्थक को कमेटी में शामिल किया है मुखिया जी ने. मण्डल टोली के श्री प्रसाद पर जांच टीम से अलग होने के लिए दबाव डाल रहे हैं सेनापति.
इस बीच, कतिकी बावग कपार पर आ गया. सूखे के कारण खेत पहले ही फरहर हो गये. चंवर तो तडक गया है. चुन्नी-चुन्नी कर जोतना पडेगा. बावग के लिए कट्ठा भर में लगेगा एक हल, पर रहसू का धवरा बैल आज ४ दिनों से नहीं खा रहा है. सारे उपाय कर चुका है. बदल-बदल कर खिलाया लेहन, जीभ पर कई बार नमक रगडा, हिमालय बत्तीसा के कई पैकेट खिला चुका, पर बैल गवत ही नहीं उठा रहा है. रहसू अपने बेटे सिमंगल पर बरसा, कइसा बैल खरीद लाया ससुरा. फिर लाठी उठाकर एक लाठी जमा दी. ठांय्ा की आवाज सुनकर पत्नी मुनिया बाहर निकली. आंखें तरेरते हुए बोली, गंडासा लाकर काट दो, लाठी से काहे मारते हो निरदयी लेहन नहीं सूंघता है, जीव में तकलीफ है तब्बे नू? मुनिया की डांट से नरमाए रहसू ने सिमंगल से कहा, नाधो बिना खाए ही सरऊ को. हेंगा गाहने पर ही भूख आएगी. पर जुआठ देखते ही धवरा बैठ गया, फिर कोटिन उपाय हुए पर नहीं उठा वह. मुनिया ने मनौतियां की. कई लोगों ने कहा कि उसे चमार ने पकडा है.
अगले दिन ओझा जी बुलाए गये. दूर से ही गरजे, ठहर-ठहर आ गया. धवरा की हालत देख पहले ओझा जी रहसू पर ही बिगडे, केतने बार बोला है पुरानका बंसवार में बैल मत बांधो. रात में जब बांस पडपडाता है तो कान में ठेपी लगाए रहते हो क्या? ओझा जी काली स्थान से मंगाई गयी राख उसकी देह पर मलने लगे. बीच में छोड-छोड कह कहकर नगाडा हुए पेट पर जोरदार थप्पड मारते. धवरा की आंखों से पातिन लोर बह रहा था. ओझा जी जारी रहे,रोता क्यों है पाजी? छोड-छोड, गौ का जाया…….छोड……… दर्द से छटपटाने लगा धवरा, लोर से मुनिया का आंचर भी नहा रहा था. चमार को हटाने के लिए ओझा जी ने अपने तमाम इष्टों को बुलाया. अंत में यह कहकर गये कि दू-तीन घण्टे में निरोग हो जाएगा धवरा. मुनिया ने चूल्हा नहीं जलाया. सबको चूडा-सत्तू फंकाया और खुद भी बचा-खुचा खाकर बिछावन पर लेट गयी.
बावग के ऐन मौके पर बैल की बीमारी. किसान का दाहिना हाथ ही है यह गौ का जाया. रहसू को लगा कि उसके दाहिने हाथ में एक बडा फोडा फूट पडा है और दर्द से छटपटा रहा है वह, नींद नहीं आ रही उसे!
अगले दिन धवरा की हालत और खराब हो गयी. पेट तो नगाडा की तरह फूला ही हुआ था, अब वह गर्दन भी ऐंठने लगा था. नाक से पीला द्रव वह रहा था. मुनिया तो एकदम पागल सी हो गयी थी. एक छिन घर में रहती, फिर बाथान आ जाती. कभी धवरा का पेट सहलाती तो कभी मुंह के पास रोटी ले जाती, पर वह सूंघता तक नहीं था. धवरा की हालत देखकर मुनिया के साथ आई पडोसन ने कहा, ई तो देवता-देवी का करोध जान पडता है सीमंगल की माई! कोई भखौती बाकी है क्या? पर साल वाले बैल को लेकर कई भखौतियां भाखी थीं, पर सब पूरी नहीं हो पायी थीं. मुनिया ने अभाव वाली बात छिपाते हुए जवाब दिया, हां चाची जी! मैया को कडाही चढाने के लिए भाखी थी, पर खरवांस-पितरपच्छ में कइसे चढाती?
पडोसन ने सलाह दी, पुजहाई में ई सब थोडे ही देखा जाता है, कल चुनरी मंगा कर चढा दो, बीच में बोला सीमंगल, अब तो डागडरी इलाज कराना होगा.
मुनिया सीमंगल को घूरते हुए बोली, डागडरी अब काहे की. डागडर सूई देगा, मइया बिगड जाएगी. फटर-फटर अधिकई मत बोल.
डागडर बुलाकर डाका नहीं डलवाना है. रहसू ने भी एक तरह से मुनिया का पक्ष लिया और खरबिरवा (जडी बूटियांवाला) इलाज करता रहा. दिन भर कान्ही-कान्ही भटकता और चानपट्टी के भगत जी द्वारा बताई गयी जडी-बूटियां इकट्ठा करता. दो दिन तक दवा होती रही, पर कोई फायदा नहीं हो रहा था. अंततः सीमंगल के टोकने के कारण रहसू डाक्टरी इलाज पर राजी हुआ. पर समस्या थी पैसे की. घर में खाद-बीया के लिए भी पैसा नहीं था. अब तो हल भी खरीदना ही था. मुनिया ने इस संकट का हल सुझाया. चढावे वाली पीतल की बटुली बेचने का फैसला हुआ. सीमंगल जब साइकिल के कैरियर पर बोरे में बटुली रखकर बेचने जा रहा था, किसी ने पूछा, बोरे में क्या है सीमंगल? सीमंगल ने बिना लटपटाए कहा, कुम्हडा है. मौसी के यहां पहुंचाने जा रहा हूँ.
बटुली २00 रुपये की हुई. मुनिया को भी चढावे की ताल कटने लगी. पर सीमंगल ने साफ-साफ कहा चुनरी कहाडी पैसा बचने पर ही चढेगी. जल-भुन कर मान गयी मुनिया. पास के पशु-चिकित्सा केन्द्र के दूबे जी ने दो दिनों में डेढ सौ ले लिया. जो दवाएं दी गईं, उनसे रोग और बढ ही गया. अब धवरा की हड्डियां जैसे चमडे से बाहर निकलने लगी थीं. दुबराकर रहेठा हो गया. रहसू नहर से हरी-हरी घास छील लाता, पर धवरा तो जैसे अनशन पर बैठा था. कई किसानों के खेत में सरसों के पौधे चार-चार पत्ते के हो गये थे, पर रहसू के खेतों में लम्बी-लम्बी दरारें पड गयी थीं, जैसे हल, कुदाल और बीज मांग रही हों. हरे-भरे खेतों के बीच रहसू का खेत विधवा की मांग वाली लकीर जैसा सा लगता. राहगीर कहते, किस करमफुट्ट का खेत है भाई, चुन्नी ओदारकर हेंगा देता तो भी चल जाता. रहसू और मुनिया खेतों की तरफ नहीं जाते, फिर टैम भी कहां मिलता था, दिन भर धवरा को अगोरते रहते.
शाम को पछुआ सनसना रहा था. शीशम के पत्तों के बीच में सूखा गोबर डालकर घूर बनाया रहसू ने धराई आग, हाथ-मुंह दोकर जोगिरन भी घूर के पास आया, बोला, घेंट सीधा कर दो रहसू काका. अब तो गाडने के बेर ही सीधा करूंगा. सांस छोडते हुए रहसू ने कहा. यह ऐसी अवस्था थी, जब मनुष्य हताश हो वर्तमान विपत्ति से पीडित होना छोड देता है. रहसू चाहता था कि धवरा मर जाय्ा, ताकि अब खेती-बारी के विषय में कुछ सोचा जाये. सुबह धवरा को कोई परेशानी नहीं थी. अब न वह कूंखता था और न पैर ही पटकता था. अब किसी सोखा या डाक्टर के पास जाने की भी जरूरत नहीं थी. जरूरत थी एक कुदाल की, जिससे एक गड्ढा खोदकर उसे धरती की गोद में सुला दिया जाता. सारे रोगों का एक इलाज मौत उसे प्राप्त हो गयी थी. मुनिया मुंह पर चावल रखकर जल का अर्घ्य देते हुई बुदबुदायी, लो छठ मइया, आज मैं साल भर की कमाई और ६ महीने की भूख तुझे चढा रही हूँ. अब से खुश रहना.
लेखक बिमल राय कोलकाता के स्वतंत्र पत्रकार हैं. शुरुआत साहित्य लेखन से ही, पर आजीविका के लिए पत्रकारिता को चुना. यह अंश उनके अप्रकाशित उपन्यास गांव-गिरांव से लिया गया है. बिहार के गोपालगंज जिले के पचफेडा गांव में जन्मे बिमल राय सन्मार्ग, प्रभात खबर और चौथी दुनिया में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क 09830520445 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





