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जांच की जद में फंसा जांबाज हीरो!

वायुसेना के पूर्व प्रमुख एसपी त्यागी एक जांबाज योद्धा रहे हैं। अपने लंबे करियर में उन्होंने बहादुरी और हुनर के कई कमाल दिखाए हैं। इसके चलते उन्हें कई विशिष्ट सम्मान भी मिल चुके हैं। 2007 में रिटायर होने के बाद वे आराम से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। लेकिन, इसी बीच उनके जीवन में भारी उथल-पुथल मच गया। क्योंकि एयरचीफ मार्शल (रि.) त्यागी और उनके करीबी परिजन बहुचर्चित हेलीकॉप्टर सौदे की दलाली के आरोप में फंस गए हैं।

वायुसेना के पूर्व प्रमुख एसपी त्यागी एक जांबाज योद्धा रहे हैं। अपने लंबे करियर में उन्होंने बहादुरी और हुनर के कई कमाल दिखाए हैं। इसके चलते उन्हें कई विशिष्ट सम्मान भी मिल चुके हैं। 2007 में रिटायर होने के बाद वे आराम से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। लेकिन, इसी बीच उनके जीवन में भारी उथल-पुथल मच गया। क्योंकि एयरचीफ मार्शल (रि.) त्यागी और उनके करीबी परिजन बहुचर्चित हेलीकॉप्टर सौदे की दलाली के आरोप में फंस गए हैं।

आरोप काफी संगीन है। इस कांड को लेकर राजनीतिक हलकों में खासी सनसनी फैल गई है। मामले की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। उसने इस प्रकरण की प्राथमिक जांच (पीई) अपने यहां दर्ज कर ली है। इसमें पूर्व वायुसेना प्रमुख सहित दस लोगों के नाम हैं। इसी के साथ चार कंपनियां भी जांच के दायरे में आ गई हैं।

शशींद्र पाल त्यागी का जन्म 14 मार्च, 1945 को इंदौर में हुआ था। इनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई जयपुर के सेंट जेवियर स्कूल में हुई थी। स्कूली दौर में हुई खेल-कूद की प्रतियोगिताओं में हमेशा अव्वल रहते थे। 31 दिसंबर, 1963 को वायुसेना में कमीशन कैडेट के रूप में शामिल हो गए थे। 1965 और 1971 में हुए भारत-पाक युद्धों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1971 में तो उन्होंने अपनी जांबाजी के चलते वायुसेना में काफी शोहरत पा ली थी। 1980 में भारतीय सेना में जगुआर विमान आया था। वायुसेना ने इस विशिष्ट लड़ाकू विमान को उड़ाने के लिए जो आठ पायलट चिन्हित किए थे, उनमें एक एसपी त्यागी भी थे। बाद में, इसी उड़ान से जुड़े एक विशेष कोर्स के लिए दो पायलटों का चयन हुआ, तो एक नाम त्यागी का भी था।

एसपी त्यागी ने जल्द ही फाइटर विमान से पलटवार करने की सभी बारीकियां सीख ली थीं। उन्होंने एक अमेरिकी सैन्य कॉलेज से एक सर्टीफिकेट भी हासिल किया था। 1985 में उन्हें विशिष्ट सेवाओं के लिए वायुसेना मेडल (वीएम) भी मिला। एयर कमोडोर के रूप में उन्होंने जामनगर स्थित 33 विंग सेंटर की कमान संभाली थी। कुछ समय तक वे डिफेंस अटैची के रूप में सऊदी अरब के दूतावास में सलाहकार के रूप में कुछ समय तक पदस्थ रहे। 1994 में उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) मिला था। एओसी के रूप में वे सेंट्रल, साउथ-वेस्टर्न और वेस्टर्न एयर कमांड संभाल चुके हैं। ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि जब किसी ने अपने करियर में तीन कमांड की जिम्मेदारी संभालने का रिकॉर्ड बनाया हो। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए एयर मार्शल के रूप में उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) 2003 में मिल गया था।

20वें वायुसेना प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 2004 को हुई थी। वे 2007 तक इस पद पर रहे। रिटायरमेंट के पांच सालों बाद वे हेलीकॉप्टर खरीद सौदे के रिश्वतकांड की आंच में झुलसने लगे हैं। करीब एक साल पहले अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी खास रिपोर्ट में यह दावा किया था कि अति विशिष्ट लोगों के उपयोग के लिए हेलीकॉप्टर खरीद का जो सौदा रक्षा मंत्रालय ने किया है, उसमें अरबों रुपए की दलाली का खेल हुआ है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद राजनीतिक हलकों में थोड़ा शोर-शराबा जरूर हुआ था। लेकिन, रक्षा मंत्री एके एंटनी ने यही कह दिया था कि अभी उनके मंत्रालय के पास ऐसी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। यदि कुछ गड़बड़ पाया गया, तो सख्त से सख्त कार्रवाई जरूर होगी।

खांटी ईमानदार छवि वाले रक्षा मंत्री एंटनी ने जब यह आश्वासन दिया, तो बात आई-गई हो गई। लेकिन, इटली की कंपनी अपने देश में शक के दायरे में आ गई थी। ऐसे में, वहां पड़ताल तेज होती गई। दरअसल, फरवरी 2010 में इटली की कंपनी ‘फिनमैक्कनिका’ और रक्षा मंत्रालय के बीच एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा हुआ था। 12 हेलीकॉप्टर खरीदे जाने थे। इनकी कीमत करीब 3600 करोड़ रुपए बैठी थी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए सुरक्षित एवं आधुनिक तकनीक वाले हेलीकॉप्टरों की जरूरत वर्ष 2000 में ही महसूस की गई थी। उसी दौर से खरीद की शुरुआती प्रक्रिया भी एनडीए सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी।

लेकिन, अंतिम रूप से सौदा 2010 में हो पाया। ये खास किस्म के हेलीकॉप्टर ‘फिनमैक्कनिका’ की एक सहायक कंपनी ‘अगस्टा वेस्टलैंड’ बनाती है। इनका निर्माण ब्रिटेन में किया जाता है। लेकिन,   इस कंपनी का प्रशासनिक नियंत्रण फिनमैक्कनिका के पास ही रहता है। 12 में से 3 हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी भी हो चुकी है। ये सभी दिल्ली स्थित पालम हवाई अड्डे पर खड़े हैं। दलाली की गड़बड़ी की सुगबुगाहट के चलते इनका प्रयोग नहीं शुरू किया गया है। पिछले दिनों ‘फिनमैक्कनिका’ कंपनी के प्रमुख जी. ओरसी की गिरफ्तारी इटली में हो गई थी। उन पर आरोप लगा कि हेलीकॉप्टर सौदे के लिए उन्होंने कई भारतीयों को करीब 362 करोड़ रुपए की रिश्वत भिजवाई थी। दरअसल, इस मामले की पड़ताल इटली की जांच एजेंसियां काफी पहले से कर रही थीं।

यह कंपनी इटली सरकार का एक उपक्रम है। लेकिन, इसके प्रबंधन ने किसी तरह भारतीय सौदे को हासिल करने के लिए तमाम गलत हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं किया था। रिश्वत की रकम का ब्यौरा ‘प्रमोशन एक्सपेंसेज’ के नाम पर दिखाया गया था। आॅडिट के दौरान इतनी बड़ी रकम का खेल पकड़ में आ गया। जब वहां की जांच एजेंसियों को पुख्ता प्रमाण मिल गए, तो उन्होंने कंपनी के प्रमुख पर हाथ डाल दिया। इस गिरफ्तारी के बाद ही भारत में सनसनी फैल गई। इस बात की तलाश शुरू हुई कि भारत में किन लोगों ने इतनी बड़ी दलाली की रकम को हजम किया है?

इटली की जांच एजेंसियों ने दाखिल आरोप पत्र में दावा किया कि पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी और उनके तीन-चार परिजनों के माध्यम से रिश्वत की मोटी रकम एक छद्म इंजीनियरिंग सौदे के नाम पर ट्यूनीशिया और मॉरीशस की बोगस फर्मों के जरिए भेजी गई। इस आशय की खबर आई तो भारत के राजनीतिक हलकों में विवाद ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया। यूपीए सरकार को आशंका हो गई कि कहीं विपक्ष इस रक्षा सौदे की दलाली के मामले को दूसरा ‘बोफोर्स’ बनाने की कोशिश न कर दे। उल्लेखनीय है कि 1990 के दौर में बहुचर्चित ‘बोफोर्स’ तोप की दलाली के मामले में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार हिल गई थी। इस सौदे में 64 करोड़ रुपए की दलाली का आरोप लगा था। राजीव सरकार तमाम सफाई देती रही थी, लेकिन राजनीतिक तस्वीर ऐसी बदली कि कई सालों तक कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर रहना पड़ा था।

इस राजनीतिक खतरे को भांपकर रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने बगैर किसी देरी के मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का ऐलान किया। सीबीआई ने फटाफट पड़ताल का काम भी शुरू कर दिया। पिछले दिनों एक संयुक्त जांच दल पड़ताल के लिए इटली गया था। इस जांच टीम में रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी और विदेश मंत्रालय के भी एक अधिकारी सीबीआई जांच दल के साथ गए थे। इस जांच दल ने वहां वकीलों आदि से मिलकर दलाली के कई सबूत इकट्ठे किए हैं। इनसे यह जाहिर होता है कि इतालवी कंपनी ने 362 करोड़ रुपए की दलाली तो भारत जरूर भेजी थी। इसके प्रमाण भी हैं। अब जांच एजेंसी को यह पता करना है कि इतनी बड़ी रकम यहां किन-किन लोगों ने हजम की है?

पिछले दिनों ही इटली से जांच टीम लौटी है। इसमें शुरुआती पड़ताल के बाद अपने यहां प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज कर ली है। जांच दायरे में एसपी त्यागी के अलावा अन्य 10 लोग हैं। जांच के दायरे में चार कंपनियां भी हैं। पीई रिपोर्ट के बाद सीबीआई ने इन लोगों को जांच के दायरे में ले लिया है। अब उसे अधिकार मिल गया है कि इनमें से किसी को पूछताछ के लिए वह बुला सकती है। लेकिन, जांच एजेंसी को इतने पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए कि वह इनमें से किसी के खिलाफ  एफआईआर दर्ज करा सके।

जांच एजेंसी ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट दर्ज करने के बाद एसपी त्यागी के अलावा उनके परिजन जूली, डॉक्सा और संदीप त्यागी को जांच के दायरे में लिया है। जबकि इस घेरे में यूरोपियन दलाल कार्लो गरोसा, क्रिस्ट्रीयल माइकल, गोडो होस्को व एरोमाइटिक्स कंपनी के कानूनी सलाहकार गौतम खेतान के नाम भी शामिल हैं। इस दायरे में एरोमाइटिक्स के पूर्व सीईओ प्रवीण बख्शी, फिनमैक्कनिका के पूर्व अध्यक्ष जी. ओरसी, अगस्टा वैस्टलैंड के पूर्व सीईओ ब्रूनो एडनोनली भी नामजद किए गए हैं। इतालवी कंपनी फिनमैक्कनिका, अगस्टा वेस्टलैंड, आईडीएम इंफोटेक व एरोमैटिक्स कंपनियां सीबीआई के जांच दायरे में आ गई हैं।

हालांकि, पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी ने लगातार यही कहना शुरू कर दिया है कि उन्हें कुछ लोग साजिश के तहत फंसाने में लगे हैं। उन्हें आशंका है कि कुछ बड़े लोगों को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाने की कोशिश हो रही है। वे दावा करते हैं कि उन्होंने एक रुपए की भी दलाली नहीं ली। उन्हें लगता है कि उनके भतीजों को भी गलत ढंग से फंसाया जा रहा है। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि जांच का काम खास प्रगति पर है। जल्द ही वे लोग कुछ भारतीयों के लिए ‘लुक आउट’ नोटिस जारी करने की तैयारी कर रहे हैं। ताकि, रक्षा दलाल देश के बाहर न भाग जाएं। जांच एजेंसी रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने जा रही है। कई अधिकारियों के कॉल डिटेल्स भी खंगालने की तैयारी चल रही है। जो लोग शक के दायरे में हैं, उनके बैंक खातों की पड़ताल भी शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, एजेंसी को इस बात से खास हैरानी हो रही है कि पूर्व वायुसेना प्रमुख के निजी खातों में कभी भी कोई मोटी रकम नहीं जमा हुई। देश में उनकी ऐसी संपत्तियां भी नहीं है, जिन्हें इस दलाली कांड से जोड़ा जा सके। लेकिन, इनके दो भतीजे पूरी तौर पर   शक के दायरे में हैं। इनमें से एक के घर में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख त्यागी ने एक विदेशी दलाल से मुलाकात भी की थी। इसे त्यागी स्वीकार भी कर चुके हैं। बस, इतना ही कह रहे हैं कि उन्हें नहीं मालूम था कि सामने बैठा शख्स कोई रक्षा दलाल है?

एसपी त्यागी यही सफाई दे रहे हैं कि हेलीकॉप्टर खरीद का सौदा 2010 में हुआ। जबकि वे तीन साल पहले ही रिटायर हो गए थे। ऐसे में, सौदे को प्रभावित करने की उनकी हैसियत नहीं थी। जबकि, जांच एजेंसी का मानना है कि वायुसेना प्रमुख के रूप में हेलीकॉप्टर खरीद के लिए त्यागी ने खरीद सौदे की शर्तों में ऐसे बदलाव करा दिए थे, जिनसे कि वेस्टलैंड कंपनी को निर्णायक फायदा हुआ। जबकि, त्यागी सबूत दे रहे हैं कि शर्तों में बदलाव अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के निर्देश पर हुए थे।
    
मंत्रालय के पास इस आशय के प्रमाण भी मौजूद हैं। फिर भी, उन्हें फंसाया जा रहा है। जबकि, सीबीआई को इटली से इस आशय की जानकारी मिली है कि ट्यूनीशिया और मॉरीशस की दो बोगस कंपनियों के जरिए करीब 170 करोड़ रुपए की रकम, त्यागी बंधुओं को ही भेजी गई थी। अब पता यह करना है कि इस रकम का बंटरबांट और कहां-कहां हुआ है? शानदार रक्षा करियर वाले त्यागी पूरी तरह से कटघरे में आते दिखाई पड़ रहे हैं। वे ऐसे दूसरे पूर्व रक्षा प्रमुख हैं, जो रिश्वत कांड के मामले में सीबीआई जांच के दायरे में आ गए हैं। करीब 12 साल पहले नेवी के पूर्व प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार, बराक मिसाइल्स खरीद के दलाली सौदे में आरोपित किए गए थे। अब एयरचीफ मार्शल त्यागी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही कि वे बताएं कि पाक साफ हैं, तो आखिर कैसे?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क[email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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