चुनावी राजनीति में बढ़ रहा है कदाचार

16वीं लोकसभा के लिए तीसरे चरण का मतदान आज पूरा हुआ। चुनाव आयोग ने भरपूर कोशिश की है कि 9 चरणों में होने जा रहा चुनाव ठीक से संपन्न हो जाए। आदर्श चुनाव आचार संहिता को भी काफी कड़ाई से लागू करने की कोशिश की गई है। जिन राज्यों में प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ गंभीर शिकायतें मिली हैं, उन्हें बगैर देरी के चुनाव आयोग ने हटा दिया है। दो दिन पहले एक ऐसे ही आदेश पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अड़ियल रुख अपना लिया था। उन्होंने शर्मनाक ढंग से चुनाव आयोग के अधिकारों को चुनौती देने की जुर्रत की थी। लेकिन, चुनाव आयोग ने संविधान प्रदत्त अधिकारों का दम दिखा दिया।

ऐसे में, सत्ता के नशे में चूर ममता को झुकना पड़ा। इस प्रकरण में मुख्य चुनाव आयुक्त खास तौर पर शाबासी के पात्र हैं। क्योंकि, उन्होंने एक मुख्यमंत्री की ‘जिद्द’ के सामने चुनाव आयोग की हैसियत कमजोर नहीं होने दी। लेकिन, मुश्किल यह है कि मुख्य धारा के हमारे राजनीतिक दल भी आदर्श चुनाव संहिता के परखचे उड़ाने की जुगत में ही रहते हैं। टीएन शेषन के जमाने से चुनाव आयोग लगातार कोशिश कर रहा है कि चुनाव में कालेधन का बोलबाला रुके। इसके लिए उम्मीदवारों के खर्च पर निगरानी के लिए तमाम नियम-कानून बनाए गए हैं। इन कानूनी प्रावधानों से एक हद तक कामयाबी शुरुआती दौर में जरूर दिखाई पड़ी थी। लेकिन, जुगाड़ राजनीति ने ऐसे तमाम ‘चोर दरवाजे’ खोज लिए हैं, जिनके जरिए चुनाव आयोग और कानून को झांसा दे दिया जाता है।

उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की सीमा तय है। इसके बावजूद चुनावी राजनीति में काले धन का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। पार्टियां एक-दूसरे पर काले धन के मुद्दे पर आरोप भी लगाती हैं। लेकिन, अपने को पाक साफ बताती हैं। इस चुनाव में भी यही नजारा है। केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने मोदी ब्रांड राजनीति के लिए 10 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इसमें ज्यादा रकम ‘काली’ है। पलटवार में भाजपा ने भी कहा कि कांग्रेस वाले किस मुंह से ऐसा बोल रहे हैं? आखिर, शीशे के घरों में रहने वाले दूसरे पर पत्थर फेंकेंगे, तो ऐसा ही जवाब मिलेगा ना!

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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