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हमारा असल राष्ट्रीय चरित्र!

: बम विस्फोट की लगातार घटनाएं, पसरती अराजकता, बेलगाम भ्रष्टाचार इन सब के मूल में हैं, हमारा गड़बड़ चरित्र. उसूलहीन जीवन. पैसा और भोग के प्रति गुलामी. 1857 या आजादी की लड़ाई के दौर, कभी-कभार हमारे जीवन में रोशनी लेकर आते हैं. पर हम बार-बार अंधकार का ही वरण करते हैं. राष्ट्रीय जीवन का कोई क्षेत्र बचा रहा गया है, जहां चरित्र का तेज हो, आदर्श की आभा हो, देश के लिए कुछ कर गुजरने की जिद हो? :

: बम विस्फोट की लगातार घटनाएं, पसरती अराजकता, बेलगाम भ्रष्टाचार इन सब के मूल में हैं, हमारा गड़बड़ चरित्र. उसूलहीन जीवन. पैसा और भोग के प्रति गुलामी. 1857 या आजादी की लड़ाई के दौर, कभी-कभार हमारे जीवन में रोशनी लेकर आते हैं. पर हम बार-बार अंधकार का ही वरण करते हैं. राष्ट्रीय जीवन का कोई क्षेत्र बचा रहा गया है, जहां चरित्र का तेज हो, आदर्श की आभा हो, देश के लिए कुछ कर गुजरने की जिद हो? :

खुद को धोखा देना आज हम भारतीयों का संस्कार है. राष्ट्रीय चरित्र. 1992-93 के बाद नियमित बम विस्फोट! आप रात में सड़क पर चलें, तो बलात्कार (वह भी दिल्ली में). मॉल में खरीदारी के लिए जायें तो बम विस्फोट. ट्रेनों-बसों में, एयरपोर्टों पर हाइ अलर्ट. अस्पताल या पूजा-इबादत की जगहों पर विस्फोट. बिजनेस हबों पर हमले. बेहतर शिक्षण संस्थाओं में बम विस्फोट. सिनेमा हॉल में विस्फोट. घर भी असुरक्षित. आदमी जीये, तो कहां जीये? इसलिए जरूरी है कि जनता सुनिश्चित कराये कि आगामी लोकसभा चुनाव अराजकता बनाम सुशासन पर लड़ा जाये.

कहावत है कि जान है, तो जहान है. महंगाई, भ्रष्टाचार जो जीवित समाज के मुद्दे हैं. आज भारतीयों के लिए मूल सवाल है कि क्या उनका जीवन अपने ही घर, शहर और देश में सुरक्षित है? दरअसल हम नागरिक भी कायर, बिके और आत्मा गिरवी रखे हुए लोग हैं.

1992 के मुंबई विस्फोटों में पता चला कि कस्टम के लोगों को पैसे (घूस) देकर भारतीय बंदरगाहों से वैध-कानूनी कारिडोर से विस्फोटक भारत लाये गये. दाऊद के लोगों द्वारा. तब प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनी वोरा कमिटी ने विस्फोटों के बारे में क्या रिपोर्ट दी? क्या एक भी सख्त कदम रिपोर्ट के अनुसार उठे? क्या जनदबाव बना? अब कहा जा रहा है कि नेपाल सीमा से चार लोग घुसे हैं, जिन्होंने हैदराबाद में विस्फोट किया है. पिछले वर्ष दिल्ली पुलिस ने आतंकी सैयद मकबूल को पकड़ा, तो पता चला कि रियाज भटकल के कहने पर दिलसुख नगर और कोर्णाक (जहां विस्फोट हुए) में उसने रेकी की थी. यह इलाका बिजनेस हब है. यहां आइटी कंपनियां हैं. शिक्षण संस्थाएं हैं. एक-डेढ़ किलोमीटर में 13 सिनेमा हॉल हैं. अत्यंत व्यस्त बाजार. इस तरह पूर्व सूचना के बाद भी विस्फोट. यह दुस्साहस और सीनाजोरी! यह भी खबर आयी है कि आतंकवादियों ने रेकी की.

इंडियन मुजाहिदीन के भटकल को चेन्नई में देखा गया. विस्फोट के बाद गृह मंत्री बताते हैं कि उन्होंने कई राज्यों को एक दिन पहले सूचना दी थी कि विस्फोट हो सकते हैं. यानी सूचना के बाद भी विस्फोट हुए. यह कहानी हर विस्फोट के बाद दोहरायी जाती है. क्या अपनी अकर्मण्यता, अयोग्यता और नाकाबिलीयत का ढिंढोरा पीटने के लिए? आखिर कितने विस्फोट इस मुल्क में होते रहेंगे? कब तक होंगे? अमेरिका या ब्रिटेन या चीन में एक घटना के बाद दूसरी क्यों नहीं हो पाती? कब तक भारत के शासक वर्ग का जीवन सुरक्षित रहेगा और जनता की बलि चढ़ती रहेगी? हम आम भारतीय भी इस स्थिति के लिए दोषी हैं.

क्या हमारे निजी जीवन में ‘कैरेक्टर’ (चरित्र, माफ कीजियेगा सेक्स अर्थ में नहीं) है? क्या हम मूलत: भ्रष्ट लोग हैं? बलशाली-ताकतवरों के सामने कायर. कमजोरों के सामने शेर. झूठे भी? अपनी बात, अपने वादे के प्रति लापरवाह-कैजुअल? जैसा समय, वैसे रुझान के हैं हम? ईमानदारी या ईमानदारों के प्रति हमारे मन में इज्जत है? या हम सिर्फ सत्ता-पद पूजक हैं? अतीत कहता है, गुलाम मानस, हमेशा सत्ता के चरणों पर नतमस्तक रहता है. हममें क्या वही रक्त या बीज है? हम आदतन या संस्कारवश चापलूस, चारण व रीढ़हीन हैं? हमारा इतिहास इसका प्रमाण है. हमारे बीच के लोग ही जयचंद-मीरजाफर संस्कृति के हैं. हम पराजय, पराधीनता और गुलामी की नींव क्यों रखते हैं?

निजी साहस दिखानेवाले कभी-कभार, कहीं-कहीं (पहले से बहुत कम) दिखते हैं. झलकते हैं. पर सार्वजनिक जीवन में क्यों अन्ना का आंदोलन मुकाम तक नहीं पहुंचता? बाबा रामदेव का अभियान नहीं टिक पाता? हाल के गुजरे दो दशकों में कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाया. उबाल (यह आजकल दिल्ली में कभी-कभार दिखायी देता है) में स्थायित्व-कांटिन्यूटी (निरंतरता) क्यों नहीं है? एक कौम, देश या समाज के तौर पर हमारे उसूल क्यों नहीं हैं? हाल की कुछेक घटनाओं के संदर्भ में इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है.

अमेरिका महान कैसे : कोई मुल्क अपने देशवासियों के चरित्र, संकल्प और कनविक्शन (उसूल) से महान बनता है. फरवरी के दूसरे सप्ताह में अमेरिका में कैंपेन डिसक्लोजर रिपोर्ट (चुनाव प्रचार खर्च विवरण) सार्वजनिक हुई. 2008 में हिलेरी क्लिंटन, राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं. पार्टी के अंदर. पार्टी में उनका मुकाबला बराक ओबामा से था. यह चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने बाजार से कर्ज लिया. यह कर्ज बढ़ कर पिछले वर्ष तक 2,50,000 डॉलर (लगभग 1.36 करोड़ रुपये) हो गया था. हिलेरी क्लिंटन, विदेश मंत्री बनीं. कानूनन इस पद पर रहते हुए, उनके लिए चंदा लेने की मनाही थी. स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण पिछले दिनों हिलेरी ने अपना पद छोड़ दिया है.

इसी बीच ओबामा को यह जानकारी मिली कि हिलेरी कर्ज में डूबी हैं. पिछले वर्ष के अप्रैल से चुपचाप ओबामा की टीम ने हिलेरी क्लिंटन के लिए चंदा एकत्र करना शुरू किया. अमेरिका में चंदा लेने के कानून सख्त हैं. अधिकतम कितना लेना है? एक बार जिससे ले चुके हैं, दोबारा उससे नहीं लेना है. इस तरह के अनेक सख्त प्रतिबंध हैं. ओबामा खुद अपने लिए चंदा वसूल चुके थे. बड़ी सावधानी से उनकी टीम ने 120 ऐसे लोगों को छांटा, जिनसे अनुरोध किया कि वे हिलेरी क्लिंटन की मदद करें. इससे न सिर्फ हिलेरी का कर्ज खत्म हुआ, बल्कि उस मद में 2,05,000 डॉलर (लगभग 1.11 करोड़ रुपये) सरप्लस फंड आया.

पार्टी में ओबामा की विरोधी थीं, हिलेरी. वह खुद राष्ट्रपति बनना चाहती थीं. राष्ट्रपति बनने पर ओबामा ने उन्हें अपना विदेश मंत्री बनाया. चुनाव लड़ने के लिए हिलेरी ने जो कर्ज लिया था, वह एकत्र किया और चुपचाप भुगतान करा दिया.

यह महज एक घटना नहीं है. राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब है. राष्ट्रीय चरित्र की झलक. अपने विरोधियों के प्रति उदारता, सम्मान और आदर, जिस कौम का चरित्र होता है, वहीं सामान्य जनजीवन में इस तरह की झलक मिलती है. वहीं आम नागरिक भी स्वाभिमानी, देशप्रेमी और उसूलों के साथ जीता है. भारत की तरह निर्थक और बेमतलब जीवन नहीं. 1960-70 के पहले की भारतीय राजनीति के अंतरंग प्रसंग पढ़ें. ऐसे उदाहरणों की बहुतायत है. गांधी युग और आजादी के लिए लड़नेवाले हिंसक -अहिंसक क्रांतिवीरों के धवल चरित्र, राष्ट्रीय पूंजी है. पर आज क्या स्थिति है? शायद ही कहीं भारत में अपने विरोधी के प्रति सम्मान, आदर और उदारता हो. हम खुद से छल करनेवाले और झूठ बोलनेवाले लोग हैं.

हमारे सार्वजनिक सरोकार, हमारा चरित्र बताते हैं : कई बार लगता है, इस मुल्क में अब भ्रष्टाचार या घोटालों की बात बंद होनी चाहिए. यह मान कर कि हम ऐसे ही हैं. सुधरने की बात तो दूर, हम और पतित होने के लिए बेचैन कौम हैं. पिछले दस दिनों से इटली में हुए 3600 करोड़ के हेलीकॉप्टर सौदे की बात सार्वजनिक बहस में है. इसमें दस फीसदी कमीशन की बात पुष्ट हो गयी है. पर याद रखिए, आठ-दस महीनों पहले यह बात सामने आयी, तब इसे हमने नकारा. आज किस मुंह से हम कह रहे हैं कि यह सही घटना है. चूंकि इटली में इसके दस्तावेज मिल गये, वहां संबंधित लोगों की गिरफ्तारी शुरू हो गयी. तब हमारे चेहरे से नकाब हटा. अब इस मामले में भारत की सेना के दो मामूली लोगों पर ठीकरा फूट रहा है. आजादी के बाद से ही रक्षा में कमीशन का मामला उजागर होता रहा. जीप स्कैंडल, बोफोर्स स्कैंडल.. अनेक स्कैंडल सामने आये. क्या इनमें से एक भी मामले में असल दोषी पकड़ा जा सका है? आज तक रक्षा सौदों में सीबीआइ किसी को पकड़ सकी है? फिर भी उसी सीबीआइ से जांच की बात!

जनरल वीके सिंह ने पत्र लिख कर रक्षा सौदों में दलाली का मामला उठाया था, तब वह पद पर थे. इस हेलीकॉप्टर डील की भी बात उठी थी. तब बात दबायी गयी. आज इटली से भंडा फूटा, तो हमारे यहां जांच कराने पर बवाल है. इटली में इसके मुजरिम पकड़े जा रहे हैं, पर भारत में बहस चल रही है. हाल में ईमानदार रक्षा मंत्री ने एक अनौपचारिक जांच करायी, हेलीकॉप्टर कमीशन मामले में. पर विभाग ने रिपोर्ट में सबको क्लीन चिट दिया है. हद है रिश्वत देनेवाला इटली में गिरफ्तार, पर पानेवाले हम निर्दोष! हथियार डीलर अभिषेक वर्मा की कारगुजारियां वर्षों से देश जान रहा है. एक दलाल के घर सेना के बड़े अफसर जाते हैं और वह दलाल बड़े नेताओं का प्रियपात्र होता है. दुनिया की सुंदरियों को वह एकत्र करता है. शराब की भव्य पार्टियां देता है. हथियार सप्लायरों को वह राजनेताओं से मिलाता है. इसी गैंग की एक विदेशी सुंदरी भारत के एक राज्यमंत्री से उनके दफ्तर में मिलती है.

खबर तो यह भी है कि इटली के हेलीकॉप्टर बिक्रेता, जब भारत में थे, तो वे एक अत्यंत बड़े राजनेता से मिले. खबर है कि दस्तावेज में ‘द फैमली’ को पैसा देने का उल्लेख है. यह ‘द फैमली’ कौन है? कोई उस राजनेता या ‘द फैमली’ का नाम बताने को तैयार नहीं. क्या यही इस मुल्क का चरित्र है? पश्चिम के देशों में ऐसा संभव है? क्या लार्ड कार्नवालिस ने सही कहा था कि ‘मेरा विश्वास या मानना है कि हिंदुस्तान का हर वाशिंदा वास्तव में भ्रष्ट है.’ बातचीत में दोहरापन क्या हमारी रगों में है? लार्ड कर्जन ने भी कहा था, ‘मेरा यकीन है कि मैं कोई झूठा दावा नहीं कर रहा या आक्रामक दावा नहीं कर रहा, कि सच का सर्वोच्च आइडियल किसी हद तक पश्चिमी विचार है. रुडयार्ड किपलिंग की धारणा भी ऐसी ही थी.

ब्रिटेन के आइसीएस ऑफिसर, सर माइक ल ओ डायर (रौल्ट एक्ट के प्रणोता) ने कहा था, ‘जिम्मेदार सरकार भारतीयों के लिए अर्थहीन है. इनके देशज संस्कार-भाषा में इस शब्द (रिस्पांसिबुल गर्वमेंट) का कोई पर्याय नहीं.’

बम विस्फोट की लगातार घटनाएं, पसरती अराजकता, बेलगाम भ्रष्टाचार इन सब के मूल में हैं, हमारा गड़बड़ चरित्र. उसूलहीन जीवन. पैसा और भोग के प्रति गुलामी. 1857 या आजादी की लड़ाई के दौर, कभी-कभार हमारे जीवन में रोशनी लेकर आते हैं. पर हम बार-बार अंधकार का ही वरण करते हैं. शासन चरित्र से चलता है, प्रताप से दौड़ता है, कन्विकशन (प्रतिबद्धता) से आभा पाता है. चोरी से नहीं चलता. मक्कारी से नहीं चलता. झूठ-षड्यंत्र से नहीं चलता. राष्ट्रीय जीवन का कोई क्षेत्र बचा रह गया है, जहां चरित्र का तेज हो, आदर्श की आभा हो, देश के लिए कुछ कर गुजरने की जिद हो? आज परचर्चा, परनिंदा और हर एक की धोती खोलने की आपसी प्रतिस्पर्धा है. खुद भोग में डूबने और आनेवाली पीढ़ियों के लिए देश लूट कर धन छोड़ जाने की धधकती आग जैसी बलवती इच्छा! यही हैं हम और यही है हमारा आज का राष्ट्रीय जीवन. माफ कीजिएगा, करोड़ों-करोड़ बेहतर ईमानदार और समर्पित लोग हैं, राजनीति से लेकर नौकरशाही तक में. पर राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा अब ऐसे लोग नहीं तय कर रहे. वे उदासीन, बाहरी और किसी हद तक बोझिल जीवन जी रहे हैं. अपनी ही धरती पर बेगाने.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

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