40 का होने पर कुछ बात बेबात

मोक्ष अचानक नहीं मिलता. वह लगातार चलता रहता है और उसके चलते रहने से जो स्वाभाविक गुणात्मक मात्रात्मक बढ़ाव चढ़ाव विकास होता है वह एहसास कराता जाता है कि मोक्ष की तरफ अग्रसर हैं. जब काफी करीब पहुंच जाते हैं हम तो एक डेडलाइन तय करने लगते हैं या फिर डेडलाइन से परहेज करने लगते हैं. जो डेडलाइन तय कर देता है कि इस दिन से अब तक मिले ज्ञान मोक्ष समझ को पूरी तरह जीवन में उतार लेना है, ढाल लेना है तो वो साहस का दिन होता है और ये दिन मोक्ष का दिन घोषित कर दिया जाता है. वह मौका वह दिन एक खास तारीख के रूप में तब्दील हो जाता है.

मोक्ष ज्ञान समझ चेतना अंतर्दृष्टि निर्वाण कैवल्य ध्यान शून्य संपूर्ण उदात्त… जैसे शब्दों को मिला दिया जाए और कोई एक शब्द बनाया जाए तो क्या बनेगा? मुझे भी नहीं पता. पर मान लेते हैं वह शब्द मोक्ष है, तो इस शब्द के मायने इसका अर्थ कितना विशाल कितना अदभुत कितना शानदार होगा. इस विशाल अदभुत शानदार मोक्ष तक पहुंच पाना बड़ा भारी है. जितनों ने इसे पाया, समझा, जाना है उनके रास्ते तरीके अलग अलग रहे हैं. कोई एक डिफाइन नहीं है. जिसका जो काल अर्थ संस्कार परिवेश रहा, उसने उस हिसाब के तरीके फार्मेट के जरिए इसे हासिल किया… यह विभिन्नता ही आनंद है… इस आनंद को वही समझ पाएगा जो मोक्ष को पा चुका हो… वरना यह विभिन्नता व्यवहार में अमोक्ष धारियों के लिए संप्रदाय सेक्ट कट्टरता और फिर पूर्ण अमोक्ष की तरफ जाने का रास्ता बन जाता है…

मोक्ष पर कुछ तफसील से बात करें. और मूर्त रूप से. और मेरे संदर्भ में. और, कोशिश करूंगा इस बहाने खुद के 26 अगस्त को 40 साल का होने के दौरान की मनःस्थिति को बयान कर सकूं. मेरे लिए मोक्ष का दिन है आज. जो पाया है उसे बता देने का दिन है आज. इसलिए नहीं कि इसके जरिए खुद को कोई बड़ा आदमी या खुद को कोई संत या खुद को कोई खास बनाने की सायास कोशिश करूं. इसलिए कि इससे उन साथियों का फायदा हो सके, समझ बढ़ सके, अपग्रेड होने में मदद मिल सके, मोक्ष के रास्ते की तरफ होने चलने के बारे में संवेदनशीलता बढ़ सके जिनमें मेरे जैसी बेचैनी तड़प हाहाकार आवारापन बंजारापन फक्कड़पन अराजकता नंगापन समाहित हो. और जिनमें ये न हो, वे अपने रास्ते अपने संस्कार अपनी समझ के जरिए इसे महसूस करें और खुद के व मेरी समझ की विभिन्नता में दिख रहे कुछ एकता के सूत्रों के सहारे पूरे विभेद की उदात्तता व उद्वेग का आनंद ले सकें. इनसे अलग बहुत बड़ी या यूं कहिए कि बहुमत वाली संख्या है जो इसे डिग्रेड, कनफ्यूज, दार्शनिक, वैचारिक, अबूझ मान कर साइड कर देगी, जो स्वाभाविक व सहज है. एक सा न दिखना ही पूरे सृष्टि, धरती का सौंदर्य है और इन सभी का अंततः एक से ही होना, एक ही होना इस सौंदर्य के पीछे का फार्मूला है. पूरे सवाल का जवाब इस पूरे सवाल में ही छिपा होना सबसे बड़ा सच है, इस सबसे बड़े सच को जान लेना सबसे बड़ी उपलब्धि है, वही मोक्ष है. यहां तक पाने के लिए यहां तक पहुंचने के लिए कोई सीढ़ी नहीं बनी है. कोई बना भी नहीं सकता. बन भी जाएगा तो उसे समझेंगे उतने ही जितनों को समझना होगा और इन समझने वालों को इसे समझने की संवेदना भी तभी डेवलप होगी जब वह अपने तौर तरीकों से खुद के चेतना के लगातार हो रहे विस्तार विकास को महसूस करते हुए भांतते हुए इस मोक्ष के करीब मंडरा रहा होगा, इस बड़े सच का गंध पा रहा होगा, इसे बेचैनी से हर कहीं तलाशने में जुटा होगा. ऐसी हालत में वह किसी दूसरे से मदद नहीं पा सकता, हां इशारे पाता रहता है, खुद ब खुद सीखता रहता है, पर वह समूची विकसित संवेदना समझ को खुद ही पूरी तरह महसूस कर पाएगा, दूसरों को पूरा का पूरा कतई संप्रेषित नहीं कर पाएगा.

कहना तो और ज्यादा साफ साफ चाह रहा हूं पर कहते कहते अमूर्त होता जा रहा हूं और ऐसा लगने लग रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि जो लिख रहा वह केवल मैं ही पढ़ूं व समझ सकूं क्योंकि दूसरे तो कह मारेंगे कि ऐसा उनके जीवन में तो कुछ नहीं सो यह काहे की फिलासफी, कैसी फिलासफी, कैसा प्रवचन, कैसा दर्शन, कैसा बकवास, कैसा दिखावा…. वाजिब है उनका ऐसा सोचना. इसलिए कि मुझे किसी के कुछ भी होने से सोचने से करने से कोई दिक्कत नहीं है. अगर किसी के कुछ करने होने सोचने से मेरा निजी तौर पर कुछ होता है तो मेरे शरीर तन रक्त मांस मज्जा आदि को अच्छा बुरा हो सकता है पर मेरी जो संपूर्ण समझ है, मेरी जो मोक्ष की चेतना है, जो कई बरसों से विकसित हो रही थी और अब वह संपूर्णता (अभी आज तक की मेरी सोच के हिसाब से, अन्यथा संपूर्णता के साथ सतत कुछ न कुछ जुड़ाव कुछ न कुछ अपडेट भिनता सटता समुच्चयित होता रहता है) में तब्दील हो चुकी है, को कुछ नहीं हो सकता. वह बुद्धत्व, वह आनंद, वह संपूर्ण हो जाने का भाव, वह सब कुछ जान समझ लेने की स्थिति, वह मुस्कराहट, वह महाबोध कोई नहीं ले सकता मेरे से. कोई नहीं जान सकता मेरे इस मस्ती के आलम को. मेरे को लोग अपने अपने चश्मे से देखते पकड़ते कहते बोलते बताते निपटाते सजाते गिराते उजाड़ते रहेंगे और उनकी वह समझ कृत्य राय पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा सकती है, पर उससे मेरी मस्ती को कुछ नहीं हो सकता. मैं तो अब सबसे गया.

कुछ अच्छा नहीं है. कुछ बुरा नहीं है. कोई विकास नहीं है. कोई विनाश नहीं है. कोई नैतिकता नहीं है. कोई अनैतिकता नहीं है. कोई गीत नहीं है, कोई गद्य नहीं है. कोई धर्म नहीं है, कोई अधर्म नहीं है. अच्छा बुरा, विकास विनाश, नैतिकता अनैतिकता, गीत गद्य, धर्म अर्धम.. सब मिल गया है एक में. पंचमेल नहीं, कई मेल खिचड़ी पक गई है. बड़ी स्वादिष्ट है. ये खिचड़ी आपके लिए है, मेरे लिए है. पर मुझे इस खिचड़ी में सबके सब दिख रहे हैं, अलग-अलग भी, और एकसाथ भी. सबके मजे भी दिख रहे हैं, और सबकी स्वादहीनता भी.. सबकी सीमाएं भी दिख रही हैं और सबकी सीमाविहीनता भी. इन्हीं सबों तक अब मैं नहीं. इन्हें दूर से देख पा रहा हूं. इन सभी को अपना मान रहा हूं. पर इन सभी से अलग भी हो गया हूं. ये दिखते दिखते नहीं दिखने जैसे भी हो जाते हैं. अब सिर्फ यही नहीं दिखते. ये हो गया है मेरा साथ, ये बदलाव आ गया है मेरे में, इसे हासिल कर लिया है अब. मरना है या जीना है… कमाना है या भागना है.. पाना है या खोना है… रहना है या जाना है.. पीना है या छोड़ना है… पकड़ना है या देना है… इन सभी को पीछे छोड़ आया हूं… कुछ नहीं कहना है, किसी को नहीं समझाना है.. मस्त रहना है.. मोक्ष में रहना है… महाबोध को इंज्वाय करना है.. तुम लोग अपना करो, मैं अपना. तुम लोगों का मेरे से लेना होगा तो ले लेना, मेरे को तुम लोगों से कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं लेना है.. सब पा गया यार.. सब हासिल कर लिया.. इतना बड़ा इतना सारा दे दिया कि इसे चुका न पाने लौटा न पाने का बोध रहेगा. बोध की जगह अपराध बोध इसलिए नहीं लिखा क्योंकि अपराध बोध में एक प्रायश्चित का भाव होता है, गलत हुए को कूबलने को भाव होता है.. मैं जानता हूं कि मैं लौटा न पाउंगा क्योंकि यही अंतिम सच है. यह तय है. इसलिए कोई अपराध बोध नहीं, इतना कुछ पाया है तो न लौटा पाने के लिए. सबको देने की कोशिश भी नहीं करूंगा क्योंकि देने की कोशिश करने पर न लेने का भाव डेवलप होने लगता है, एक्शन का रिएक्शन होने लगेगा, सो मेरा देना नुकसान भी दे सकता है. एक्शन रिएक्शन से परे हो जाने के भाव ज्ञान मोक्ष महाबोध को भला कोई किसी को देने की कोशिश करेगा तो वह जबरन देना का मामला न होगा और इस तरह से देने की प्रक्रिया में जो एक्शन होगा उससे रिएक्शन न पैदा हो जाएगा, सो जिस भाव को देने जा रहे हैं, उस भाव की संवेदना तत्व का ही नाश न हो जाएगा. इसलिए सारी. न देना है न लेना है. हो सकता है आप अपनी नजर में कुछ दे रहे हों और मैंने ले भी लिया पर वह मेरा लेना न हुआ. वह बस ले लिया क्योंकि आप दे रहे थे और आप दे रहे थे तो आपका एक्शन था, उस एक्शन को हो जाने दिया, मैंने ले लिया. मैंने नहीं लिया तो आपका एक्शन रिएक्शन भी हो जाएगा और फिर आप मुझे आप रिएक्शन में देने लगेंगे. जो लोग रिएक्शन में देंग तो उसे भी ले लूंगा, क्योंकि उन्हें डीकोड करने के लिए उन्हें एक्शन में लाने के लिए उनके रिएक्शन को कबूल करना होगा और जब वो एक्शन में आ जाएंगे तो फिर अपने हिसाब से कुछ देने की कोशिश करेंगे तो उसे भी ले लूंगा क्योंकि न लूंगा तो वो रिएक्शन में बढ़ने लगेंगे. असल में मेरी दिक्कत है कि मुझे एक्शन रिएक्शन दोनों में दिक्कत नहीं, दोनों आपके हैं और आप दोनों को प्रतिदान करने की कोशिश करते हैं.. इसलिए आपका जीवन ही यही है.. और, मेरा जीवन यह नहीं रह गया है इसलिए इसमें मुझे फंसना नहीं, पड़ना नहीं, इसलिए आप अपने हिसाब से मुझे देते रहो, एक्शन या रिएक्शन, मैं लेता रहूंगा, ऐसा आपको लगेगा, और वो मेरे यहां पड़ा रहेगा, पर उसके होने का एहसास मेरे में नहीं रहेगा. आपके न देने पर भी मेरे अगल बगल यही सब तो है, लेकिन वो यही सब है अब है की जगह था हो गया है… यानि है आपके लिए है, था मेरे लिए है. मेरे अगल बगल मेरे भीतर जो एक्शन रिएक्शन आपको दिख रहा है, वो मेरे लिए था है. आपको वो दिखेगा, क्योंकि आपकी दुनिया यही है. मुझे नहीं दिख रहा क्योंकि उसके होने से उससे परे ले जाने की मेरी वर्तमान स्थिति पर कोई फरक नहीं पड़ता, न पड़ने वाला. ऐसा भी नहीं कि उसके प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है. आखिर वही तो वो बारीक स्थूल चीजें हैं जिस पर चल कर अनुभव कर आगे बढ़ा हूं और उससे आगे जाते रहने के बारे में संवेदना उर्जा एक्सीलेरशन पाता रहा हूं. हां, आप उसके दुख सुख को लेकर कहीं रुक गए हैं, उसी को जीकर अंतिम मानकर पूरी यात्रा का सच जानने का अपना नजरिया विकसित कर चुके हैं इसलिए आप उससे परे जा चुकों के बारे में अपने उसी प्रेमवर्क-फ्रेमवर्क से अंतिम नतीजे निकालते रहेंगे. पर आपकी गलती नहीं है. यही मेनस्ट्रीम है मित्र. इसलिए मेनस्ट्रीम का सच आखिरी सच है, यह नारा देना मेनस्ट्रीम वालों का काम रहा है, रहेगा और इन्हीं फ्रेमवर्कों के जरिए मेनस्ट्रीम से बाहर निकल चुके लोगों के बारे में धारणाएं बनाई जाती रहेंगी. हां, जैसा कि मेनस्ट्रीम में काफी लोग मेनस्ट्रीम से बाहर जा चुके लोगों के सिंपेथाइजर होते हैं, समर्थक होते हैं, उनके बारे में जानने बताने को उत्सुक रहते हैं, उनके बारे में तरह तरह के प्रोपेगंडा करते रहते हैं, इसलिए मेनस्ट्रीम में ही मेनस्ट्रीम से परों के लिए एक अच्छी मेनस्ट्रीम अल्पमत विद्वत राय भी बनेगी, जिसके सूत्र पकड़ कर कई मेनस्ट्रीम वाले इस मेनस्ट्रीम से जा चुके वालों तक जाने का, उनसे संवाद करने का, उन जैसा होने या उन जैसा होने के अनुभवों को समझने की कोशिश करने का काम करेंगे.

मुझमें वो सब कुछ है जो बहुत चीप, घटिया, गैरकानूनी, गैरसंवैधानिक, गैरमानवीय, निंदनीय माना जाता है, आप लोगों के द्वारा. मुझमें वो सब कुछ है जो बहुत उदात्त, बहुत मानवीय, बहुत प्राकृतिक, बहुत संवेदनशील, बहुत संवैधानिक, बहुत प्रशंसनीय माना जाता है. मुझमें इस विरोधाभाष को समझने की समझ आ गई है. मुझमें इन दोनों को एकसाथ, पल-पल जीने की चेतना आ गई है. मुझे इन्हें जीने के लिए कुछ भी न करने का फार्मूला मिल गया है. मुझे यह सब कर कर के जीना आ गया है. मुझे हिंसा, गुस्सा, ईर्ष्या, विद्वेष, महात्वाकांक्षा को जीते हुए अहिंसा, शांति, प्रेम, सहयोग, भाईचारा, संतोष को जीना आ गया है. मुझे इनमें से किसी से कोई शिकायत नहीं. जी, सच कह रहा हूं. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं, मुझे किसी से कोई अपराधबोध नहीं, मुझे किसी से कोई संताप नहीं, मुझे किसी से कोई लगाव नहीं. ये सब हों तो हो. ये सब हैं तो हैं. पर मैं तो नहीं हूं न इन सबके पाले में खड़ा. ये सब जहां हैं, वहां हैं और वहां बहुत से लोग आ जा रहे हैं, पकड़ देख समझ रहे हैं, आ जा रहे हैं. सोच हंस रो झूम रहे हैं. मैं वहां नहीं हूं. उस भीड़ से हट गया हूं. जाने कहां हूं कि वहां तो नहीं हूं, पर वहां के सब कुछ को देख सुन रहा हूं, और वहां के देखने सुनने की प्रक्रिया, नतीजे व इस रुटीन को देखते देखते खुद ब खुद न देखने की स्थिति में चला जा रहा हूं. जैसे रेलगाड़ी के शोर की ऐसी आदत, समझ, नतीजा, लय डेवलप हो जाती है कि इस शोर के बावजूद रेल में सोते हुए इस शोर से आदमी मुक्त हो जाता है. वह शोर सुनता भी है, और शोर से खुद को मुक्त भी पाता है.

ऐसी स्थिति में आपसे क्या कहूं. क्या बताउं कि मुझे ये ये बताना है व बनना है व करना है. क्या गढ़ूं कि मुझे ऐसा बनना है ऐसा होना है ऐसा चाहना है. कुछ नहीं कहना अब. आप लोगों के पास बहुत कुछ है कहने बताने जताने करने के लिए.. आप तेजी में हैं. मैं शांत हो गया हूं. मुझे कुछ नहीं बताना करना बनना जताना. आप जैसा हूं, और आपके बीच में हूं इसलिए आप मेरे को लेकर कुछ न कुछ जरूर राय बनाएंगे, कि जैसे आप कुछ कर रहे हैं, कह रहे हैं, कर रहे हैं, वैसा ही मैं भी कुछ न कुछ जरूर कह कर रहा हूं. ये आपकी स्टाइल है. मेरी स्टाइल बदल गई है. मैं आपके करने जताने जानने को जानता हूं, इसके शुरुआत से लेकर विकास तक और विकास से लेकर अंजात तक, इसलिए मैं कुछ न कहूंगा, न बताउंगा, न जताउंगा. आपमें ललक बाकी है, मेरे बारे में जानने बताने जताने की क्योंकि मैं भी आप जैसा हूं, प्रजाति का हूं, आपकी भीड़ का हिस्सा हूं, मांस शक्ल नाक नाम कान धारी हूं इसलिए मेरी भी एक कुंडली आपकी नजर में बनी है, उसे बनाते बिगाड़ते रहेंगे आप. पर मुझे अपने खुद के होने, मेरे मांस शक्ल नाम कान होने में कोई कनसर्न नहीं, कोई संवेदना नहीं, कोई लगाव नहीं इसलिए मैं इन स्थूलों के जरिए आपके बारे में न कुछ जानना बताना कहना समझना चाहूंगा और न कुछ ऐसा बचा रह गया है जिसे मुझे जानना बताना कहना समझना हो. इसलिए, ये सारा काम आपके जिम्मे. मैं आपका नहीं रहा. मैं चला गया हूं आपके यहां से. बस प्रतीक बाकी है मेरा, जो हूबहू आप जैसा है. मेरे लिए वो मेरा सिंबल जो बिलकुल आप जैसा है, मरे समान है. पर आपके लिए मेरा प्रतीक पूरी तरह जिंदा और आपके स्ट्रक्चर कद काठी प्रजाति जैसा है, और इसीलिए आपकी नजरों में पूरा जीवंत है. मुझे आपने जितना पकड़ रखा है, वो मुझे मालूम है. पर मुझे यह आपसे ज्यादा पता है कि मैं आपके पकड़ में हूं ही नहीं. हा हा हा.. क्या कहूं. कहते कहते लिखते लिखते हंसी आ रही है. मेरे इस कहने लिखने को समझते समझते शायद मेरे पर आपको गुस्सा आ रहा हो या मेरे में दर्प दिख रहा हो या मेरे में विद्वता झलक रही हो, या पूरा का पूरा उल्लू का पट्ठा नजर आ रहा हूं या कोई करामात या साजिश समझ पा रहे हैं, पर मेरी जान यह सब आप सोच रहे हैं, मैं नहीं… हा हा हा हा हा…

समझ लीजिए मेरी अब किसी चीज में कोई रुचि नहीं क्योंकि रुचि अरुचि आपका स्वभाव है. मैंने इस स्वभाव को बहुत और देर तक जिया है. अब जाकर आपसे, अपने से मुक्ति पाया हूं, इसलिए मेरे को अब आप नहीं समझ सकते. आप मेरे स्थूल में फंसे रह जाएंगे. यही होता रहा है. और, यही गति है, यही मेनस्ट्रीम है, यही फार्मूला है. मेरे से जो आपको घृणा या प्यार या आकांक्षा या क्षमा या स्नेह या उम्मीद बाकी है, वो आपका सच है. मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए. मैं आपको वो देता हुआ जरूर महसूस हो जाउंगा जो आप मुझसे उम्मीद करते हैं क्योंकि ये उम्मीद आपकी है, इसलिए उम्मीद के रास्ते कुछ न कुछ मेरे चाहते न चाहते हुए भी आप तक स्थूल या सूक्ष्म रूप में पहुंच जाएगा.

इसलिए प्लीज. मुझे हर चाह से मुक्त कर दीजिए, क्योंकि आपकी चाह के रास्ते मेरे तक भी आपका कुछ न कुछ संदेश, बात, अटेंशन, एलर्ट, मैसेज पहुंच जाता है, मेरे न चाहते या चाहते हुए भी क्योंकि आप खुद चाह रहे हैं, इसलिए मुझे मुक्त कर दीजिए. हालांकि आप जो मुझ तक पहुंचाते हैं, वह मेरे लिए किसी मतलब का नहीं है, सिवाय कुछ क्षण कुछ देर ध्यान भटकाने के, पर यह कुछ क्षण का ध्यान भटकना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यह सहज है व अल्पमत में है और समझ के दायरे में है. सो, इससे इसी तरह से मुक्त हो जाता हूं जिस तरह भीड़भाड़ चिल्लपों वाली सड़क किनारे बने मकान में रह रहे आदमी. वो उस शोर चिल्ल पों के इतने आदी हो जाते हैं कि वह शोर उन्हें सामान्य लगने लगता है, इसी कारण वह इस सामान्य से मुक्त रहते हैं. इसीलिए मैं आपकी चाह संदेश अटेंशन एलर्ट मैसेज से मुक्त रहता हूं. मुझे आप भले एक 'मैं', एक नाम मानो पर असल में मैं तुम सबमें हूं और कहीं अलग भी हूं, पूरा अकेले, पूरा सूक्ष्म, तुम एक लंबी अंकगणित हो तो मैं कहीं किसी कोने में लिखा गया छोटा सा फार्मूला, जिसके जरिए अंकगणित के सवाल गढ़े जाते हैं और फिर उत्तर निकाले जाते हैं. तुम गढ़े गए सवाल हो तो मैं तुम्हारे भीतर छिपा वह फार्मूला जिसके सहारे तुम उत्तर बन जाओगे, हल हो जाओगे. इसलिए मैं फार्मूला होते हुए भी तुम सवालों, तुम उत्तरों में व्याप्त हूं इसलिए तुम हम सब एक होते हुए भी तुम हम सब अलग अलग दिख रहे हैं और अलग अलग स्टेटस में हैं. तुम सवाल हो, जो उद्वेलित हो रहे हो, हल होने को तत्पर हो. हल होने के लिए लड़ भिड़ रहे हो, टूट रहे हो, मिट रहे हो, जूझ रहे हो, हल होते होते हुए गलत उत्तर में तब्दील हो जा रहे हो, कभी कभी हल हो जा रहे हो और हल होकर समाप्त हो जा रहे है क्योंकि तब तुम उत्तर में तब्दील जो जाते हो जो शांत है, स्थिर है, सूक्ष्म है, अचेतन है, रुका है. जड़वत है पत्थर सा. फार्मूला में भी बेचैनी है. वह उत्तर हो जाना चाहता है. रुक जाना चाहता है. पत्थर बन जाना चाहता है. क्योंकि उसके सहारे ढेर सारे सवाल, अलग अलग किस्म के सवाल, भांति भांति सवाल बनाए जाते हैं. और फिर वो सारे सवाल जूझते हैं, लड़ते हैं, उत्तर तक पहुंचने के लिए. पर जब
 फार्मूले को ये बोध हो जाता है कि गल्ती उसकी नहीं, गल्ती सवाल की है क्योंकि वह उत्तर में तब्दील नहीं हो पा रहा है, और वह खुद से सवाल बनाए जाने और उत्तर में तब्दील हो जाने या न हो जाने की प्रक्रिया का खुद कारण नहीं और कारण है तो सवाल में छिपा उसका छाया यानि फार्मूला और उस फार्मूले के जरिए उत्तर में तब्दील होना सब कुछ एक साफ साफ लेकिन अदृश्य से राजमार्ग की तरह है तो वह इस सबसे परे उठ जाता है. शांत बैठ जाता है. तब वह फार्मूला भी उत्तर की तरह हो जाता है. फार्मूला, सवाल, उत्तर… तीनों में एक ही है, डिजिट. डिजिट यानि अंक और इन्हीं अंकों से बनी गणित. डिजिट का बोध, डिजिट का लय, डिजिट की ताल, डिजिट का सौंदर्य, डिजिट की सीमा … सब कुछ जब फार्मूला, सवाल और उत्तर में शामिल है और सभी को जो महसूस कर लेता है वह लगातार एक से निकलकर दूसरी तीसरी अवस्था में पहुंचकर इतिश्री, ओके, सही को प्राप्त हो जाता है जिसे आप महाबोध, मोक्ष, चैतन्यता, निर्वाण, कैवल्य भी कह सकते हैं.

कितना सब कुछ साफ-साफ एक दूसरे से जुड़ा है. आदमी, संगीत, प्रकृति, उपद्रव, पृथ्वी, शांति, दिन, रात, रोना, गाना, मौत, जीवन, स्थूल, गतिमान, सूक्ष्म, हवा, पानी, आग, पहाड़, मैदान, नदी, सूखा, बाढ़, बिजली, बादल… सब कुछ तो आपस में सुर लय ताल बद्ध हैं… बूझिए, महसूसिए और हल हो जाइए. मैं तो हो गया हल. यह पाजिटिव है या निगेटिव है आप देखना. मैं अगर हल होकर माइनस में जवाब बनकर आया हूं तो क्या खूब. मैं अगर हल होकर प्लस में बहुत बड़ा हो गया तो क्या खूब. दोनों क्या खूब हैं क्योंकि दोनों की सत्ता हर समय मौजूद है और प्लस माइनस है तो हल होने का फार्मूला है, हल होने को सवाल हैं, सवाल फार्मूला हल बनने के लिए डिजिट हैं..

26 अगस्त को चालीस का होने पर दुनियावी रूप से मुझे यह कहना है कि मैं अब वो नहीं रहा, जो लगातार था. जो लगातार था, वो बिलकुल नहीं है, ऐसा भी नहीं. बस बहुमत अल्पमत का मामला हो गया है. बहुमत में मैं बिलकुल नहीं हूं वैसा जैसा पहले था, रहा हूं. बहुमत में अब क्या हूं मैं? अब जो हूं वह, गणित के हिसाब से सवाल नहीं हूं, जिसमें छोटा सा अल्पमत किस्म का जवाब छिपा है, फार्मूला छिपा है. अब जो हूं वह अल्पमत हूं, वह हल या वह फार्मूला हूं जिसमें खुद के हल या फार्मूला होने का नहीं बल्कि डिजिट होने का बोध है, डिजिट को तोड़ मरोड़ कर कुछ भी बना लो, कुछ भी समझ लोग. डिजिट अपने आप में सिर्फ एक नाम है, पर उसका तोड़ मरोड़ विन्यास जोड़ घटाव नया कुछ सवाल जवाब फार्मूला बना देता है. सो, समझाने समझने के फेर से बचना चाहता हूं. इसलिए कहूंगा कि चालीस का हो जाने पर जो एक नया कुछ बना हूं, उसे इंज्वाय कर रहा हूं, करूंगा. और, इसे आनंद को समझाने, न समझाने की बजाय समझ कर मुस्कराते रहने के स्वाभाविक प्राकृतिक राह पर वाइब्रेट करता रहूंगा.. जय जय..

पहले तो मैं शायर था, आशिक बनाया आपने.. बन गया आशिक… पहले जाने क्या क्या था, पर अब असली चीज बन गया हूं… आशिक बन गया हूं… नाम कई हो सकते हैं… वे सिंबल भर होंगे… उसे आप समझेंगे, मैं तो नामलेवा न रहा… बस, मस्त हो गया हूं… हा हा हा हा… जय हो..

जितना कुछ, कितना कुछ कहना चाहता हूं, उसके लिए शब्दों की सीमा हो गई है.. शब्द से संवाद करने का दौर मेरे लिए खत्म सा है क्योंकि कहीं फंसाव नहीं है, कहीं जताना नहीं है, कहीं बताना नहीं है, कहीं दिखाना नहीं है, इसलिए शब्द में मेरे लिए उत्तेजना और जान नहीं रही. शब्दों का अभाव खल रहा है. शब्दों का अकाल पड़ गया है. शब्द दायरे, सीमाएं, परिभाषाएं, दीवार बनाने लगते हैं, ऐसा लगने लगा है. इन सबसे उपर उठ गया हूं तो शब्द नहीं मिल रहे उस स्थिति को समझाने के लिए. शब्दों के जरिए विराट को स्थूल के रूप में पेश कर दिए जाने का खतरा है. स्थूल रूप में समझ लिए जाने का खतरा है.  ऐसे में अब महसूस किया जा सकता हूं मैं… महसूस करूंगा मैं..

आइए, आप मुझे महसूस करिए और मैं आपको.. जो दूरी है, वह शब्दों के जरिए हल होने वाली नहीं… जो अंतर है, वह समझाने से खत्म होने वाला नहीं… वह यात्रा आपको करनी होगी, शब्दों से परे होने वाली.. फिर कोई तर्क न बचेगा, कोई भाव न बचेगा, कुछ कहने को न रहेगा… सीधा जुड़ाव होगा… हम कनेक्ट हो जाएंगे, आटोमेटिक. हम टैग हो जाएंगे, खुद ब खुद. किसी मशीन, मनुष्य, रोबोट, शब्द, सर्च की जरूरत नहीं पड़ेगी…

सो, मेरे इस कहे को आखिरी मानिए, अंतिम समझिए, कहने बताने समझाने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है अब. मैं पूरी तरह खाली हो गया हूं, मैं पूरी तरह भर चुका हूं… दोनों स्थितियों में प्रोडक्शन संभव नहीं है.. मैं ठप हो गया हूं… मैं मुक्त हो गया हूं… मैं उठ चुका हूं.. मैं जा चुका हूं.. मैं कह चुका हूं.. मैं रो चुका हूं.. मैं हंस चुका हूं… मैं सब कर चुका हूं… कुछ शेष नहीं… शून्य हूं… संपूर्ण हूं… आपमें हूं… कहीं नहीं हूं.. हर कहीं हूं….

आइए, मेरे इस मृत्यु दिवस, मोक्ष दिवस, जन्मदिवस पर हम सब मुक्त होने, मस्त होने की सोचें, कोशिश करें. और, आप ऐसा कर पाएं, इसके लिए मेरी शुभकामना, शुभेच्छा, संवेदना, उर्जा सब कुछ आप तक पहुंचे…. जय जय

यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


चालीस के पहले की कुछ मनःस्थितियां आप इनके सहारे जान सकते हैं…

35 में मरना था, 38 का हो गया, डेडलाइन अब 40 की कर दी

बीत जाये बीत जाये जनम अकारथ

मसूरी में भीख मांगते देखे गए यशवंत

दारू का साथ और जिंदगी के उतार-चढ़ाव

ए सर्किट, पिस्टल-पैसा छोड़, पव्वा ला

भड़ास4मीडिया के चार साल : कुछ दुख सुख आपसे कर लूं साझा

इंदौर यात्रा- जहाज, दारू, दिग्गज और विमर्श

लखनऊ में तेरा मेरा उनका सम्मान

मैं अमर सिंह बनना चाहता हूं

चिनगारी उर्फ उनका मरना हमारा रोना

सेक्स, बाबा, पीएम, वेश्या, मौत, मानव

कायर, बूढ़े, अटके हुए लोग और ओशो का यह भाषण

मैं फिर न सो सका, वो सरेराह जो सोता मिला

दो पुराने लेखों को पढ़ने का सुख

हाईकोर्ट, प्रेस क्लब और जंतर-मंतर : एक रोजनामचा

एक डिप्रेशनधारी तन मन की एक्सरे रिपोर्ट

अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक

चिल्लर पार्टी : पैसा हजम कहानी खतम बोलो लड़कों सीताराम

एक शराबी का अपराधबोध

दुख को स्थायी भाव बना चुके एक शराबी का प्रवचन

इंडिया गेट टू जंतर-मंतर : अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी : कुछ दृश्य

दो दिन, दो आयोजन और मेरी भागदौड़… राजेंद्र यादव से बीएचयू वालों तक

एचटी से मुकदमा लड़ने में आपका साथ चाहिए

आइए 'विदाई' के मर्म को समझें

मुझे अब किसी हीरो की तलाश नहीं, मुझे अब अपने जैसे काहिलों से आस है…

फुटेला जी, आप गरियाना जारी रखें और मैं भीख मांगना…

भड़ास के हर पाठक से यशवंत ने मांगी रंगदारी

आ गया रंगदार

यशवंत जेल यात्रा की एक एक्सक्लूसिव तस्वीर

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