लंबी जद्दोजहद के बाद आखिर आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर कैबिनेट की मुहर लग गई है। इस विधेयक के कई मसौदों पर मंत्रिमंडल के बीच मतभेद चले आ रहे थे। इसी के चलते विधेयक के मसौदे पर कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिल पा रही थी। मंगलवार को कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाई गई थी। लेकिन, इसमें भी मतभेद बरकरार रहे थे।
ऐसे में, सहमति बनाने के लिए मंत्रिसमूह (जीओएम) का गठन किया गया था। इस मंत्रिसमूह ने विवादित मुद्दों पर बुधवार को फैसला कर लिया था। इसकी रिपोर्ट को ही कैबिनेट ने मंजूर कर लिया है। हालांकि, इस विधेयक के कई प्रावधानों पर सपा, बसपा और भाजपा जैसे दलों को घोर आपत्तियां हैं। ये दल इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक पंगा करने के लिए तैयार समझे जाते हैं।
इस विधेयक से जुड़े विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक सोमवार को होने जा रही है। सरकार की कोशिश है कि इसी बैठक में सर्वदलीय सहमति किसी न किसी तरह बनवा ली जाए। ताकि, इस विधेयक को मंगलवार को ही संसद में चर्चा के लिए रख दिया जाए। तैयारी चल रही है कि 20 मार्च तक इस विधेयक को संसद में पास करा लिया जाए।
लेकिन, भाजपा नेतृत्व प्रस्तावित विधेयक के एक-दो प्रावधानों को लेकर सहमत नहीं है। सपा नेतृत्व ने भी कह दिया है कि इस प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों का भारी दुरुपयोग हो सकता है। ऐसे में, यह कानून समाज में एक नए तरह की जटिलता पैदा कर देगा। इस खतरे को देखते हुए सपा दबाव बनाएगी कि कुछ प्रस्तावित प्रावधानों को बदला जाए। यदि सरकार ने उनके सुझाव को दरकिनार किया, तो इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकती है। भाजपा नेतृत्व को खास तौर पर सहमति से सेक्स के नए प्रावधान पर गहरी आपत्ति है। कैबिनेट ने जिस प्रस्ताव को कल मंजूर कर लिया है, उसमें सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से घटाकर 16 कर दी गई है।
कई महिला संगठनों ने भी इस नए प्रावधान को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। भाजपा को भी उम्र के प्रावधान का बदलाव रास नहीं आया। पार्टी की सांसद स्मृति ईरानी ने कहा है कि पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन-अपराधों के मामले में कड़े कानून बनाएगी। लेकिन, सरकार ने तो सहमति से सेक्स के मुद्दे पर उम्र घटाने का ही खेल कर दिया है। भला, इससे बलात्कारों की बाढ़ में कैसे रोक लगेगी?
भाजपा सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर पार्टी का नेतृत्व सर्वदलीय बैठक में अपनी आपत्तियां दर्ज कराएगा। जबकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने लोगों से यही कहा है कि प्रस्तावित कानून में जिस तरह से महिलाओं को घूरने और उनका पीछा करने के मामलों को भी गैर-जमानती बना दिया गया है, इसका भारी दुरुपयोग होने की आशंका है। इस नए कानून के सहारे गांव में फर्जी मुकदमेबाजी का सिलसिला बढ़ जाएगा। क्योंकि, किसी के लिए यह आरोप लगाना आसान हो जाएगा कि फलां शख्स, फलां महिला को बुरी नजर से घूर रहा था। पुलिस तंत्र भी इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रावधान को लेकर बसपा का नेतृत्व भी चिंतित है। उसे आशंका है कि इस प्रावधान के जरिए उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकर्ताओं को फर्जी मामलों में फंसाया जा सकता है। इसीलिए सर्वदलीय बैठक में बसपा भी इन प्रावधानों पर सवाल उठाएगी। उल्लेखनीय है कि पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में गैंगरेप हुआ था। इस घटना को लेकर देशव्यापी गुस्सा फूट पड़ा था। लोगों की व्यापक नाराजगी को देखकर केंद्र सरकार ने संकल्प लिया था कि बलात्कार जैसे मामलों में और कड़ी सजा का प्रावधान किया जाएगा।
गैंगरेप के मामले से उमड़े गुस्से को शांत कराने के लिए केंद्र सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन संबंधी एक अध्यादेश भी 2 फरवरी को जारी कर दिया था। इसके तहत रेप जैसे जघन्य मामलों में दोषियों को आजीवन कारावास से लेकर मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। दरअसल, दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद सरकार ने यौन-अपराधों के लिए कड़े प्रावधान के तहत एक न्यायिक समिति बना दी थी। यह समिति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व में बनी थी। इसने एक महीने के अंदर ही अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी थी। वर्मा समिति ने सिफारिश की थी कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में कमी के लिए कड़े कानूनी प्रावधान बहुत जरूरी हैं। सरकार ने वर्मा समिति की रिपोर्ट मंजूर कर ली थी।
केंद्र सरकार की कोशिश रही है कि 22 मार्च के पहले आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लगवा ली जाए। क्योंकि, इसी के बाद संसद सत्र में लंबा अवकाश हो जाएगा। जबकि, 4 अप्रैल तक ही यह आपराधिक संशोधन कानून अध्यादेश वैध है। यदि तय समय-सीमा में विधेयक पास नहीं हो पाया, तो अध्यादेश अपने आप निरस्त हो जाएगा। ऐसी किसी स्थिति में सरकार की ज्यादा किरकिरी हो सकती है। इस राजनीतिक जोखिम को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व कोशिश कर रहा है कि प्रस्तावित विधेयक पर सर्वदलीय सहमति बन जाए। ताकि, संसद के दोनों सदनों में दो दिन के अंदर ही विधेयक पास हो जाए।
बलात्कार विरोधी नए प्रस्तावित कानून के कई प्रावधानों पर गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बीच गंभीर मतभेद रहे हैं। कानून मंत्री अश्विनी कुमार पहले यही तर्क देते रहे हैं कि यदि सहमति से सेक्स के लिए उम्र-सीमा 18 से कम नहीं की गई, तो बलात्कार के फर्जी मामलों की बाढ़ आने का खतरा है। कानून मंत्रालय इस बात पर डटा था कि बलात्कार शब्द की जगह यौन हिंसा शब्द का प्रयोग किया जाए। लेकिन, महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ यही तर्क देती रहीं कि बलात्कार की जगह यौन हिंसा करार करने से अपराध की गंभीरता कम होने का खतरा है।
कृष्णा तीरथ सहमति से सेक्स के मुद्दे पर भी कानून मंत्रालय के तर्कों को खारिज करती आई थीं। वे यही कहती रहीं कि 18 की जगह 16 की उम्र कर देने से बाल यौन शोषण का खतरा और बढ़ सकता है। गृह मंत्रालय को भी कई प्रावधानों पर ऐतराज रहा था। इसी के चलते कैबिनेट में यह मामला तय नहीं हो पा रहा था। यहां तक कि यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी की फटकार के बाद भी कैबिनेट में पंगा बना रहा था। मंगलवार को इसी मुद्दे पर कैबिनेट की विशेष बैठक बुला भी ली गई थी। लेकिन, कृष्णा तीरथ और अश्विनी कुमार के बीच तीखे मतभेदों के चलते बात नहीं बन पाई थी।
बाद में, विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने के लिए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता में एक जीओएम का गठन कर दिया गया था। बुधवार को इस जीओएम की बैठक हुई। करीब दो घंटे चली मंत्रणा के बाद विवादित मुद्दों पर सहमति बन पाई। इसके बाद ही जीओएम की रिपोर्ट के आधार पर कल कैबिनेट की मुहर लग गई। पहले यह प्रस्तावित किया गया था कि यौन अपराध के मामले में फर्जी शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ दो साल की जेल तक का प्रावधान रहे। लेकिन, इस मामले में कृष्णा तीरथ ने जोरदार विरोध दर्ज कराया था। उन्होंने यही कहा था कि ऐसा करने से पीड़ित महिलाएं डरकर चुप्पी साध सकती हैं।
कई महिला संगठनों ने भी इस प्रावधान पर सख्त ऐतराज जाहिर किया था। इसे देखते हुए जीओएम ने फैसला किया कि इस तरह के कानूनी प्रावधान की जरूरत नहीं है। गृह मंत्रालय चाहता था कि किसी महिला को बुरी नजर से घूरने और
पीछा करने जैसे मामलों को गैर-जमानती न बनाया जाए। लेकिन, बाल विकास मंत्रालय इसके लिए अड़ गया था। जीओएम ने इन अपराधों को गैर-जमानती श्रेणी में ही रखने का सुझाव दिया था। जिस पर कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब सर्वदलीय बैठक में इन विवादित मुद्दों पर सरकार के रणनीतिकार कैसे सपा जैसे दलों को मना पाते हैं? ये देखने लायक जरूर होगा।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





