विश्व पुस्तक मेले में हुआ ‘आपदा का कफन’ का विमोचन

उत्तराखंड में आई दैवी आपदा से प्रेरित पुस्तक ‘आपदा का कफन’ पीड़ित युवती की संघर्ष गाथा का विमोचन विश्व पुस्तक मेला नई दिल्ली में हुआ है। पत्रकार धीरेंद्र नाथ पांडेय द्वारा लिखित इस पुस्तक का विमोचन साहित्यकार राजकिशोर ने किया। आपदा से जैसे मुद्दे पर अधारित उपन्यास लिखने का साहस  है। इस तरह का ट्रेंड भारत में नहीं है। लेकिन विदेशों में है। अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हुए हमले पर न जाने कितनी किताबें विदेशों में लिखी गई लेकिन भारत-पाक विभाजन या फिर चीन या पाक युद्ध पर चंद किताबें ही लिखी गई। उस पर भी उपन्यास तो अंगुलियों पर गिनने लायक ही है। इसलिए इस किताब से लेखक के साहस का परिचय मिलता है। लेखक धीरेंद्र नाथ पांडेय मूल रूप से पत्रकार है इसलिए उनसे इस तरह की उम्मीद की जा सकती है।

 
समीक्षा करते हुए मुझे लगा कि आपदा पर आधारित ‘आपदा का कफन’ पुस्त की कई विशेषताएं हैं साथ ही इसमें कई कमियां भी हैं। पहले इस पुस्तक की विशेषताओं पर चरचा करते हैं। पुस्तक दर्शनीय है। जाहिर है जो दर्शनीय होगा उसे एक बार पढ़ने की इच्छा तो होगी ही। वैसे बता दूं कि यह पठनीय भी है। ज्योति पब्लिर्सस और डिस्टब्यूटर्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 165 रुपया है। कीमत से लगता है कि यह पुस्तक आम पाठक के लिए लिखी गई है। क्योंकि आज-कल ऐसी पुस्तकों की कीमत 300 से 400 रुपये तक होती है। जो सिर्फ सरकारी खरीद के लिए ही लिखी जाती हैं।

अब आते हैं कवर पेज पर। इसका कवर पेज आपदा को सही रूप में परिभाषित करता है। आपदा ग्रस्त केदारनाथ मंदिर की तस्वीर स्केच रूप में है। मंदिर के आसपास पड़े पत्थरों से लगता है कि जब आपदा आई होगी तो कितनी भयानक होगी। टाइटल लिखने क अंदाज भी शानदार है। कवर पेज जैकेट नुमा है। कवर पेज के बैक में पुस्तक की थीम है- यह जिंदगी की अग्नि परीक्षा ही तो है कि जिस बेटी के तन को ढंकने के लिए बाप ने मौत से अपनी जिंदगी का सौदा किया आज वही बेटी बाप के कफन के लिए अपने तन का सौदा कर रही है। यह थीम बहुत ही मार्मिक है और पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। जैकेट के पिछले पेज पर केदारघाटी की भौगोलिक स्थिति है साथ ही दैवी आपदा से संबंधित संक्षिप्त जानकारी दी गई है। इसकी प्रस्तुति भी शानदार है। कुल मिलाकर कवर जैकेट दर्शनीय और पठनीय है।

अब आते हैं अंदर के पेज पर। अंदर के पेज पर टाइटल एक नए लुक में नजर आता है। वहीं अगले पेज पर शिव की मूर्ति की जल में डूबते हुए एक फोटो प्रकाशित की गई है। फोटो अति सुंदर है साथ इस फोटो से लगता है कि इंसान ही नहीं भगवान भी इस आपदा से नहीं बच पाए। प्रस्तुतिकरण बढ़िया है। इस पुस्तक को अग्रसारित करने वाले भी एक पत्रकार हैं नाम है शेषमणि शुक्ल। शुक्ल जी दैवी आपदा के समय केदारघाटी का दौरा किया था। निश्चित रूप से उनके विचार भी किताब की सत्यता को प्रमाणित करते हैं। वहीं प्राक्कथन में लेखक ने बड़ी सहजता से स्वीकर किया है कि यह एक काल्पिनिक किताब है, लेकिन इसमें सच्चाई ज्यादा दिखती है। क्योंकि जिन हादसों का जिक्र लेखक कर रहे हैं उसके इर्दगिर्द ही कहानी गढ़ी गई है।

लेखक का कहना है कि इस पुस्तक में हिंदुस्तान पाकिस्तान बंटवारे और मुज्जफरनगर दंगे का दर्द महसूस किया जा सकता है। लेखक का यह दावा सही प्रतित हो रहा है। जिस तरह मुज्जफरनगर दंगे के शिविर में रहने वाले लोगों के साथ जो कुछ घटा उसका एक अंश पुस्तक में नजर आ रहा है। एक बात और लेखक ने कई लोगों को धन्यवाद किया है कुछ को नाम से तो कुछ को बिना नाम लिए। आज कल लेखों में इस तरह की सहृदयता कम ही नजर आती है। अब आते हैं कहानी पर। पुस्तक की कहानी आपदा के दौरान के उस दर्द को उजागर करती है जो खबरों में नहीं झलकी। लेखक ने उन सच्चाइयों को उजागर करने की कोशिश की है जो अखबारों और न्यूज चैनल तक पहुंचते पहुंचते दम तोड़ देती हैं। यह एक ऐसे परिवार की कहानी है जो आपदा से पहले लखपति था लेकिन उसके बाद सड़क पर आ जाता है। बेटा खत्म हो जाता है धंधा चौपट हो जाता है और पूरा परिवार सरकारी मेहरबानियां पर शिविर में पहुंच जाती है। जहां सिर्फ दो वक्त दाल रोटी मिलती है। लेखक ने यहां यह दर्शाने की कोशिश की है कि किस तरह सरकारी कर्मचारी और अधिकारी आपदा के समय में भी सरकारी धन का दुरुपयोग कर खुद ऐश करते हैं वहीं पीड़ित दाने-दाने को मोहताज होते हैं।

भ्रष्ट हो चुके सरकारी तंत्र के बारे में लेखक जो संदेश देना चाह रहा है उसे देने में वह काफी हद तक सफल रहा है। किताब मार्मिक है। भावनाओं और संवेदनाओं को मिलकार जो पटकथा लेखक ने लिखी है वह दिल को झकझोर रहा है। कहानी कहीं से भी टूटती नजर नहीं आती है। एक बेबस बाप की लचारी और लोक लाज के डर के साथ ही उसका संघर्ष वहीं एक अबला बेटी को परिवार के प्रति समर्पण भाव और उसका बलिदान इस पुस्तक की जान है। धन के पीछे भागने वालों के लिए भी इस पुस्तक में एक संदेश है।  

अब आते हैं इसकी कमियों पर। इस पुस्तक में कई जगह पत्रकारिता का झोल भी नजर आता है। मसलन सरकारी कर्मचरियों की ओर से की गई बदसलुकियों की व्याख्या कुछ अधिक है। अक्सर ऐसा होता नहीं है। वहीं अंध विश्वास को दर्शता एक ताबीज। ताबीज बेचने के बाद बाप की मौत होने से अंधविश्वास को बढ़वा मिलता है जो एक नाकारात्मक पक्ष है। वैसे कुल मिलकार यह पुस्तक पठनीय है।

प्रस्तुति

डा. जितेंद्र सिन्हा
एचओडी, मास कम्यूनिकेशन,
साईं कॉलेज, देहरादून। 

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