उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन विधेयक में संशोधन जरूरी है

उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की विवशता ने एक बार फिर यहां उपजे राजनैतिक अनिश्चय के कारण कम से कम यह तो उजागर कर ही दिया है कि यहां के निवासी राजनैतिक रूप से कितने कमजोर हैं। वैसे तो निष्कंटक राजकाज चला पाना गये जमाने में कभी संभव रहा होगा, परंतु यहां तो शुरुआत ही गलत हुई है। राज्य गठन के तेरह वर्ष बीतने के साथ ही यहां कुल मिलाकर छः व्यक्ति भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो गये हैं। आज की तारीख में इतनी राजनैतिक अस्थिरता देश के किसी अन्य राज्य में नहीं है। खास तौर पर हिमालयी राज्यों में तो कतई नहीं।

तमाम हिमालयी राज्यों के बरक्स उत्तराखंड कुछ अन्य मामलों में भी एकदम अलग ही स्थान रखता है। जैसे इसकी राजधानी का, भले ही वह अभी अस्थाई ही कही जाती हो, मैदानी क्षेत्र में होना। दूसरा, दो-दो विधानसभा भवन (तीसरे की तैयारी है)। तीसरा, हिमालयी क्षेत्र में अवस्थित होने के बावजूद भी इसे हिमालयी राज्य का दर्जा नहीं मिल पाना। चैथा और सबसे महत्वपूर्ण एवं चिंतनीय विषय है अन्य हिमालयी राज्यों के बरक्स इसके निवासियों के हित-संरक्षण के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था का न होना।

इनकी चर्चा से पहले यहां हम बात करेंगे इसकी राजधानी की। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य की ग्रीष्म व शीतकालीन दो राजधानियां होते हुए भी 1967 में उस परंपरा को व्ययभार कम करने के लिए समाप्त कर दिया गया था। परंतु उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में दो-दो राजधानियों का तर्क आमजन की समझ के परे है। राज्य की शीतकालीन राजधानी गैरसैंण बनाने हेतु वहां विधान भवन बनाने के लिए सरकार ने एक पांच सदस्यीय समिति बना दी है और वहां दिखावे के तौर पर गत वर्ष मकर-संक्रांति के अवसर पर राज्य मंत्रिमंडल की बैठक कराई थी। यह प्रदेश सरकार का लोगों की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने का उपक्रम मात्र था और परंतु इससे लोग संतुष्ट नहीं हैं। क्योंकि देहरादून में न केवल भारी-भरकम निर्माण कार्य अबाध रूप से कराये जा रहे हैं, बल्कि आगे भी इनमें कोई कमी आने की बजाय स्थाई राजधानी के लिए रायपुर क्षेत्र में 600 एकड़ जमीन का चयन कर लिया गया है। ऐसे में गैरसैंण को लेकर राज्य के आमजन में निराशा तथा आक्रोश व्याप्त होना लाजिमी है।

यदि गहराई से देखा जाये तो मुद्दा गैरसैंण नहीं राज्य पुनर्गठन विधेयक है। सारे झगड़े की जड़ उसी विधेयक के वे प्रावधान हैं जिनके तहत इस पर्वतीय क्षेत्र के भोले-भाले लोगों के साथ छल किया गया। और यह महापाप करने वाले कोई और नहीं बल्कि इस पावन देवभूमि के अपने ही ‘सपूत’ थे। सतही तौर पर सीधा सा दीखने वाला यह प्रकरण बेहद उलझा हुआ है और इस पूरे घटनाक्रम की पड़ताल किये बगैर मामला समझ में आने वाला नहीं है क्योंकि समय के साथ सब कुछ घुंधलाता जा रहा है। पृथक उत्तराखंड राज्य गठन से पहले उत्तर प्रदेश की मुलायमसिंह यादव की तत्कालीन सरकार ने उत्तराखंड राज्य बनने पर उसकी स्थाई राजधानी के लिए सुझाव देने हेतु जिस कौशिक समिति का गठन किया था, उसने कुमाऊँ तथा गढ़वाल के सभी जिलों का दौरा कर विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों तथा आमजन से सीधा संवाद कायम करने के बाद 4 मई, 1994 को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में गौशाला (रामनगर), पशुलोक (ऋषिकेश) तथा गैरसैंण को इसके लिए उपयुक्त बताया था। उसमें हरिद्वार जिला या इसके कुंभ क्षेत्र का कोई उल्लेख नहीं था। राज्य गठन हेतु तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति के माध्यम से जब उत्तर प्रदेश सरकार के पास विचार के लिए प्रस्ताव भेजा गया था, तब उसमें भी हरिद्वार शामिल नहीं था। लेकिन जब 9 नवंबर, 2000 को पृथक उत्तराखंड राज्य गठन की घोषणा हुई तब उसमें कुंभ क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे हरिद्वार जिले को ही शामिल कर दिया गया था।

यह चमत्कार कैसे हुआ? आइये देखते हैं, 8 नवंबर, 2000 की शाम तक कुमाऊँ के तीन तथा गढ़वाल के पांच जिलों को मिलाकर ही पृथक उत्तराखंड राज्य बनाना प्रस्तावित था और उसी के अनुरूप केन्द्र सरकार के स्तर पर सभी तैयारियां की जा रही थीं, परन्तु इसी बीच तत्कालीन गढ़वाल सांसद भुवन चन्द्र खंडूड़ी तथा रमेश पोखरियाल के नेतृत्व में देहरादून तथा ऋषिकेश के कतिपय बड़े व्यापारियों तथा बिल्डरों का एक समूह तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी से मिला। जिसने उन्हें यह समझाने में सफलता पा ली कि कुमाऊँ तथा गढ़वाल की दो लोकसभा सीटों पर परंपरागत रूप से ब्राह्मणों तथा राजपूतों का वर्चस्व रहा है। जिससे वहाँ के दलितों में गलत संदेश जा रहा है। उन्हीं दिनों कांग्रेसी नेता प्रदीप टम्टा हरिद्वार जिले को प्रस्तावित राज्य में शामिल करने का मुद्दा बड़े जोरशोर से उठाये हुए थे और तब हरिद्वार लोकसभा सीट आरक्षित भी थी। आडवाणी को निर्णय लेने में अधिक देर नहीं लगी। उन्होंने तत्काल पूरे हरिद्वार जिले को ही शामिल करते हुए पृथक उत्तराखंड राज्य गठन की घोषणा करा दी। जिसमें अस्थाई राजधानी देहरादून बनाने का भी उल्लेख शामिल था। यदि हरिद्वार जिला उत्तराखंड में शामिल नहीं किया गया होता तो निश्चित रूप से यह एक शुद्ध पर्वतीय राज्य होता और तब इसकी राजधानी गैरसैंण बनाने में कोई ऐतराज भी नहीं होता।

इस पर्वतीय क्षेत्र का प्रारंभ से ही यह दुर्भाग्य रहा कि यहां के क्षेत्रीय विकास को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ कर देखने-दिखाने में सक्षम नेतृत्व का सर्वथा अभाव रहा। जो एकाध हुए भी तो उनकी स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने की आतुरता और प्रबल महत्वाकांक्षा को यहां के अभावग्रस्त लोगों के दुख-दर्द दिखाई-सुनाई ही नहीं पड़े। इन तथाकथित बड़े जन-नेताओं ने ही जब अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि के प्रति कर्तव्यबोध त्याग दिया तब फिर भला तीन तरफ से अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरे इस भू-भाग की चिंता किसी दूसरे को क्योंकर होती।

इस कमजोरी के कारण ही केन्द्र में भाजपा नीत सरकार ने बिना कोई ’होम वर्क’ किये ही रातों-रात आनन-फानन में अपने अल्प-राजनैतिक लाभ के लिए समूचे हरिद्वार जिले को शामिल करते हुए पृथक उत्तराखंड राज्य का गठन कर दिया। उत्तराखंड के कांग्रेसियों में भी दूरदृष्टि वाले, योजनाकार तथा पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व से अपनी बात मनवा सकने में सक्षम नेताओं का सर्वथा अभाव रहा। इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि कांग्रेस ने उसी ‘चमचों के विकास पुरुष’ और खड़ाऊँ पुजारी को नवगठित राज्य की बागडोर सौंप दी जो पृथक राज्य तथा समूचे पर्वतीय क्षेत्र के विकास का खांटी विरोधी था। भला ऐसा व्यक्ति हिमाचल के स्वनामधन्य नेता डॉ. यशवंत सिंह परमार से प्रेरणा लेकर इस नवसृजित पहाड़ी राज्य के साथ भी छलपूर्वक चिपका दिये गये मैदानी क्षेत्र को वापस मूल प्रदेश को लौटाने की बात कैसे कर सकता था? वह तो दूरदृष्टा, महान योजनाकार तथा अपनी जन्भूमि के प्रति समर्पित यशवंतसिंह परमार ही थे जिन्होंने हिमाचल का मुख्यमंत्री बनना तभी स्वीकार किया जब कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व उनकी इस बात पर सहमत हो गया कि नवगठित हिमाचल के साथ जोड़ दिये गये मैदानी भूभाग को अलग कर दिया जायेगा। फलस्वरूप पंजाब राज्य पुनर्गठन अधिनियम-1966 में संशोधन कर पेप्सू रियासत कहा जाने वाला संपूर्ण मैदानी क्षेत्र पंजाब को वापस लौटाया गया।

डॉ. परमार के उस दूरदर्शी निर्णय के बड़े दूरगामी परिणाम सामने आये। भूमि प्रबंधन, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, उच्च हिमालयी तथा दुर्गम क्षेत्रों सम्बंधी राज्य कर्मचारियों की सेवा-शर्तें, शुद्ध पहाड़ी राज्य होने से केन्द्रीय अनुदान, पहाड़ बनाम मैदान की खींचतान आदि अनेक ऐसे मामले हैं जिनको लेकर हिमाचल उत्तराखंड के बरक्स सुखी है। जबकि इसके ठीक विपरीत हालत है उत्तराखंड की। जहां इन सबके अलावा राज्य के स्थाई निवासी मामले का पेंच बुरी तरह फँसा हुआ है। उधर न्यायमूर्ति कुलदीपसिंह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय परिसीमन आयोग की सिफारिशों के चलते इस पर्वतीय क्षेत्र की अपेक्षाओं तथा आवश्यकताओं के विपरीत राज्य विधान सभा में यहां का प्रतिनिधित्व घट जाने से जनता और जन-प्रतिनिधि के बीच दूरियां बढ़ गईं हैं। यदि चमचों के विकास पुरुष ने अपने पहाड़ विरोधी रवैये को बदल कर उसे पर्वतीय विकास का पैमाना बनाया होता तो उसके वैसे ही सकारात्मक परिणाम सामने आते जैसे कि हिमाचल में आज भी देखे जाते हैं। यही कारण है लगभग आधी शताब्दी बीतने पर भी आज प्रत्येक हिमाचली डॉ. यशवंतसिंह परमार को आदरपूर्वक हिमाचल का निर्माता कहने में गर्व अनुभव करता है। साफ जाहिर है कि बड़े और अधिकार-सम्पन्न व्यक्ति द्वारा की गई गलती के दुष्परिणाम भी उतने ही व्यापक और दूरगामी होते हैं। काश! भाजपा के अदूरदर्शी नेताओं ने होम वर्क किये बिना अपना ‘उत्तरांचल’ यहां की जनता पर तब न थोपा होता। जिसके दुष्परिणाम आज यहां की जनता भोग रही है और आगे भी कई पीढि़यों तक भोगती रहेगी। फिर राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री ने भी यदि अपनी दूरदृष्टि का परिचय दिया होता तो इस राज्य की ‘आधा बगूला, आधा सुवा’ वाली हालत नहीं हुई होती। इसीके कारण समस्त हिमालयी राज्यों में केवल उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा उदाहरण है जिसे हिमालय के संदर्भ से काट कर देखा जाता है। यदि इसके साथ मैदानी क्षेत्र चिपकाने का छल नहीं हुआ होता तो इस शुद्ध पहाड़ी राज्य की भी गिनती अन्य हिमालयी राज्यों के साथ होती और उन्हीं के अनुरूप इसे भी केन्द्रीय सहायता दी जाती।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से लेकर त्रिपुरा व मिजोरम तक फैले हिमालयी क्षेत्र के सभी राज्यों में चीन (तिब्बत) तथा नेपाल जैसी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के बावजूद उत्तराखंड अकेला राज्य है जिसके निवासियों के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं की गई है। जबकि हिमालय क्षेत्र के अन्य राज्यों के लिए संविधान के अनुच्छेद-370 तथा 371 द्वारा ऐसे अनेक प्रावधान किये गये हैं जिनसे उन राज्यों के मूल निवासियों को अनेक प्रकार की रियायतें देने के अलावा वहां की सभ्यता, संस्कृति तथा परंपराओं के संरक्षण की भी व्यवस्था की गई है। उत्तराखंड के पड़ोसी हिमाचल में ही ऐसे अनेक प्रावधान लागू हैं जिनके तहत वहां के मूल निवासियों को प्राप्त पुश्तैनी हक-हकूकों का अतिक्रमण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता। मगर यहां तो ‘घर को ही आग लगा दी घर के चिराग ने’ वाली कहावत चरितार्थ हुई है। आज पूरे राज्य भर में चंद राजनैतिक स्वार्थी नेताओं के अतिरिक्त शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिलेगा जिसे इस छलावे का जरा भी दुख न हो। इस फैसले से तब उत्तराखंड के आमजन को न केवल हैरत हुई थी, बल्कि उसके भीतर जिन प्रबल भावी आशंकाओं ने तब जन्म लिया था, वे अब रूप-आकार ग्रहण करने लगी हैं।
 
प्रदेश
सरकार के हालिया चकबंदी कानून से एक और आशंका को बल मिलता है कि इससे यहां भू-माफिया काफी सशक्त हो जायेगा। कारण, अन्य हिमालयी राज्यों में बाहरी लोगों द्वारा जमीनों की खरीद पर संवैधानिक रोक लगी होने से उत्तराखंड में जमीन खरीदने की सुविधा और आसानी है। आगे चकबंदी से तो यह पर्याप्त मात्रा में एकमुश्त जमीन चाहने वालों के लिए और भी सुविधाजनक हो जायेगा। जबकि रसूखदार और अधिकार संपन्न लोग वेशकीमती जमानें अपने नाम पहले ही दर्ज करा चुके होंगे।
 
यहाँ
यह अनुमान लगाना अत्यंत कठिन है कि इससे अब तक कितनी हानि हो चुकी है और आगे कितनी होगी, परन्तु यह जरूर विचारणीय है कि राज्य आन्दोलनकारी आमजन की इच्छा, भावना, आशा, आकांक्षा तथा आवश्यकता के विरुद्ध दिया गया भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व का वह निर्णय क्या अब नहीं बदला जा सकता? क्या राज्य पुनर्गठन विधेयक पत्थर की वह लकीर है जिसमें संशोधन नहीं हो सकता? राज्य के प्रबुद्ध व्यक्तियों का मानना है कि यहां के आमजन की जरूरतों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इसे शुद्ध पहाड़ी राज्य बनाना तथा संविधान के अनुच्छेद-371 के तहत संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में लाना अत्यंत आवश्यक है। तभी यहां के जल, जंगल और जमीन की हो रही लूट पर न केवल विराम लगेगा बल्कि यहां के विकास को भी पंख लगेंगे और यहां से पलायन रोका जा सकेगा। तभी इस पर्वतीय भू-भाग के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन और दोहन समुचित रूप से हो सकेगा और इसे राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाया जा सकेगा। इसलिए उत्तराखंड के आमजन के हित में राज्य पुनर्गठन विधेयक में शीघ्रातिशीघ्र संशोधन अत्यंत आवश्यक है। कृपया इस मुद्दे पर न केवल अपनी राय देवें बल्कि अधिकाधिक शेयर करने का कष्ट भी करें।

 

लेखक श्यामसिंह रावत से संपर्क उनके मो. 9410517799 या ईमेल ssrawat.nt@gmail.com पर किया जा सकता है। 

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