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बगावत कर सकते हैं अमर उजाला, बनारस के पत्रकार!

अमर उजाला, बनारस यूनिट में इन दिनों कर्मचारियों में तनाव है. संपादक द्वारा छोटी-छोटी बातों पर अनुशासन की चाबुक चलाए जाने से कर्मचारी बगावत के मूड में हैं. सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से मीटिंग में संपादक के सामने ऊंची आवाज में बातें हो रही हैं उससे किसी दिन अप्रिय घटना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. कारण बताया जा रहा है कि संपादक छोटी-छोटी बातों पर सजा देने के साथ कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से फटकारते रहते हैं.

अमर उजाला, बनारस यूनिट में इन दिनों कर्मचारियों में तनाव है. संपादक द्वारा छोटी-छोटी बातों पर अनुशासन की चाबुक चलाए जाने से कर्मचारी बगावत के मूड में हैं. सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से मीटिंग में संपादक के सामने ऊंची आवाज में बातें हो रही हैं उससे किसी दिन अप्रिय घटना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. कारण बताया जा रहा है कि संपादक छोटी-छोटी बातों पर सजा देने के साथ कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से फटकारते रहते हैं.

अभी दो-तीन पहले मीटिंग में पांच से दस मिनट लेट आने वाले सिटी के तीन पत्रकारों की वीकली आफ संपादक ने निरस्‍त करवा दिया. अब बताया जा रहा है कि संपादक ने एररलेस अखबार निकालने की चेतावनी देते हुए कहा है कि जिससे भी गलती होगी उसे सजा भुगतना होगा. साथ ही ब्‍यूरो से आने वाली खबरों को रीराइट करके लगाने का फरमान भी जारी कर दिया गया है. खबर है कि पहले सब एडिटर और सीनियर सब एडिटर अपने पेज खुद तैयार करते थे, परन्‍तु संपादक के नए फरमान के बाद अब पेज पेजीनेटर तैयार करेंगे. इसके साथ ही ब्‍यूरो यानी जिलों से आने वाली खबरों को सब एडिटर रीराइट करके लगाएंगे.   

यहां काम करने वाले कर्मचारी परेशान है कि एक-एक उपसंपादक पर कई जिलों की जिम्‍मेदारी रहती है, इस स्थिति में वे कैसे सारी खबरों को रीराइट करके लगा पाएंगे. कुछ कर्मचारियों का कहना है कि वे गलत होने पर सजा पाने को तैयार हैं, परन्‍तु अच्‍छा करने पर प्रोत्‍साहन और पुरस्‍कार भी तो मिलना चाहिए. सिर्फ सजा से काम कैसे चलेगा. पर संपादक जी केवल सजा देने को तैयार हैं प्रोत्‍साहित करने को वो अपनी जिम्‍मेदारी नहीं मानते हैं. बताया जा रहा है कि पिछले दिनों सिटी की मीटिंग में पांच से दस मिनट देरी से पहुंचे कर्मचारियों की एक से लेकर तीन साप्‍ताहिक अवकाशों को खतम कर दिया गया. इतना ही नहीं संपादक छोटी-मोटी गलती होने पर कर्मचारियों की सैलरी भी कटवा रहे हैं.

सब मिलाकर अमर उजाला, बनारस में कर्मचारी तनाव के साथ काम कर रहे हैं. अच्‍छा करने के प्रयास में तथा दबाव में गलतियां भी ज्‍यादा हो रही हैं. तनाव-दबाव से आजिज कई लोग दूसरे संस्‍थानों में भी झांका-ताकी करने लगे हैं ताकि यहां से बाहर निकल सकें. ब्‍यूरो में भी कई लोगों को फोर्स लीव पर भेजे जाने की खबर है. वैसे भी ब्‍यूरो में किसी को एक दिन का साप्‍ताहिक अवकाश नहीं मिलता, इस स्थिति में एररलेस काम करना किसी के लिए भी मुश्किल है. वहीं चम्‍मचे टाइप लोग संपादक को चढ़ाकर अपना उल्‍लू से सीधा कर रहे हैं, परन्‍तु संस्‍थान तथा कर्मचारियों का इससे कहीं अधिक नुकसान हो रहा है. अपने पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए पहचाने जाने वाले अमर उजाला जैसे संस्‍थान में इस तरह की कार्रवाई निश्चित रूप से सोचनीय तथा चिंतनीय है.

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