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सत्‍ता बदलते ही बदलने लगा नेशनल दुनिया का तेवर

नेशनल दुनिया में आलोक मेहता का राज समाप्‍त होने का असर अखबार पर भी दिखने लगा है. पिछले कुछ दिनों में अखबार का लुक चेंज नजर आने लगा है. केवल लुक ही नहीं कंटेंट का तेवर भी पूरी तरह बदला-बदला दिख रहा है. अब तक यह अखबार अपनी ही बातों को झुठलाने या ज्‍यादातर हवाहवाई खबर लिखने वाला पम्‍पलेट नजर आता था, पर प्रदीप सौरभ के संपादक बनने के बाद उनकी सोच और कार्यप्रणाली का असर इस अखबार पर दिखने लगा है. 

नेशनल दुनिया में आलोक मेहता का राज समाप्‍त होने का असर अखबार पर भी दिखने लगा है. पिछले कुछ दिनों में अखबार का लुक चेंज नजर आने लगा है. केवल लुक ही नहीं कंटेंट का तेवर भी पूरी तरह बदला-बदला दिख रहा है. अब तक यह अखबार अपनी ही बातों को झुठलाने या ज्‍यादातर हवाहवाई खबर लिखने वाला पम्‍पलेट नजर आता था, पर प्रदीप सौरभ के संपादक बनने के बाद उनकी सोच और कार्यप्रणाली का असर इस अखबार पर दिखने लगा है. 

गौरतलब है कि आलोक मेहता के 'शासनकाल' में यह अखबार कांग्रेस का मुख पत्र जैसा दिखने और समझ में आने लगा था. इसका कारण माना जा रहा था कि आलोक मेहता का झुकाव कांग्रेस की तरफ है. लिहाजा यह एक पार्टी का अखबार बन गया था इसलिए दूसरे दलों से संबंध रखने वाले लोग इससे खुद को कनेक्‍ट नहीं कर पा रहे थे. अब सत्‍ता में बदलावा का असर अखबार पर साफ साफ दिखाई पड़ रहा है. कंटेंट के तेवर भी बदल गए हैं.

सूत्रों का कहना है कि वरिष्‍ठ तथा बुद्धिजीवी पत्रकार प्रदीप सौरभ ने अखबार को निष्‍पक्ष बनाने पर जोर देना शुरू कर दिया है. इसी का असर है कि अखबार अपने मूल स्‍वरूप से बदलकर निखरने लगा है. हालांकि खबर यह भी है कि आलोक मेहता भी कार्यालय में आकर कुछ घंटे समय बिता रहे हैं, परन्‍तु अखबार में उनका दखल पूरी तरह खतम हो गया है. लोगों का कहना है कि आलोक मेहता न जाने किस मिट्टी के बने हैं कि इतना इशारा होने के बाद भी टिके हुए हैं. 

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