कथाकार अमरकांत को राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई

इलाहाबाद। हिंदी कथा जगत में मुंशी प्रेमचंद परंपरा के यशस्वी कथाकार अमरकांत नहीं रहे। अशोक नगर के पंचपुष्प अपार्टमेंट के आवास पर उन्होंने आखिरी सांस लेते हुए इस नश्वर संसार को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। 18 फरवरी को दोपहर करीब दो बजे रसूलाबाद गंगाघाट पर विद्युत शवदाह गृह में हुई अंत्येष्टि में सैकड़ों साहित्यप्रेमियों ने अमरकांत को नम आंखों से आखिरी विदाई दी। खास बात यह है कि फिराक गोरखपुरी के बाद शायद अमरकांत ही ऐसे दूसरे कथाकार हैं, जिनको राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। जिला प्रशासन ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। दिल्ली से सोनिया गांधी और लखनऊ से राज्यपाल बीएल जोशी ने भेजे गए शोक संदेश में कहा है कि अमरकांत का निधन साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है।

 
कथा जगत के इस सूरज के अस्त होने के बाद आखिरी दिनों में लिखा जा रहा उनका बेहतरीन उपन्यास ‘खबरों का सूरज’ भी अस्त हो गया। यह उपन्यास अधूरा रह गया। पिछले चार साल से लिखे जा रहे अपने इस उपन्यास को लेकर वे काफी उत्साहित रहे। 88 साल की उम्र में भी वे लेखन में काफी सक्रिय थे। याद आ रही है 21 अक्टूबर 2010 की दुपहरी। केके बिड़ला फाउंडेशन दिल्ली की तरफ से उनको व्यास सम्मान दिया जाना था। खुशी की बात यह थी कि व्यास सम्मान लेने के लिए अमरकांत को दिल्ली नहीं जाना था बल्कि सम्मान उनके पास इलाहाबाद खुद आया था। यह बड़ी बात थी। इलाहाबाद संग्रहालय में उनको सम्मानित किया जाना तय हुआ। उस समय मैं हिन्दुस्तान इलाहाबाद में कल्चरल रिपोर्टर हुआ करता था। मन में साध थी अमरकांत का लंबा और बेहतरीन इंटरव्यू करने की। मन में संकोच की गठरी लादे उनके अपार्टमेंट पहुंचा। अमरकांत के बेटे बिंदूजी ने उनसे अनुमति दिलाने में मदद की। उस लंबे इंटरव्यू में अमरकांत ने मन की गठरी खोल परत दर परत कई बातें पहली बार सामने रखीं। साफ तौर पर कहा था-‘अभी तो काफी कुछ करना बाकी है…..85 साल की उम्र में भी मन से युवा दिखने वाले अमरकांत में गजब की ऊर्जा थी। वे बहुत कुछ करना चाहते थे। अब क्या कहा जाए, उनका वो बहुत कुछ किया जाना तो बाकी ही रह गया। शायद उनकी आखिरी साध अधूरी ही रह गई।
 
एक जुलाई 1925 को बलिया जिले के भगमलपुर नगरा गांव में जन्मे श्रीराम वर्मा, घर से निकले थे मुहर्रिर बनने पर पत्रकारिता के रास्ते होते हुए कथा जगत के सरताज बन गए। हिंदी कहानी में अमरकांत, शेखर जोशी और मार्कण्डेय की तिगड़ी छा गई। वे कथा जगत के बेहतरीन शब्द शिल्पी थे। कहते हैं कि आत्मा तो अजर-अमर है, केवल शरीर मरता है। अमरकांत कथा जगत में अमर रहेंगे। उनकी कमी इलाहाबाद को ही नहीं, बल्कि कथा प्रेमियों और संसार के साहित्यधर्मियों को हमेशा हमेशा के लिए खलेगी।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट। संपर्कः shivashanker_pandey@rediffmail.com

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