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मात्र पांच हजार रुपये में अपना खर्च चलाता है यह मुख्‍यमंत्री

क्या आप एक ऐसे मुख्यमंत्री की कल्पना कर सकते हैं? जिसके पास न बैंक बैलेंस हो, न रहने के लिए चमक-दमक वाली कोठी हो और न ही खास बात करने के लिए मोबाइल तक हो। निजी संपत्ति के नाम पर उनके पास 400 वर्ग फुट में बना एक टिन का टप्परभर है। यह ठौर-ठिकाना भी इन्हें अपनी मां से विरासत में मिला है। वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन, उनके निजी जीवन की खांटी सादगी में कोई अंतर नहीं आया।

क्या आप एक ऐसे मुख्यमंत्री की कल्पना कर सकते हैं? जिसके पास न बैंक बैलेंस हो, न रहने के लिए चमक-दमक वाली कोठी हो और न ही खास बात करने के लिए मोबाइल तक हो। निजी संपत्ति के नाम पर उनके पास 400 वर्ग फुट में बना एक टिन का टप्परभर है। यह ठौर-ठिकाना भी इन्हें अपनी मां से विरासत में मिला है। वे चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन, उनके निजी जीवन की खांटी सादगी में कोई अंतर नहीं आया।

मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जो वेतन मिलता है, उसे वे अपनी पार्टी के कोष में दे देते हैं। पार्टी की तरफ से हर महीने उन्हें महज 5 हजार रुपए मिलते हैं। इसी में ‘कामरेड’ मुख्यमंत्री अपना खर्चा आराम से चला लेते हैं। कहते हैं कि इतनी रकम में जीवन मजे से चल जाता है। उन्हें कभी अपनी ‘गरीबी’ नहीं सताती। बस, उनकी चिंता यही रहती है कि केंद्र से भरपूर आर्थिक मदद मिलती रहे, तो राज्य के विकास की गाड़ी और आगे बढ़ जाए। माणिक दा के जीवन में एक ही ‘लग्जरी’ आदत है। वे सिगरेट पीते हैं। बड़ी पुरानी लत है। हर दिन एक पैकेट सिगरेट पी जाते हैं। इसके लिए भी वे कई बार जनता से माफी मांग चुके हैं।

हम यहां बात कर रहे हैं कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की। पिछले दिनों विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे। यहां पर चौथी बार माणिक सरकार सत्ता में लौट आए हैं। 1998 से वे लगातार सत्ता में हैं। पूर्वोत्तर में बसा त्रिपुरा, देश का तीसरा सबसे छोटा प्रदेश है। इसका कुल क्षेत्रफल 10,491 वर्ग किमी का है। इसके उत्तर, दक्षिण और पश्चिम की सीमाएं बांग्लादेश से लगी हुई हैं। जबकि, पूर्व में यह प्रदेश असम और मिजोरम से जुड़ा है। इस प्रदेश में जनजातियों का बाहुल्य है। आधी से ज्यादा आबादी आज भी कृषि से जुड़ी अर्थव्यवस्था से ही चल रही है। उद्योग के नाम पर आजादी के इतने वर्षों बाद भी यहां कोई बड़ा संस्थान नहीं है। महज एक ही राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) से ही त्रिपुरा जुड़ा हुआ है। यहां के लोग बांस से बनाए जानी वाली तमाम कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करते हैं। इनकी खपत दिल्ली और मुंबई महानगरों तक होती है।

कृषि योग्य जमीन में यहां पर मुख्य तौर पर धान की खेती होती है। केरल के बाद यहां पर प्राकृतिक रबड़ का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। जमीन के आधे हिस्से में आज भी यहां पर हरे-भरे वन हैं। माणिक सरकार, ऐसे गरीब और सुदूर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जहां के दुख-दर्द की आवाज जल्दी से दिल्ली को नहीं सुनाई पड़ती। 64 वर्षीय माणिक सरकार, बंगाली हिंदू हैं। उन्होंने बीकॉम तक पढ़ाई की है। एक बेहद साधारण परिवार में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता दर्जी थे। जबकि मां एक सरकारी कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी की कर्मचारी थीं।

जाहिर है ऐसे में स्नातक स्तर तक पढ़ाई कर लेने के बाद माणिक सरकार का लक्ष्य एक साधारण नौकरी हासिल करके परिवार की रोजी-रोटी के जुगाड़ करने का ही था। लेकिन, 1967 में सीपीएम ने खाद्यान के मुद्दे पर एक बड़ा आंदोलन शरू किया था। इसका खास असर पूर्वोत्तर राज्यों में था। क्योंकि इस दौर में खाद्यान संकट के चलते त्रिपुरा सहित कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई थी। चूंकि, राजनीतिक रूप से इन छोटे प्रदेशों गुहार केंद्र की नींद नहीं तोड़ पाती थी, संकट बढ़ता जा रहा था। इस आंदोलन में माणिक सरकार भी कूद पड़े थे। इसी दौरान वे वामपंथी नेताओं के संपर्क में आए थे। धीरे-धीरे वे सीपीएम की राजनीति में ही रस-बस गए।

त्रिपुरा में, नृपेन चक्रवर्ती सबसे लोकप्रिय वामपंथी नेता रहे हैं। उनके बाद माणिक सरकार ने लगभग उतनी ही लोकप्रियता हासिल कर ली है। अपनी सादगी और खांटीपन में माणिक सरकार ने नृपेन दादा को भी पीछे छोड़ दिया है। किसी को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि मुख्यमंत्री के तौर पर भी वे अपनी कार में ‘लालबत्ती’ लगवाना तक पसंद नहीं करते। सुरक्षा के नाम पर उनके निवास में कोई ताम-झाम नहीं रहता। यहां तक कि अब उनके निवास में गेट तक नहीं है। जनता का आदमी जब चाहे तब माणिक दादा से मिल सकता है। वे तो जनता के ‘राजा’ हैं।

पिछले दिनों एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने यह कहा था कि यह सादगी भरा जीवन जीकर वे राज्य की जनता पर कोई अहसान नहीं कर रहे। हकीकत तो यह है कि राज्य की आधी से ज्यादा जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। लेकिन, यहां के लोग इतनी शांत-प्रकृति के हैं कि थोड़े संसाधनों में ही खुश रहते हैं। वाममोर्चा सरकार की कार्यशैली के चलते राज्य में आतंकवाद की समस्या भी नहीं रही है। कभी-कभार जनजातियों के कुनबों में आपसी झगड़े की वारदातें हो जाती हैं। लेकिन, पिछले सालों में इनमें भी काफी कमी आ गई है।

वे चौथी बार मुख्यमंत्री जरूर बन गए हैं। लेकिन, सरकारी कार का उपयोग अपने घरेलू काम के लिए कभी नहीं करते। राजधानी अगरतला में अपने घर के पास उन्हें देर शाम को फुटपाथ से सब्जी खरीदते देखा जा सकता है। उनके कंधे में सब्जियों का झोला लटका होता है। वे दो किमी तक पैदल ही जाना पसंद करते हैं। सुरक्षा के नाम पर कभी-कभी उनके पीछे दो होमगार्ड दिखाई पड़ जाते हैं। उनके हाथों में राइफलों की जगह डंडे होते हैं। अपनों के बीच माणिक सरकार को ‘माणिक दा’ कहा जाता है। कभी बार वे सब्जी लेते वक्त मोल-तोल करते भी देखे जाते हैं।

पिछले दिनों उन्होंने एक विदेशी पत्रकार को ‘मोल-तोल’ की वजह भी बता दी थी। कहा था कि सब्जी वाले समझते हैं कि बड़े नेता हैं, कुछ भी भाव लगा दो, मोलभाव नहीं करेंगे। लेकिन, उन्हें पता नहीं है कि वे देश के सबसे गरीब नेताओं में एक को सब्जी बेच रहे हैं। कम से कम सभी मुख्यमंत्रियों में वे गरीब तो जरूर होंगे। उन्होंने कहा था कि अपनी इस गरीबी पर उन्हें बहुत खुशी होती है। क्योंकि इसके चलते ही वे आम आदमी की जिंदगी ही जीते हैं। विरोधी भी राजनीतिक जीवन में कभी उनकी ईमानदारी पर अंगुली नहीं उठा पाए हैं। कम से कम इसका संतोष तो है।

हमेशा सफेद कुर्ता-पायजामा पहनने वाले माणिक दा को शायद ही कभी किसी और ड्रेस में देखा जा सकता हो। उनके पास चार-पांच जोड़ी कुर्ता-पायजामा रहते हैं। इनकी धुलाई वे देर रात खुद करते हैं। समय नहीं मिलता, तो बगैर प्रेस के ही कपड़े पहनने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। उनकी पत्नी पांचाली भट्टाचार्य एक रिटायर अधिकारी हैं। केंद्र सरकार के एक विभाग में कार्यरत रही हैं। पांचाली, राजधानी अगरतला में अक्सर रिक्शे से यात्रा करती हैं। कहीं दूर जाना हुआ, तो वे ‘शेयरिंग टैंपो’ में सफर करती हैं। चूंकि, पति की कार सरकारी होती है। ऐसे में, मुख्यमंत्री उन्हें कार की सवारी करने की अनुमति भी नहीं देते।

यह जरूर है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें पीएफ इत्यादि के फंड से काफी रकम मिल गई है। करीब 25 लाख रुपए उनके एफडी खाते में जमा हैं। उनके पास करीब 20 तोले सोने के गहने भी हैं। इस तरह से वे अपने पति मुख्यमंत्री की मुकाबले ज्यादा ‘धनी’ हैं। पांचाली कहती हैं कि उन्हें अपने खांटी ईमानदार पति पर गर्व है। उन्हें घरेलू सुख-सुविधाओं की कभी दरकार नहीं रही। विधानसभा चुनाव में पर्चा भरने के दौरान माणिक सरकार ने जानकारी दी थी कि उनके बैंक खाते में महज एक हजार रुपए के करीब नकदी है। जबकि चल-अचल संपत्ति के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है। उन्होंने मीडिया को मुस्कुराते हुए यह जानकारी भी दे दी है कि पार्टी की तरफ से उन्हें जो गुजारा भत्ता मिलता है, उसमें से वे कुछ पैसे बचाकर जरूरतमंदों की भी मदद करते हैं।

माणिक दा के करीबी रहे सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान दादा के पास खर्च करने के लिए कुछ होता ही नहीं है। महज, वोट देने की अपील देने वाले पर्चे बंटवा दिए जाते हैं। कई बार चुनाव प्रचार में कुल खर्चा 10 हजार रुपए के आस-पास ही आता है। इतना भी खर्चा हो जाता है, तो दादा अपने सहयोगियों से उलहना देते हैं कि भाई, कुछ किफायत से काम लो। हम लोग एक गरीब प्रदेश में राजनीति कर रहे हैं।

बड़े उद्योग के नाम पर यहां कुछ चाय-बागान भर हैं। वे केंद्र सरकार से लगातार मांग करते आए हैं कि कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की खुलकर मदद करें। लेकिन, माणिक दा का दुख यह है कि दिल्ली की सरकार, त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों का दुख-दर्द जल्दी से नहीं सुनती। वह आम आदमी का नारा सड़क से संसद तक उछालती है, लेकिन आदिवासी प्रदेश के सबसे जरूरतमंदों की आवाज सुनना पसंद नहीं करती। त्रिपुरा बिजली उत्पादन के मामले में जरूर ‘धनी’ है। यहां के तीन पावर स्टेशनों में करीब 105 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। जबकि राज्य में मांग 50-60 मेगावाट की ही रहती है।

मुख्यमंत्री ने कई बार मांग की है कि केंद्र मदद करे, तो पन बिजली योजनाओं के जरिए यहां पर 500 मेगावाट का उत्पादन आराम से हो सकता है। ऐसे में, बिजली बेचकर राज्य की आर्थिक सेहत एकदम से ठीक की जा सकती है। लेकिन, केंद्र महज उतना ही देना चाहता है, जितने से कि भुखमरी न रहे। इसके लिए माणिक दा अब ज्यादा लंबी राजनीतिक लड़ाई के लिए तैयार हैं। उन्होंने सीपीएम के शीर्ष नेतृत्व से भी केंद्र पर दबाव बनाने की गुहार की है।

केंद्रीय योजना आयोग ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में यह स्वीकार किया है कि पिछले वर्षों में त्रिपुरा सरकार ने कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए अभूतपूर्व कदम उठाए हैं। इससे राज्य में शांति की बहाली भी हुई है। यहां पर साक्षरता की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। राज्य में 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी साक्षर है। लिंगानुपात हरियाणा और पंजाब जैसे प्रदेशों के मुकाबले काफी बेहतर है। यहां पर बालिकाओं का औसत 1000 के मुकाबले 961 का है। जो कि 940 के राष्ट्रीय औसत से बेहतर आंकड़ा है। 2011 के जनसंख्या आंकड़े के अनुसार, त्रिपुरा की जनसंख्या करीब 37 लाख की है। माणिक दा ने पिछले दिनों कहा था कि उन्हें उसी रात भरपूर नींद आती है, जब यह खबर आ जाती है कि राज्य में आज पूरा अमन-चैन रहा है। वे विश्वास जताते हैं कि दिल्ली की ‘बेदर्दी’ के बावजूद त्रिपुरा की मेहनतकश जनता एक ना एक दिन बेमिसाल विकास की गाथा जरूर रच डालगी। अब जनता के इस ‘राजा’ का यह सपना कब पूरा होता है? यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन, इतना जरूर कहा जा सकता है कि त्रिपुरा के पास ही इतना खांटी और सहज मुख्यमंत्री है, जो कि देश-दुनिया में शायद बेमिसाल है।

जबकि, इन दिनों राजनीति के भ्रष्टाचार को लेकर देशभर में बहस तेज है। हम जानते हैं कि नेता जी एक बार भी विधायक रह लेते हैं, तो उनके वारे-न्यारे हो जाते हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां आ जाती हैं। यह भी इसी देश में होता है और इसी देश के एक हिस्से में माणिक दा जैसे मुख्यमंत्री भी हैं। जो कि झोला लटकाकर सब्जी खरीदने निकलते हैं, जिनकी बीवी बुढ़ापे में भी रिक्शे में चलती हैं। सड़क चलते लोग उनसे पति की सरकार के प्रति नाराजगी भी जता देते हैं। पत्नी भी सिर झुकाकर सरकार की शिकायतें सुन लेती हैं और शाम को श्रीमान मुख्यमंत्री को जनता की राय बता देती हैं। कई बार मुख्यमंत्री शिकायतकर्ता को सफाई देने उसके घर भी पहुंच जाते हैं और बदले में एक कप गरम चाय की फरमाइश कर देते हैं। कह देते हैं कि इतनी सेवा के बदले भई एक कप का हक तो बनता है। शिकायतकर्ता माणिक दा की इस सहजता पर बाग-बाग हो जाता है। कुछ ऐसे हैं त्रिपुरा के माणिका दा…

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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