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अमर उजाला मेरठ संस्करण आज 28वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है…. एक किस्सा…

Jitendra Dixit : अमर उजाला मेरठ संस्करण आज 28वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1989-90 में अखबार से जुड़ा। अमृत प्रभात का लखनऊ संस्करण बंद होने के बाद नौकरी की तलाश में मेरठ पहुंचा। स्व. अतुल माहेश्वरी जी से संक्षिप्त बातचीत के बाद नौकरी मिल गयी। ना कोई लिखित परीक्षा और ना ही साक्षात्कार की औपचारिकता। कह सकते हैं कि दस मिनट की बातचीत में ही एक-दूसरे को जान-समझ लिया। भरोसे के साथ एक ही सेवा शर्त- अमर उजाला के लिए आप काम कीजिए, आपकी चिंता अमर उजाला करेगा। उसी क्षण जीवनपर्यंत अमर उजाला से जुड़े रहने का स्व संकल्प-सा ले लिया।

Jitendra Dixit : अमर उजाला मेरठ संस्करण आज 28वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1989-90 में अखबार से जुड़ा। अमृत प्रभात का लखनऊ संस्करण बंद होने के बाद नौकरी की तलाश में मेरठ पहुंचा। स्व. अतुल माहेश्वरी जी से संक्षिप्त बातचीत के बाद नौकरी मिल गयी। ना कोई लिखित परीक्षा और ना ही साक्षात्कार की औपचारिकता। कह सकते हैं कि दस मिनट की बातचीत में ही एक-दूसरे को जान-समझ लिया। भरोसे के साथ एक ही सेवा शर्त- अमर उजाला के लिए आप काम कीजिए, आपकी चिंता अमर उजाला करेगा। उसी क्षण जीवनपर्यंत अमर उजाला से जुड़े रहने का स्व संकल्प-सा ले लिया।

तब का एक छरहरा नौजवान आज वृद्ध और विकलांग हो चुका है। संतोष है कि अखबार के साथ जो रिश्ता जुड़ा वह निर्बाध अभी तक कायम है। तब योगेंद्र दुबे जी संपादकीय प्रभारी थे। उन्हें ही रिपोर्ट करना था। बड़ी-बड़ी लाल डोरे वाली आंखें, बेतरतीब दाढ़ी, गले में ओसो वाली माला, एकदम मस्त मलंग। परिचय की औपचारिकता के बाद दोस्ताना अंदाज में बातचीत। सबसे पहले ध्यानवीर सिंह धीरज से संबद्ध किया गया। उन्हीं से संपादन सीखने का अवसर मिला। बीते सत्ताइस सालों में सब कुछ एकदम बदल गया। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर विकसित कार्यसंस्कृति में अपनत्व तिरोहित हो चुका है। अखबार ने उल्लेखनीय प्रगति की। तब मात्र चार स्थानों आगरा, बरेली, मेरठ और मुरादाबाद से ही छपता था। आज पूरी हिंदी पट्टी में १८ संस्करणों के साथ अमर उजाला छा गया है।

प्रगति में यदि कुछ खो सा गया है तो वह रिश्तों की गर्मजोशी और समर्पण का भाव। तब संपादक व संपादकीय कर्मियों में एक परिवार सा रिश्ता था। बहस- विवाद होते थे, पर कोई किसी से दूरी नहीं रखता था। शिकवे-शिकायतें रहती थी पर टीम भावना पर उसका असर कभी दिखायी नहीं देता था। काम के मूल्यांकन में पूरी पारदर्शिता थी। क्षमता का बेहतर इस्तेमाल था। बेहतर काम सामने आने की गारंटी थी। मालिक और कर्मचारी सब एक परिवार की तरह बंधे थे। सुख-दुख में सब भागीदार रहते थे। अब ऐसा नहीं लगता। वही दिखता है जो देखना होता है। गाड फादरिज्म के इस दौर में आगे बढऩे के उपाय करने पड़ते हैं, सेल्फ मैनेजमेंट और लाइजन के बिना यथास्थिति तोडऩा कठिन हो चुका है। उस समय की टीम के कुछ गिने-चुने साथी ही बचे हैं।

आज सालगिरह के मौके पर जश्र का माहौल है। अपनी आंखों के सामने २७ साल के शानदार सफर का सिंहावलोकन है। अमर उजाला के नवोन्मेष्क आ. अतुल जी, नौनिहाल जी, केशव जैन साहब, संतोष वर्मा जी, विनीत पारिक, रूपकिशोर, अमरपाल जैसे साथी हमेशा के लिए दूर चले गये। उन सबका नमन। श्रद्धांजलि। बाजारवाद- कारपोरेट संस्कृति के तमाम दुष्प्रभाव, उतार-चढ़ाव के बाद भी प्रबंध निदेशक राजुल माहेश्वरी जी के कुशल नेतृत्व में अभी भी अमर उजाला बहुत कुछ दूसरे अखबारों से भिन्न है। पुराने कर्मचारियों के प्रति संवेदनशील है। शायद इसी वजह से हम भी आज इस सालगिरह के जश्र में खुद को शामिल पा रहे हैं।

अमर उजाला, मेरठ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

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