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जागरण के पास वेज बोर्ड देने को पैसा नहीं, फिर नए एडिशन कैसे खुल रहे हैं?

आईएनएस के जरिये जागरण का रोना-गाना पढ़ा। आज ये जितना रो रहे हैं, यदि मजीठिआ के नोटिफिकेशन को मान लिए होते, तो उस वक़्त एम्प्लोयी और यूनियन, दोनों से समझौता कर काफी कुछ बचा लेते। लेकिन उस वक़्त आपका समय था, दम्भी बने गर्व से सीना ऊंचा किये वर्कर्स को साफ़ कह दिए कि "मामला सुप्रीम कोर्ट में है, सुप्रीम कोर्ट जो कहेगा, वह मान लेंगे और निर्णय आने के बाद ही देंगे।" आपको उस वक़्त ये अंदाज़ा ही नहीं था कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट इतनी जल्दी सुनवाई पूरी कर लेगी। अब आपकी फटी पड़ी है।

आईएनएस के जरिये जागरण का रोना-गाना पढ़ा। आज ये जितना रो रहे हैं, यदि मजीठिआ के नोटिफिकेशन को मान लिए होते, तो उस वक़्त एम्प्लोयी और यूनियन, दोनों से समझौता कर काफी कुछ बचा लेते। लेकिन उस वक़्त आपका समय था, दम्भी बने गर्व से सीना ऊंचा किये वर्कर्स को साफ़ कह दिए कि "मामला सुप्रीम कोर्ट में है, सुप्रीम कोर्ट जो कहेगा, वह मान लेंगे और निर्णय आने के बाद ही देंगे।" आपको उस वक़्त ये अंदाज़ा ही नहीं था कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट इतनी जल्दी सुनवाई पूरी कर लेगी। अब आपकी फटी पड़ी है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है तो बेचारे वर्कर्स को उनका हक़ दे-देने में ही आपकी भलाई है, वर्ना कोर्ट के निर्णय के लास्ट पैराग्राफ के अनुसार आप पर कंटेंम्प्ट ऑफ कोर्ट का मामला बनेगा। वैसे भी आपको ज्यादा चिंतित होने कि आवश्यकता नहीं, क्योंकि आपके यहाँ वेज बोर्ड में हैं ही कितने प्रतिशत लोग? और जो बेचारे हैं भी, उनका आपने क्या हश्र कर रखा है, ये उन्हीं के दिल से पूछें। बाकि अख़बारों को छोड़ दें, उनके यहाँ उनके वर्कर्स आपके(जागरण) वर्कर्स से काफी हद तक खुश हैं। जब कमाई नहीं हो रही है तो हर साल-दो-साल पर आप न्यू एडिशन कैसे खोल रहे हैं? ये कहाँ का न्याय है, कि मालिक दिन-दो-गुना और रात-चौगुना होता जाए और वर्कर की स्थिति बद से बदतर होती जाए? अब आपको सुप्रीम कोर्ट, भारत सरकार और उन् तमाम वर्कर्स कि भावनाओं को समझते हुए वेज बोर्ड दे-देनी चाहिए…

 

मनोज राही। संपर्कः [email protected]

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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