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शायद युवा पुलिस अधिकारी ने यह ‘दुस्साहस’ किया था?

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की चर्चा आजकल नकारात्मक वजहों से ज्यादा होने लगी है। यह सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है। कई बार इसकी भौंड़ी राजनीतिक तस्वीर सड़क से चलकर संसद तक पहुंच जाती है। राज्य में सपा और बसपा दो प्रमुख ताकतवर दल हैं। इनके बीच अक्सर तूफानी मोर्चों की रार खड़ी हो जाती है। प्रतापगढ़ जिले में हुए एक ताजा आपराधिक हादसे को लेकर सियासी तमाशे का तमाम नंगा नाच शुरू हो गया है।

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की चर्चा आजकल नकारात्मक वजहों से ज्यादा होने लगी है। यह सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है। कई बार इसकी भौंड़ी राजनीतिक तस्वीर सड़क से चलकर संसद तक पहुंच जाती है। राज्य में सपा और बसपा दो प्रमुख ताकतवर दल हैं। इनके बीच अक्सर तूफानी मोर्चों की रार खड़ी हो जाती है। प्रतापगढ़ जिले में हुए एक ताजा आपराधिक हादसे को लेकर सियासी तमाशे का तमाम नंगा नाच शुरू हो गया है।

पिछले दिनों कुंडा के पास एक गांव बलीपुर में दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। फायरिंग की खबर पर जब पुलिस के एक युवा उपाधीक्षक मौके पर पहुंचे, तो उनकी भी बेरहमी से हत्या हो गई। खास तौर पर इस मुस्लिम युवा अधिकारी की मौत को लेकर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा तूफान पैदा करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। इस मुद्दे पर वोट बैंक की राजनीति ने बहुत बेशर्मी से अपना रंग जमाना भी शुरू कर दिया है।

2 मार्च को कुंडा कस्बे के पास बलीपुर गांव में ग्राम प्रधान नन्हे यादव और उनके भाई की हत्या गोली मारकर कर दी गई थी। यह खबर जब पुलिस तक पहुंची, तो कुंडा के युवा पुलिस उपाधीक्षक जिया उल हक बगैर समय गंवाए घटनास्थल पर पहुंच गए थे। जिन लोगों की हत्या हुई थी, उनके परिजन बदला लेने के लिए हथियार लेकर निकल आए थे। पुलिस अधिकारी ने इन्हें शांत कराने की कोशिश की थी। लेकिन, हमलावर भीड़ ने अधिकारी को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। खतरे को भांपकर पुलिस की बाकी टीम जान बचाकर मौके से भाग गई थी। लेकिन, वह कर्तव्यनिष्ठ अफसर मौके पर डटा रहा था। इसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ी।

अब तक जानकारी यही मिली है कि इस अधिकारी को पहले तमाम यातनाएं दी गईं, फिर गोली मार दी गई। इस तिहरे हत्याकांड को लेकर प्रदेश की सपा सरकार के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। क्योंकि, शहीद अफसर की पत्नी परवीन आजाद लगातार यही कह रही हैं कि उनके पति की जान जाने के पीछे बाहुबली नेता राजा भैया की साजिश रही है। घटना के अगले दिन ही परवीन ने इस आशय की पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी थी। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, कुंडा के एक चर्चित नेता हैं। वे यहां की पुरानी रियासत के वारिस हैं। आरोप यही रहा है कि इस इलाके में राजा भैया के दरबार का ‘हुक्म’ ही सबसे बड़ा कानून है। ऐसे में, इस क्षेत्र में तैनात अधिकारियों को भी इस ‘दरबार’ में हाजिरी देना जरूरी हो जाता है। जो लोग किन्हीं कारणों से इस ‘परंपरा’ को नहीं निभाते, वे मुसीबतों का न्यौता ले लेते हैं। शायद युवा पुलिस अधिकारी ने यह ‘दुस्साहस’ किया था?

राजा भैया, 1993 में सिर्फ 26 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने थे। वे हमेशा निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हैं। वे पांच बार लगातार विधायकी का चुनाव जीत चुके हैं। इन दिनों सपा के पाले में हैं। पूर्वांचल की राजपूत बिरादरी में उनकी राजनीतिक पकड़ मजबूत मानी जाती है। ऐसे में, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की उन पर खास ‘कृपा’ रहती है। शायद इसी वजह से युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में भी वे कैबिनेट मंत्री बना दिए गए थे। जबकि, सपा अकेले अपने बूते पर भारी बहुमत से जीतकर आई थी। ऐसे में, सपा नेतृत्व की कोई मजबूरी नहीं थी कि वह राजा भैया जैसे विवादित निर्दलीय विधायक को सरकार में ऊंचा ओहदा दे। इस दौर में सपा नेतृत्व से यही सवाल जोरों से पूछा जा रहा है।

बाहुबली छवि वाले राजा भैया लंबे समय से विवादों में रहे हैं। वे खास तौर पर बसपा सुप्रीमो मायावती के निशाने पर भी रहे हैं। मायावती ने अपने शासनकाल में राजा भैया को 2002 में पहली बार जेल भिजवा दिया था। इन पर कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए थे। माया, जब दोबारा सत्ता में आईं, तो 2007 में भी राजा भैया को जेल जाना पड़ा था। लेकिन, उनके लिए सबसे बड़े मददगार बन गए थे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह। पिछले वर्ष मार्च में अखिलेश सरकार ने राजा भैया को जेल और खाद्य एवं रसद मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंप दी थी। यह अलग बात है कि अनजाने कारणों से पिछले महीने राजा भैया से जेल मंत्रालय का प्रभार हटा लिया गया था। इससे संकेत यही गए थे कि अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शायद उनकी कार्यक्षमता पर पहले जैसा विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।

भाजपा के कल्याण सिंह की सरकार में भी राजा भैया मंत्री बने थे। ये वही कल्याण सिंह थे, जो कि ‘कुंडा का गुंडा’ जैसे जुमले उछालकर अपनी राजनीतिक शेखी बघारते रहे थे। राजनाथ सिंह की सरकार में भी राजा भैया माननीय मंत्री की कुर्सी पर थे। सपा से चर्चित नेता अमर सिंह की विदाई काफी पहले हो चुकी है। इस तरह की धारणा रही है कि अमर सिंह के चलते सपा के पास राजपूत वोट बैंक टिकाऊ रहा है। लेकिन, अमर सिंह की गैर-हाजिरी में रणनीतिकार इस वोट बैंक के लिए राजा भैया की ओर देखने लगे थे। हालांकि, यह एक अलग बहस का विषय है कि राजा भैया जैसे बाहुबली नेताओं के बारे में इस तरह का आकलन कितना जमीनी होता है या कितना मनगढ़ंत होता है?

आइये, फिलहाल कुंडा घटना चक्र की ही बात करें। पुलिस अफसर की मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस प्रकरण में राजा भैया आरोपी बने, तो उनकी मंत्री पद की कुर्सी चली गई है। अखिलेश यादव ने उन्हें तलब करके इस्तीफा ले लिया था। अब दबाव है कि राजा भैया को हत्या की साजिश के मामले में गिरफ्तार किया जाए। परवीन आजाद, लगातार यही मांग कर रही हैं। उन्होंने अपने पति की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी विश्वसनीय नहीं माना। मांग कर दी है कि बड़े मेडीकल पैनल के सामने दोबारा पोस्टमार्टम कराया जाए। उन्होंने आशंका जताई है कि इस मामले में षड़यंत्रकारियों को बचाने की कोशिश हो रही है।

हालांकि, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव शहीद पुलिस अफसर के पैतृक गांव में जाकर परिजनों से मुलाकात कर चुके हैं। वादा कर आए हैं कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने संकेतों में कह दिया है कि यदि राजा भैया जांच में दोषी पाए गए, तो उनके साथ भी कोई रियायत नहीं होगी। यह अलग बात है कि सपा के कुछ रणनीतिकार राजा भैया के मामले में वोट बैंक की राजनीति का भी ध्यान रखने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। दूसरी तरफ, बसपा ने इस हत्याकांड को भुनाने के लिए तमाम राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। मंगलवार को पार्टी के सांसदों ने संसद में भी भारी हंगामा किया था। चूंकि, मरने वाला पुलिस अधिकारी मुस्लिम है। ऐसे में, कई सियासी ताकतें वोट बैंक की राजनीति का खेल करने में जुट गई हैं।

इस मामले में तरह-तरह के सियासी रंग भरने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। सहज रूप में यह मामला किसी तरह से हिंदू-मुस्लिम राजनीति का नहीं है। लेकिन, कुछ सियासतदां अपनी ओछी राजनीति से बाज नहीं आ रहे। जामा मस्जिद के चर्चित शाही इमाम अहमद बुखारी तो अक्सर अपने विवादित तेवरों के लिए मशहूर रहते हैं। उन्होंने इस मामले में शुरू से ही भड़कऊ तेवर दिखाए हैं। राजा भैया की गिरफ्तारी को लेकर दबाव बढ़ गया है। सपा नेतृत्व का सबसे बड़ा ऐतराज यही है कि बसपा किस मुंह से कह रही है कि प्रदेश में गुंडाराज है? जबकि, माया सरकार में तो इससे भी ज्यादा हालात खराब थे। सपा-बसपा की इस राजनीतिक धींगामुश्ती को दौर में प्रदेश के बुनियादी सकारात्मक मुद्दों की बहस कोसों दूर चली गई है। क्या यह स्थिति किसी राजनीतिक त्रासदी से कम कही जाएगी?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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