Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

उस गिरोह में चैनल मालिकान भी शामिल हैं, जिनकी चाकरी हमारे ‘सरोकारी पत्रकार’ बजा रहे हैं

: बनाना चैनलों के मैंगो पिपुल कौन हैं? : अच्छा हुआ कि डेविड कैमरन ने कह दिया कि जलियाँवाला बाग वाली घटना शर्मनाक थी। शर्म  उन्हें सचमुच में आयी या नहीं पता नहीं, पर अपने टीवी एंकरों के कपोलों पर लाली साफ नजर आयी। 'हाय! मैं शर्म से लाल हुई' की तर्ज पर बताने लगे कि हमारे पुराने आका को अपने करतूतों पर शरम आ रही है। जितना कैमरन शर्माये उससे ज्यादा अपने चैनल शर्माये।

: बनाना चैनलों के मैंगो पिपुल कौन हैं? : अच्छा हुआ कि डेविड कैमरन ने कह दिया कि जलियाँवाला बाग वाली घटना शर्मनाक थी। शर्म  उन्हें सचमुच में आयी या नहीं पता नहीं, पर अपने टीवी एंकरों के कपोलों पर लाली साफ नजर आयी। 'हाय! मैं शर्म से लाल हुई' की तर्ज पर बताने लगे कि हमारे पुराने आका को अपने करतूतों पर शरम आ रही है। जितना कैमरन शर्माये उससे ज्यादा अपने चैनल शर्माये।

किसी ने खबर चलायी, किसी ने पट्टी चलायी। शर्माते-शर्माते हड़ताल की खबर भी गायब कर दी या बताने लगे कि देखो ये हड़ताली कितने हुड़दंगी हैं और इन हुड़दंगियों के साथ सख्ती से निपटना चाहिये। रवीश ने तो प्राइम-टाइम में बाकायदा अपनी दुकान सजा ली। मुझे लग रहा थे कि जब सारे चैनल हाथ धोकर मजदूरों के पीछे पड़े हैं तो कम से वे मजदूरों के जीवन की कुछ सचाइयों को उजागर करेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। रवीश को भी कैमरन के शर्म पर गर्व करना ज्यादा भला लगा।

जिन्हें दो सौ सालों तक इस देश को लूटने में कोई शर्म नहीं आयी और जब वे फिर से नवउदारवाद के नाम पर इस देश को नये सिरे से लूटने की योजना बना रहे हों तब उनका शर्म उस भेड़िये के 'संकोच' जैसा है जो मेमने को निहायत बेशर्मी के साथ खा जाने के बाद डकार लेने की विनम्र भूमिका बना रहा हो, जिसकी न तो कोई प्रासंगिकता है न कोई जरूरत। ऐसा भी नहीं है कि कैमरन के इरादों को हिंदुस्तान के स्वार्थी नेता, पूंजीपति और उनके पिछलग्गु पत्रकार समझते न हों।

सब समझते हैं पर राम नाम की लूट में वे भी शामिल हैं, इसलिये देश की जनता को बता रहे हैं कि देखो हमारे पुराने मालिक को अपनी करतूत पर शरम आ रही है। शरमाने के लिये कोकाकोला और ‘अंबानी प्रायोजित सत्यमेवजयते’ वाले आमिर खान को भी साथ लेकर चल रहे हैं। मालिक हैं, फिर भी बेचारे इतना शरम कर रहे हैं! और क्या चाहिये? जान ले लोगो किसी की? इसलिये अपने गिले-शिकवे भूल जाओ और हड़ताल-फड़ताल का नाटक छोड़कर फिर से अपने गोरे-काले आकाओं की सेवा में जुट जाओ।

तो शर्माने के इस खेल में हमारे टीवी पत्रकारों को उस बात पर शर्म नहीं आयी जिस पर उन्हें सचमुच ही शर्म आनी चाहिये थी। 'आगे आती थी हाले-दिल पर हँसी, अब किसी बात पर नहीं आती' की तर्ज पर अब इन्हें किसी बात पर शर्म नहीं आती। खबरों को बेचने में शर्म नहीं आती। मालिक के लिये ब्लैकमेलिंग करने में शर्म नहीं आती। फर्जी स्टिंग करने में शर्म नहीं आती। भूत-प्रेत-नाग-नागिन-भगवान सचिन-देवी राखी सावंत- मटुकनाथ-जूली वगैरह के किस्से-कहानी बनाने में शर्म नहीं आती। हत्यारों के परिवार वाले चैनलों की नौकरी बजाने में शर्म नहीं आती।

पर कम से कम इस बात पर तो शर्म आनी चाहिये थी कि जब देश के सारे मजदूर संगठन अपनी पार्टी लाइन को तोड़कर एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं तो कुछ तो उनकी मांगों-बातों में दम होगा, जिस पर गंभीर चर्चा कर ली जाये। लेकिन नहीं। सारे चैनल यही भोंपू बजा रहे थे कि हड़ताल से आम आदमी को बड़ी परेशानी हो रही है। पता नहीं इन बनाना चैनलों का मैंगो पिपुल कौन है जो पेट्रोल के दाम बढ़ाये जाने, गैस सिलिण्डरों को नियंत्रित करने, कमरतोड़ महंगाई बढ़ाये जाने, रोजगार के अवसर न मिलने, नौकरी में गुलामी जैसे हालात बना दिये जाने और सरकार की बेशर्म जन-विरोधी नीतियों से पूरे साल परेशान नहीं होता पर एक दिन स्टेशन पर आटोरिक्शा नहीं मिलने से परेशान हो जाता है।

यह खेल आज का नहीं है। 1991 में नरसिंहा राव की सरकार के आने के बाद से ही यह माहौल बनाने का खेल शुरू हो गया था कि मजदूर हड़तालें देश विरोधी होती हैं। तब इलेक्ट्रानिक मीडिया इतना शक्तिशाली नहीं था तो प्रिंट में यह खेल चल रहा था। घुमा-फिराकर हड़ताल में होने वाले नुकसान की बात तो बतायी जाती थी लेकिन कभी भी यह नहीं बताया जाता था कि हड़ताल करना किसी मजदूर का शौक नहीं होता, बहुत मजबूरी में यह कदम उठाया जाता है। मालिक का तो महज मुनाफे का नुकसान होता है, मजदूर के घर चुल्हा नहीं जलता।

पर यह सब आज के जमाने में कहने में नुकसान यह है कि इसे सत्तर की दशक की -या इससे भी पहले की – ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की कहानी समझा जायेगा, जबकि हकीकत में हालात इससे भी बदतर हैं क्योंकि तब कम से कम लोगों के पास रोजगार तो होता था। आज के हालात इतने भयावह हैं कि सामाजिक सुरक्षा या जीने के अधिकार की रत्तीभर भी गारंटी नहीं है और देश को ऐसा बनाने में जिन लोगों का 'अमूल्य योगदान' है, उनमें चैनल मालिकान भी शामिल हैं, जिनकी चाकरी हमारे 'सरोकारी पत्रकार' बजा रहे हैं। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि 'हे प्रभु! इन नालायकों को कभी क्षमा मत करना। ये कमबख्त जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं।'

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष हैं. सरकारी नौकरी से कुछ समय पहले रिटायर हुए. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. दिनेश के लिखे से साक्षात्कार के लिए यहां क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...