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डर्टी पिक्चर : नसीर घटिया, विद्या शानदार

विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर देखने का मौक़ा मिला.. इसके पहले महीनों से पीआर वालों की कृपा से चल रहे प्रोमो की भीड़ में लगता था कि फिल्म बनाने वालों ने प्रचार प्रसार के लिए खूब पैसा झोंका है, इसलिए लग रहा था कि डर्टी पिक्चर भी बाकी फिल्मों जैसी ही एक फिल्म होगी जिसमें हर तरह के मसाले अपनाए गए होंगे. फिल्म की कहानी वगैरह भी वैसी ही थी. हर तरह का मसाला था. नसीरुद्दीन शाह जैसे समर्थ अभिनेता की घटिया एक्टिंग थी. नसीर आम तौर पर ऐसी रद्दी एक्टिंग नहीं करते. लेकिन ६५ साल की उम्र में जो काम मिलता है, वह कर लेना ठीक रहता है.

विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चर देखने का मौक़ा मिला.. इसके पहले महीनों से पीआर वालों की कृपा से चल रहे प्रोमो की भीड़ में लगता था कि फिल्म बनाने वालों ने प्रचार प्रसार के लिए खूब पैसा झोंका है, इसलिए लग रहा था कि डर्टी पिक्चर भी बाकी फिल्मों जैसी ही एक फिल्म होगी जिसमें हर तरह के मसाले अपनाए गए होंगे. फिल्म की कहानी वगैरह भी वैसी ही थी. हर तरह का मसाला था. नसीरुद्दीन शाह जैसे समर्थ अभिनेता की घटिया एक्टिंग थी. नसीर आम तौर पर ऐसी रद्दी एक्टिंग नहीं करते. लेकिन ६५ साल की उम्र में जो काम मिलता है, वह कर लेना ठीक रहता है.

क़र्ज़ में डूबे अमिताभ बच्चन ने भी कभी लोगों को करोड़पति बनाने का लालच देने वाले लोगों का साथ कर लिया था और लालच के धंधे में लोगों को फंसाने वालों के साथ मिलकर पैसा कमाया था और अपना क़र्ज़ उतारा था. इमरान हाशमी से किसी एक्टिंग की उम्मीद कोई नहीं करता, उनकी तो फिल्म में मौजूदगी ही उनको रोटी पानी भर के पैसे का बंदोबस्त कर देती है. तुषार कपूर भी ठीक हैं. जब उनकी अम्मा और उनकी बहन फिल्म के प्रोड्यूसर हों तो उनको भी छोटा मोटा रोल मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं है. पैसा उनकी अम्मा का है जो चाहें करें. वैसे भी जब इमरान हाशमी आदि जैसे एक्टर फिल्म में रोल पा रहे हैं तो तुषार तो घर के बन्दे हैं.

लेकिन फिल्म ने एक बात मेरे दिलो दिमाग पर बैठा दी है कि यह विद्या बालन बहुत बड़ी कलाकार है. जिस तरीके से उसने अभिव्यक्ति को जीवंत रूप दिया है वह न भूतो न भविष्यति है. एक्सप्रेशन के व्याकरण को उसने बिलकुल शास्त्रीय अर्थ बख्श दिया है. कहीं वहीदा रहमान लगती है तो कहीं रेखा. कहीं स्मिता पाटिल तो कहीं शबाना आजमी. समझ में नहीं आता कि  करीब एक सौ अलग-अलग तरह के भाव वाले चेहरे कैसे जी लिया है इस लडकी ने. और जिस फ्लैश में चेहरे की कुछ लकीरें, बात करते-करते बदल जाती है, क्या बात है.

लगता है कि आचार्य भरत के नाट्य शास्त्र के चेहरे की अभिव्यक्ति वाले किसी चैप्टर का लैब में डिमान्स्ट्रेशन चल रहा हो. आज ही देव आनंद गए हैं और वे यह कहते हुए गए हैं कि उनका सबसे अच्छा काम अभी आने वाला है. उनके इस बयान को उनकी जिंदादिली का उदाहरण माना जाता है लेकिन एक बात बहुत ही भरोसे के साथ कही जा सकती है कि बुलंदियों पर मौजूद विद्या बालन का सबसे अच्छा काम अभी आने वाला है. आने वाले वर्षों में सिनेमा के जानकारों को विद्या बालन पर नज़र रखना पड़ेगा. अगर नज़र नहीं रख सके तो कुछ छूट जाएगा क्योंकि विद्या बालन के अभिनय की बुलंदियां आनी अभी बाकी हैं.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. एनडीटीवी समेत कई चैनलों अखबारों में काम कर चुके शेष नारायण इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं.

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