हार के डर से चुनाव लड़ने से बच रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता

सत्तारूढ़ जगठबंधन यूपीए का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस इन दिनों कुछ-कुछ मायूसी के दौर से गुजर रही है। बकि, टिकट बंटवारे के दौर में कांग्रेस के मुख्यालय में टिकटार्थियों का मेला लगा रहता था। लेकिन, इस बार इस मेले में पहले जैसी रौनक नहीं देखी जा रही। इतना ही नहीं कई प्रदेशों के चर्चित नेता भी चुनावी रुख देखकर सुरक्षित संसदीय क्षेत्र ढूंढ़ने लगे हैं। कुछ ने तो चुनाव न लड़ने के लिए तरह-तरह की बहानेबाजी शुरू कर दी है। ये हालात उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक बन रहे हैं। इसकी खास वजह यही मानी जा रही है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का चुनावी अभियान काफी जोर पकड़ चुका है। जिन क्षेत्रों में संघ परिवार का कोई जनाधार नहीं समझा जाता, वहां भी मोदी की रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है। जबकि, कांग्रेस के चुनावी चेहरे राहुल गांधी की चुनावी सभाओं में तमाम कोशिशों के बावजूद ज्यादा गहमा-गहमी नहीं हो पा रही है।

 
भाजपा
के आक्रामक चुनावी अभियान के चलते कांग्रेस के कार्यकर्ता भारी दबाव में देखे जा रहे हैं। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि आम जनता में केंद्र सरकार की रीतियों-नीतियों को लेकर भारी नाराजगी है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी में महंगाई लगातार बढ़ी है। इससे आम आदमी का जीवन काफी कठिन हुआ है। महंगाई को लेकर सरकार ने जो दलीलें दी हैं, वे लोगों के गले नहीं उतर रहीं। मनमोहन सरकार के कार्यकाल में घोटालों-महाघोटालों का सिलसिला चलता आया है। राजनीतिक संदेश यही गया है कि सरकार के लोग घोटालों के जरिए लूटपाट में लगे रहे। इसी के चलते आज आम आदमी को किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा के लोग सरकार के खिलाफ महंगाई और घोटालों को लेकर सालों से आक्रामक अभियान में जुटे रहे हैं। इन मुद्दों पर सरकार की सफाई काफी लचर रही है। इसका खामियाजा अब कांग्रेस नेतृत्व को इस चुनावी मौके पर उठाना पड़ रहा है। अपनी रैलियों में नरेंद्र मोदी जगह-जगह प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर सीधे निशाने साध रहे हैं। राहुल को पार्टी ने भले औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाया हो, लेकिन अनौपचारिक तौर पर कह दिया गया है कि पार्टी को बहुमत मिला, तो पीएम चेहरे वही होंगे। वैसे भी, मनमोहन सिंह बहुत पहले इस रेस से खुद को अलग कर चुके हैं। लेकिन, पार्टी के रणनीतिकार नहीं चाहते कि लोकसभा का चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी बन जाए। क्योंकि, ऐसा होने से भाजपा को इसका फायदा मिलेगा।
 
कांग्रेस ने भले यह कोशिश की है कि चुनाव का फोकस राहुल बनाम मोदी न बने, लेकिन जिस तरह से भाजपा ने मोदी को अपना ‘चुनावी ब्रांड’ बना दिया है, ऐसे में चाहे अनचाहे स्थिति मोदी बनाम राहुल गांधी की ही बन गई है। मोदी 2001 से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। उनका राजनीतिक प्रशिक्षण संघ की गोद में हुआ है। ऐसे में, वे जमीनी राजनीति के तमाम हुनर जानते हैं। कुशल वक्ता हैं। राजनीतिक हल्कों में मोदी को चुनावी मार्केटिंग का माहिर माना जाता है। अपनी इस उस्तादी के दांव भी वे इन दिनों जमकर दिखा रहे हैं। चुनावी कार्यक्रम घोषित होने के पहले ही मोदी ने पूरे देश में रैलियां शुरू करने का सिलसिला तेज किया था। इसका नतीजा यह है कि कांग्रेस के संभलने के पहले ही मोदी ने शुरुआती राउंड में बढ़त दर्ज कर ली है। इधर, मीडिया सर्वेक्षणों में लगातार यह बताया जा रहा है कि मोदी मुहिम के मुकाबले राहुल की चुनावी मुहिम काफी फिसड्डी है। प्रमुख मीडिया संस्थानों के सर्वेक्षणों में तो यहां तक कहा गया है कि संभव है कि इस बार कांग्रेस 100 का आंकड़ा भी न पूरा कर पाए। जबकि, भाजपा के बारे में कयास लग रहे हैं कि यह पार्टी अपने बलबूते पर ही 200 का आंकड़ा पार कर सकती है।
 
निजी बातचीत में कांग्रेस के दिग्गज नेता भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि मोदी की मुहिम कांग्रेस पर काफी भारी पड़ रही है। हवा का रुख देखकर पार्टी के कई दिग्गज नेता भी चुनाव लड़ने से बचने लगे हैं। तमिलनाडु की राजनीति में पार्टी की हालत काफी खराब हो गई है। केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम दिग्गज नेता हैं। वे शिवगंगा संसदीय क्षेत्र से पिछला चुनाव जीते थे। लेकिन, इस बार वे पार्टी के हालत देखकर चुनाव लड़ने से ही बच रहे हैं। उन्होंने बुधवार को चेन्नई में कह दिया है कि इस बार वे चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। क्योंकि, चाहते हैं कि पूरे देश में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार में जुटें। चिदंबरम के पहले ही केंद्रीय मंत्री जी. के वासन यह इच्छा जता चुके हैं कि वे इस बार चुनाव नहीं लड़ना चाहते। तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं थंगाबालु। 2011 में विधानसभा के चुनाव में हुई करारी हार के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद की कुर्सी छोड़ दी थी। क्योंकि, पार्टी महज पांच सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी।
 
थंगाबालू ने कांग्रेस आलाकमान को संदेश भेज दिया है कि इस बार वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। उन्होंने इसकी जानकारी संगठन प्रभारी गुलाम नबी आजाद और मुकुल वासनिक को दे दी है। थंगाबालू, सलेम संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते आए हैं। श्रीप्रेम्बदूर संसदीय क्षेत्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन का चुनाव लड़ना तय था। लेकिन, उन्होंने भी संदेश भिजवा दिया है कि इस बार चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने जिस तरह से चुनाव के पहले ही ‘हथियार’ डाल दिए हैं, उससे पूरे राज्य में मायूसी फैली है। इसकी एक वजह यह भी है कि इस बार पार्टी का चुनावी गठबंधन द्रमुक से नहीं हो पाया है। यहां पर पार्टी द्रमुक या अन्नाद्रमुक के सहारे ही चुनावी नैया ठीक से पार कर पाती है। लेकिन, इस बार द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों का रुख नरेंद्र मोदी के प्रति काफी नरम हो गया है। भाजपा की राजनीति के खिलाफ अलाप लगाने वाले खांटी सेक्यूलर नेता एम. करुणानिधि भी अब मोदी का गुणगान करने लगे हैं।
 
बात केवल तमिलनाडु की ही नहीं है। दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं मिल रहे। रक्षा मंत्री एके एंटनी भी चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। हालांकि, उन्होंने इसकी वजह यही बताई है कि पार्टी का निर्देश मिलेगा, तो वे पूरे प्रदेश में चुनाव अभियान मजबूत करने के लिए जुटना चाहते हैं। टीम राहुल के सदस्य सचिन पायलट भी राजस्थान की अपनी अजमेर सीट से चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा जता रहे हैं। उन्हें हाल में ही राहुल गांधी की पहल पर प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दिसंबर में यहां विधानसभा चुनाव हुए थे। इसमें पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा यहां तीन-चौथाई बहुमत से सरकार में आई है। कांग्रेस यहां उस चुनावी झटके से अभी तक उबर नहीं पाई है। सचिन पायलट के रुख को इस मायूसी का संकेत ही माना जा रहा है। पंजाब के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी अपनी यह इच्छा जता चुके हैं कि वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहते।
 
यहां
तक कि केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री मनीष तिवारी के बारे में यह चर्चा चली कि वे भी इस बार लुधियाना संसदीय क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ना चाहते। वे कवायद करते रहे हैं कि पवन बंसल की जगह चंडीगढ़ से टिकट मिल जाए। लेकिन, तमाम अटकलों के बावजूद पार्टी नेतृत्व ने पूर्व रेलमंत्री पवन बंसल का टिकट नहीं काटा। जबकि, वे घूसकांड के चर्चित विवाद में फंसे रहे हैं। इस तरह से मनीष तिवारी की मुराद पूरी नहीं हो पाई। यह अलग बात है कि मीडिया में आई खबरों को लेकर तिवारी ने काफी नाराजगी जाहिर की है। कहा है कि वे पिछले तीन दशकों से कांग्रेस की राजनीति से जुड़े हैं। ऐसे में, वे मैदान छोड़कर भागने वालों में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेसी दिग्गज भी चुनाव लड़ने से बचने की कोशिशें करते रहे हैं। पिछले चुनाव में राज्य से कांग्रेस को काफी बड़ी सफलता मिली थी। यहां से 21 सीटें पार्टी ने झटक ली थीं। लेकिन, इस बार हालात बदले नजर आ रहे हैं। आशंका की जा रही है कि पार्टी शायद 10 का आंकड़ा भी पूरा न कर पाए। यह अलग बात है कि इसी प्रदेश से सोनिया गांधी और राहुल गांधी चुनाव मैदान में उतरते हैं। इस बार तो राहुल गांधी की चुनावी चुनौती आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुमार विश्वास ने भी खासी बढ़ा दी है। वे काफी दिनों से घर-घर जाकर राहुल के खिलाफ चुनावी बिगुल बजाने में लगे हैं।
 
इस चुनौती को देखकर राहुल गांधी को भी अमेठी में ज्यादा समय देना पड़ रहा है। कांग्रेस ने 71 उम्मीदवारों की दूसरी सूची कल देर शाम जारी कर दी। मेरठ से फिल्म अभिनेत्री नगमा को टिकट दे दिया गया है। कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व इस फैसले को लेकर अपना मत्था पीटने लगा है। क्योंकि, इस इलाके से एक ‘ग्लैमर गर्ल’ को उतार कर पार्टी ने स्थानीय खांटी कार्यकर्ताओं को मायूस ही किया है। बॉलीवुड के अभिनेता रहे राज बब्बर को फिरोजाबाद की जगह इस बार गाजियाबाद से टिकट दे दिया गया है। जबकि, इस सीट के लिए वे एकदम ‘बाहरी’ हैं। कांग्रेस के मुकाबले भाजपा नेतृत्व को टिकटों के मामले में ज्यादा माथापच्ची करनी पड़ रही है। क्योंकि, इस बार भाजपा के लोगों को उम्मीद बंधी है कि पार्टी का टिकट मिलने से जीत की एक हद तक गारंटी वाली स्थिति है। जबकि, कांग्रेस के खेमे में उदासी सा माहौल है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी की रैलियों से भी इस बार कांग्रेसियों को ज्यादा चुनावी ‘ऑक्सीजन’ मिलती नहीं नजर आ रही है। ऐसे में, कांग्रेस का सियासी माहौल काफी बेचैनी वाला हो चला है।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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