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लखनऊ

दलित-पिछड़ों का आरक्षण बना सपा-बसपा के लिए सत्‍ता की सीढ़ी

उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों को लुभाने के लिए समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच गला काट प्रतियोगिता चल रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती जहां दलित वोट बैंक को अपनी जागीर समझती हैं, वहीं सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने को पिछड़े वर्ग का रहनुमा मानते हैं। इसके उलट सर्वजन हिताय की बात करने वाली माया को जहां पिछड़ों से परहजे है तो वहीं समाजवादी सोच रखने वाले मुलायम को दलितों की राजनीति रास नहीं आती है।

उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों को लुभाने के लिए समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच गला काट प्रतियोगिता चल रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती जहां दलित वोट बैंक को अपनी जागीर समझती हैं, वहीं सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने को पिछड़े वर्ग का रहनुमा मानते हैं। इसके उलट सर्वजन हिताय की बात करने वाली माया को जहां पिछड़ों से परहजे है तो वहीं समाजवादी सोच रखने वाले मुलायम को दलितों की राजनीति रास नहीं आती है।

बसपा और सपा के बीच दलितों और पिछड़ों को लुभाने का खेल लंबे समय से चल रहा है। यह वोटर दोनों ही दलों के नेताओं के लिए ‘सत्ता की सीढ़ी’ की तरह काम करते हैं। मुलायम सिंह यादव पिछड़ा वोट बैंक के सहारे तो मायावती दलित वोटरों के सहारे कई बार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ चुकी हैं। यही वजह है जब बसपा का शासन होता है तो दलितों का पलड़ा भारी हो जाता हैं, वहीं समाजवादी सरकार में पिछड़ा वर्ग के मतदाता ‘शेर’ बन जाते हैं। दोनों ही दलों के नेताओं द्वारा सत्ता हासिल करते ही एक-दूसरे के वोट बैंक को नेस्तानाबूत करने की कोशिश शुरू हो जाती है। इसके लिए इन दलों के नेता नित्य नये-नये पैतरे अजमाते रहते हैं। इन्हीं वोटरों के सहारे सपा-बसपा 2014 में भी अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं।

मुलायम समाजवादी पार्टी को बसपा और अन्य दलों से भिन्न बताते हुए कहते हैं कि हमारी पार्टी लोकतांत्रिक पार्टी है। हमारा विश्वास लोकतांत्रिक समाजवाद में है। यहां “दबी मुठ्ठी, खुली जबान“ की नीति है। यानी अनुशासन के साथ बोलने की आजादी है। पिछले पांच सालों में न तो कोई बसपा नेताओं से मिल सकता था, नहीं उसे पार्टी में भी अपनी बात रखने की आजादी थी। समाजवादी पार्टी में सबको आजादी है। बसपा और सपा के बीच लगातार तलवारें खिंचती जा रही हैं। बीते दिनों प्रोन्नति में आरक्षण के मसले को लेकर जिस तरह से दोनों दलों में टकराव खुलकर समाने आया था वह यह जानने-समझने के लिए काफी था कि प्रदेश में जातिवाद की राजनीति की जड़ें कितनी गहरी हैं।

2014 पर नजर लगाये सपा प्रमुख आजकल पिछड़ों को लुभाने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं। प्रदेश में शासन और प्रशासन स्तर के महत्वपूर्ण पदों पर योग्य अधिकारी को बैठाने की बजाये अधिकारियों की जाति देख कर पोस्टिंग की जा रही है। इसी के चलते कुछ वर्ग विशेष के अधिकारियों का शासन-प्रशासन में दबदबा हो गया है। सपा नेता लगातार पिछड़ों की दुर्दशा के लिए बसपा को कोस रहे हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के नाम पर दलितों का हिस्सा मार कर उन्हें (पिछड़ों को) देने की भी साजिश रची जा रही है। जबकि सत्ता से दूर हो चुकी मायावती नहीं चाहती दलितों की श्रेणी में और जातियां शामिल हों, इसी लिये वह दबाब की राजनीति छेड़े हुए हैं।

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पिछड़ों का पक्ष लेते हुए कहते घूम रहे हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक न्याय के लिए पिछड़ों और वंचितों के लिए विशेष अवसर के सिद्धांत की पोषक है। उनको उनके अधिकार दिलाने के लिए समाजवादी पार्टी बराबर संघर्शशील रही है। समाजवादी पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में पिछड़ों और वंचित समाज से किये गये सभी वायदे पूरे किये जाएंगे। मुलायम पिछड़ों की हालत से दुखी हैं, पिछड़ों की दुर्दशा के पीछे उन्हें बसपा सुप्रीमो की साजिश नजर आती है। वह कहते हैं कि बसपा राज में निहित स्वार्थ में पिछड़ों का सबसे अधिक नुकसान हुआ। बसपा से पहले उनकी (मुलायम) सरकार ने इन वर्गों के लिये कई योजनाओं और सुविधाओं की शुरुआत की थी, लेकिन बसपा सरकार बनते ही उसकी सुप्रीमो मायावती ने इन योजनाओं और सुविधाओं को समाप्त कर दिया।

गौरतलब हो वर्ष 2005 में मुलायम के मुख्यमंत्रित्वकाल में 17 पिछड़ी जातियों राजभर, निषाद, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिंद, प्रजापति, धीवर, बियार, केवट, बाथम, मछुआ, तुरहा, मॉझी, गौड़ को अनुसूचित जाति को मिलने वाली सभी सुविधाएं देने की अधिसूचना जारी हुई थी। सन् 2007 में बसपा सरकार ने इन जातियों को प्राप्त सुविधाओं से वंचित कर दिया था। तब से ये जातियां लगातार आंदोलन कर रहीं हैं। श्री यादव ने भरोसा दिलाया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की प्रदेश सरकार पुनः 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएं देने का अपना वायदा निभाएगी।

दरअसल, इस समय उत्तर प्रदेश में सामाजिक रूप से पिछड़ी बिरादरियों की श्रेणी में 126 जातियां सम्मलित हैं। इन सभी जातियों को भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण की श्रेणी में रखा गया है। इसमें से 79 जातियां पिछड़ा वर्ग की हैं, जबकि दलित वर्ग में आने वाली जातियों की संख्या भी 47 हैं। संविधान के अनुसार सरकारी नौकरियों और योजनाओं आदि में पिछड़ों को 27 प्रतिशत और दलितों को 22 प्रतिशत तथा सर्वाधिक अनुसूचित, जनजाति को एक प्रतिशत आरक्षण का फायदा मिलता है, ताकि उनका सामाजिक स्तर उठाया जा सके। यहीं से जातिवाद की राजनीति की शुरुआत होती है, मुलायम पिछड़ा वर्ग से आते हैं तो मायावती दलित हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। इसी का फायदा दोनों दलों के नेता अपने वर्ग के वोटरों के सहारे उठाते रहते हैं। सपा चाहती है कि पिछड़ा वर्ग की सूची से कुछ बिरादरियों को निकाल कर अनुसूचित जातियों में शामिल कर दिया जाये जिससे दलितों में भी समाजवादी पार्टी की भागेदारी ठीकठाक दिखे।

मुलायम की सोच है कि यदि वे पिछड़ों की सूची से 17 जातियों को निकलवा कर दलितों की सूची में जुड़वा दें तो उन्हें यह दावा करना आसान रहेगा कि अब दलितों का एक वर्ग उनकी समाजवादी पार्टी के साथ है। वास्तव में मुलायम सिंह पिछड़े वर्ग की सभी 79 जातियों के एकछत्र नेता कभी नहीं रहे हैं। पिछड़ों में यादव (अहिर) सहित कुछ गिनी चुनी जातियां ही हैं जिन्हें मुलायम समर्थक माना जाता है। पिछड़ों में शामिल कुर्मी तथा वैश्य समाज की अनेक उपजातियां जैसे तेली, हलवाई, कलवार, कलार, कलाल, जायसवाल, गुलहरे, शिवहरे, बाथम, रौनियार या तो कांग्रेस के साथ रहती है या भाजपा के साथ। इसी 16 फरवरी को 17 अति पिछड़ी जातियों (निषाद, राजभर, भर, कश्यप, प्रजापति, कहार, धीमर, धीवर, कुम्हार आदि) के एक सम्मेलन में अखिलेश यादव ने यह घोषणा कर दी कि इन जातियों को एससी (दलित) में शामिल करने का प्रस्ताव केन्द्र को भेज दिया गया है। अब प्रति वर्ष 5 अप्रैल को निषादराज जयन्ती पर सार्वजनिक अवकाश रहेगा। समाजवादी पार्टी का यह दांव पिछड़ों के लिये इसलिये भी फायदेमंद है कि उनकी 79 जातियों की सूची से 17 बाहर हो जाने के कारण अब 62 जातियों में ही 27 प्रतिशत आरक्षण का बंटवारा होगा। जाहिर है सपा का यह एक तीर से दो निशाने साधने वाला दांव है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सपाई घोषणा को राजनीतिक नाटक बताया है। उनका तर्क है कि किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। या अधिकार संसद को है। पहले भी सपा ऐसा नाटक कर चुकी है।

मुलायम भले ही पिछड़ों की दुर्दशा का ठीकरा बसपा सुप्रीमो पर फोड़ रहे हों लेकिन इसके पीछे उनका मकसद शुद्ध रूप राजनैतिक है, वह जानते हैं कि दलित वोटर तो उनके पाले में निर्णायक रूप से आने से रहे। ऐसे में दलितों और पिछड़ों को बांट कर फायदा उठाना बेहतर राजनीति होगी। उनका पूरा ध्यान पिछड़ा वर्ग और मुसलमानों को अपने साथ खड़ा करने पर लगा है। इसी लिये वह मौके-बेमौके पिछड़ों और मुसलमानों की तारीफ में कसीदे भी पढ़ते हुए कहते रहते हैं कि विधान सभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की अकेली बहुमत की सरकार बनना कोई मामूली बात नहीं है। इससे पूरे देश में पार्टी का सम्मान बढ़ा है और सभी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि लोकसभा में भी ऐसी ही शानदार सफलता समाजवादी पार्टी को मिलेगी। इतना ही नहीं मुलायम यह भी जानते हैं कि विधान सभा चुनाव के समय उनके साथ जो बिरादरियां एकजुट थीं उन्हें वोट बैंक में बदलने का काम उनके कार्यकर्ताओं ने ही किया था। लोकसभा चुनाव में भी वह इसे दोहराना चाहते हैं। इसी लिए वह बार-बार कार्यकर्ताओं को आगाह करते रहते हैं कि सरकार आपकी है इसलिए आपके आचरण में विनम्रता और बोली में मधुरता होनी चाहिए। वोट आपके व्यवहार पर मिलता है। समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं को अन्याय का विरोध करना चाहिए पर यदि किसी कारण प्रतिरोध न कर सकें तो भी अन्यायी के साथ नहीं खड़ा होना चाहिए।

वह लोकतंत्र एक बड़ी ताकत बताते हुए कहते हैं कि समाजवादी हमेशा जातिवाद और सांप्रदायिकता के विरोधी रहे हैं। समाजवादी पार्टी त्याग-तपस्या करने वालों की पार्टी है। इसमें गरीबों की तादाद बहुत ज्यादा है। वह माया का नाम लिये बिना उन पर निशाना भी साधते हैं और कहते हैं कि कुछ लोग गरीबों की बात तो करते है परन्तु उनके नेताओं का चरित्र गरीब विरोधी है। ऐसे नेता भ्रष्ट और विकास विरोधी हैं। एक पार्टी में गरीब हैं किन्तु उसकी नेता अरबपति है जो 50-50 लाख के नोटों की माला पहनती हैं। जिनके खाने का इंतजाम नहीं, झोपड़ी में जिन्दगी काट रहे हैं, दोनों वक्त घर में चूल्हा नहीं जलता उनके नाम पर लाखों की चन्दे की रसीदें काटी गई। वस्तुतः यह धन उद्योगपतियों से और डरा धमकाकर व्यापारियों, अधिकारियों, पार्टी के नेताओं से वसूला गया काला धन है। इस सबकी सही तरीके से जांच हो तो उन्हें जेल जाने से कोई बचा नहीं पाएगा। श्री यादव ने इमरजेंसी की याद करते हुए कहते हैं कि आपातकाल लोकतंत्र के खिलाफ षडयंत्र था। उस समय सारी नागरिक स्वतंत्रताएं खत्म हो गई थी। पूरे देश में एक लाख लोग जेल में डाल दिए गए थे, जिनमें 32 हजार लोग उत्तर प्रदेश के थे। लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में समाजवादियों से बढ़-चढ़कर अपनी हिस्सेदारी निभाई थी। लोकतंत्र की यह लड़ाई हमेशा हमें प्रेरणा देती रही है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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