Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

”कोई भी समाचार चैनल लगाइये और देखि‍ए, कैसे ये चवन्‍नी चोर पत्रकार सपनों की हत्‍या करते हैं”

Jagadishwar Chaturvedi : दो दिन की हड़ताल के बाद मीडिया में जनता बनाम मजदूरवर्ग के हितों के सवाल को खड़ा किया जा रहा है। बार-बार यह दिखाया जा रहा है हड़ताल के कारण बीमार को अस्पताल पहुँचने में तकलीफ हुई, बच्चे स्कूल नहीं जा पाए, आदि सामान्य जीवन के त्रासद दृश्यों को मजदूरों की हड़ताल को जनविरोधी साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सच यह है कि अपनी मांगों की सुनवाई के लिए मजदूर सालों-साल इंतजार करते रहे हैं, कोई उनकी बात नहीं सुन रहा। औने-पौने मेहनताने पर काम कर रहे हैं। अधिकांश मजदूर अकल्पनीय शारीरिक कष्ट में रहकर काम कर रहे हैं। मीडिया में मजदूरों के कष्टों को न बताना मजदूरों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यह उल्लंघन हमारा तथाकथित लोकप्रिय मीडिया रोज करता है। वे साल में एक भी दिन मजदूर की बस्ती में नहीं जाते।

Jagadishwar Chaturvedi : दो दिन की हड़ताल के बाद मीडिया में जनता बनाम मजदूरवर्ग के हितों के सवाल को खड़ा किया जा रहा है। बार-बार यह दिखाया जा रहा है हड़ताल के कारण बीमार को अस्पताल पहुँचने में तकलीफ हुई, बच्चे स्कूल नहीं जा पाए, आदि सामान्य जीवन के त्रासद दृश्यों को मजदूरों की हड़ताल को जनविरोधी साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सच यह है कि अपनी मांगों की सुनवाई के लिए मजदूर सालों-साल इंतजार करते रहे हैं, कोई उनकी बात नहीं सुन रहा। औने-पौने मेहनताने पर काम कर रहे हैं। अधिकांश मजदूर अकल्पनीय शारीरिक कष्ट में रहकर काम कर रहे हैं। मीडिया में मजदूरों के कष्टों को न बताना मजदूरों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यह उल्लंघन हमारा तथाकथित लोकप्रिय मीडिया रोज करता है। वे साल में एक भी दिन मजदूर की बस्ती में नहीं जाते।

xxx

मजेदार बात यह है कि प.बंगाल की ममता सरकार और केरल की कांग्रेस के नेतृत्ववाली राज्य सरकार ने हड़ताल करने के अधिकार पर सीधे हमला बोला है। दोनों राज्यों में सरकारों ने बंद विरोधी फैसला लिया और हड़ताल को अवैध घोषित किया है।


Rising Rahul : वाकई ये समय बरबरता और सपनों की हत्‍या का ही समय है। समाचार चैनलों की सुबह की चीख सिर्फ सुबह घर से नि‍कलकर टैक्‍सी या ऑटो का महंगा भाड़ा चुकाने वालों के लि‍ए तेज हो रही है। और अब शाम को काम से सीधे घर लौटकर जाने वालों के लि‍ए। क्‍या फर्क पड़ता है अगर हड़ताल में शामि‍ल लोग अपने सपनों को बचाने की गंभीर जद्दोजहद में लगे हैं। क्‍या फर्क पड़ता है अगर कर्मचारी वि‍देशी नि‍वेश का वि‍रोध कर रहे हैं। क्‍या फर्क पड़ता है कि हड़ताल में शामि‍ल 10 करोड़ से भी ज्‍यादा लोगों ने आज दि‍न का खाना नहीं खाया है। क्‍या फर्क पड़ता है कि उनमें से कई ऐसे थे, जो दो दि‍न बाद कमाएंगे, तब खाएंगे। महत्‍वपूर्ण तो बरबरता और क्रूरता है। कोई भी समाचार चैनल लगाइये और देखि‍ए, कैसे ये चवन्‍नी चोर पत्रकार सपनों की हत्‍या करते हैं। न न, ये मत कहि‍ए कि हाथ बंधे हैं। दम नहीं है आपमें लत्‍तरकार ब्ंधुओं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी और राहुल पांडेय के फेसबुक वॉल से.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...