चुनावों में वोट ज़रूर दीजिए, पर अपना ‘मत’ दान न कीजिए

यह आलेख केवल और केवल भारत के वोटरों और चुनाव आयोग के लिए है। राजनीतिक दलों के लिए बेमानी है। शीर्षक को पढ़ कर चौंकिए नहीं ,क्या वजह है कि मतदान को "दान" ही रखा जाए? आप आज़ाद देश में अभी तक इस बात के लिए स्वतन्त्र हैं की वोट डालें या नहीं। औपचारिक रूप से आपसे वोट की अपील करना एक मजबूरी है, क्यों? कभी सोचा? आज यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब देश की दिशा बदल देगा। भारत में सिर्फ वोट देना, यहाँ के नागरिकों की इच्छा पर है। मगर वोट देना सबसे बड़ा दान है। इस दान के अलावा भारत के नागरिकों को, दान से बनी सरकार और संसद की हर उस बात को सर झुका कर मान लेना है जो वहां से सिर्फ आपके लिए अनिवार्य बनकर निकलती है। सरकार बनाने की लिए मत (वोट) को दान कहना और समझाना ही सबसे बड़ा धोखा है। अब वोट दान नहीं है। दान है तो दान देकर भूल जाना किसी भी दान की पहली शर्त है। दान लेने के लिए कोई प्रपंच नहीं किया जाता। अरबों- खरबों का खर्च नहीं किया जाता। आत्मनिर्भर देश में लोकतंत्रा आज भी एक-एक वोट के लिए वैसे ही गड़गिड़ा रहा है जैसे आम आदमी अपने अधिकारों और आय के लिए। वोट के अलावा देश के लिए कुछ और दान नहीं किया जाता। यह दान भी तब करना है जब संवैधानिक सरकार शक्तिहीन है। वाह!

दान के बारे में यहाँ तक कहा जाता है दूसरे हाथ को पता न लगे, और दान वही है जो स्वेच्छा से दिया जाए। दान किसे दिया जाए इस पर कुछ लोग या उनका समूह बहस नहीं करते कि दान उनमें से किसे या उन्हें ही दिया जाए। आजादी के बाद जब देश में सरकार बनाई जानी थी तब साधन संसाधन नहीं थे। देश को खड़ा करने की आपाधापी थी। देश संपन्न नहीं था। तब यह कहा गया कि मतदान करें और देश को सरकार दें। जो देश को चलयेगी। मगर अब भारत एक आत्मनिर्भर ही नहीं दुनिया के बहुत सारे कमजोर मुल्कों की मदद करने वाला देश है। ऐसा देश जो आने वाले समय में दुनिया में पहली पंक्ति में शुमार होगा। ऐसे में आज यह सवाल मौजूं है कि क्या अब भी इस देश में सरकारें दान से बनेंगी? वह भी तब इस दान को लेने के लिए सैकड़ों अरब रूपया पानी की तरह बहाया जा रहा है?
 
आपके
वोट का दान लेने वाले क्या-क्या करेंगे, कर चुके हैं और कैसे-कैसे हैं, शायद इस बारे में यहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। दान की पात्रता तो दान देने वाले को तय करनी होती है, मगर वोट के मामले में हम सिर्फ और सिर्फ अपने हित देखते हैं, वह भी वो, जो हमें काल्पनिक रूप से दिखाये जा रहे हैं, उनसे  सिर्फ उम्मीदें ही हैं। ऐसे में अब सही वक्त है कि यह फिर से सोचा जाए कि वोट देकर सरकार का चुनाव किया जाए या मतदान करके भूल जाएँ। फिर उसी को कोसें जिसको दान दिया है, यह भी एक बड़ा पाप ही है कि जिनको दान दें उनको ही गालियाँ दें। पछताएँ, जब वो घोटालें करें, या हमारी आपकी रोजी-रोटी और चूल्हे पर हमला करें। अपनी पगार बिना बहस के तय करें और आप कितनी रोटी खायेंगे, कितनी बनायेंगे यह भी वो तय करें। आप कितनी आमदनी से अपना घर चलायें और वो कितनी भी आमदनी करें, उसे जनहित के लिए जरुरी माना जाये। और आपको अपनी आमदनी का हिस्सा देश के लिए दान नहीं करना है उसको क़र्ज़ के रूप में चुकाना है। मगर आपके हर कर्तव्य को क़ानून से बांध देना, जबकि कानून बनाने की शक्ति आपके दान से ही मिली है, यह कहाँ तक न्याय सांगत है?

आज वक्त बदल गया है। वोट जरुर दें, मगर अपना मत दान न करें। इस दान ने ही सारी गड़बड़ियों को जन्म दिया है। सोंचिये! अगर आपने किसी को कुछ भी दान किया और उस दान का दुरूपयोग हुआ है, जो हर तरह से साफ़ हो गया और जांच परख लिया गया, तो क्या फिर आप कुछ समय के और कुछ वास्तु या किसी और लालच, छलावे में आकर फिर उसी को वही दान देंगे जो आपके भरोसे को बेच गया। नहीं न। और यह सीधे तौर पर जरुरी नहीं है, आपकी इच्छा पर है। आपने नहीं किया दान तो कोई बात नहीं, जिस देश में लोकतंत्र गर्व का विषय है मगर इसकी रक्षा और सम्मान और स्वाभिमान नागरिकों के लिए अनिवार्य नहीं है और इसकी जरुरत भी आज तक महसूस नहीं की गयी, यही नहीं विचार धाराओं के टकराव के बावजूद कभी इस ओर सोंचा भी नहीं गया तो क्या यह एक मिला-जुला छल नहीं है?
 
लोकतंत्र में सरकार द्वारा क्या हर उस मुद्दे पर जनमत संग्रह होना चाहिए जहां देश के नागरिकों का सीधे तौर से तालुक है। संविधान ने संसद को अधिकार यह मान कर दिया है कि उसमे बैठे जनता के प्रतिनिधि धर्म भाव से उनके लिए सोचेंगे, जिनके दान से वो कम से कम दो लाख रूपए महीने की पगार वाले ऐसे वीआईपी बने हैं और इस हैसियत में आये हैं। वह सब नहीं करेंगे जो दान की अवधारणा के खिलाफ है। आज जब वोट लेने के लिए अकल्पनीय तरीके और अकूत धन खर्च किया जा रहा है तो वोट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। 67 साल में हमारे प्रतिनधि इस देश के नागरिकों को देश के ऋण से मुक्त नहीं कर पाए, मगर खुद अपनी पीढ़ियों के साथ अपनी तमाम समस्याओं से मुक्त हो गए। किसी ने भी नहीं सोंचा कि सरकार बनाने वाली जनता को यह समझने और उस पर गर्व करने का मौक़ा भी दिया जाये। और उसका सिर्फ एक ही तरीका है, देश में किसी भी मतदान को उतना ही जरुरी बना दिया जाये जितना कि आमदनी पर कर देना और जन्म से लेकार मृत्यु तक प्रमाण पत्र। ज़िंदा इंसान के लिए ज़िंदा होने का भी प्रमाण पत्र। ख़ुफ़िया, सुर,क्षा घोटाले, शिक्षा, मछली पालने से लेकर जहां चिड़िया घर तक का अलग से विभाग है उस देश में क्या इस बात का हिसाब नहीं रखा जा सकता कि सरकार बनाने के लिए किस-किस ने वोट दिया, और नहीं दिया तो क्यों? अगर कोई वोट नहीं डालता है, तब भी थोड़े से ही मतों से सरकार बन जाती है! क्या मज़ाक है? अभी तक वोट के लिए कोई कानून नहीं है। जो है वह यह कि वोट डालने के दौरान शांति रहे। आखिर दान देने वाला भी कभी लड़ाई-झगडा और खून-खराबा करेगा? या दान को हथियाने वाला ही यह सब करेगा?
 
देश
के प्रत्येक  नागरिक के लिए वोट डालने की अनिवार्यता तो उसी समय से हो जानी चाहिए जबसे यह संकल्प लिया गया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश रहेगा। अनिवार्य मतदान के बिना स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना कैसे की जा सकती है? जिस देश में बच्चे के पैदा होते ही उसका जन्म और किसी के मरते ही उसकी मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य हो। वहाँ मतदान का गैर जरुरी होना एक ऎसी सोची समझी साजिश लगती है, जिसके लिए प्रथक विचारधारा का भी भेद नहीं है। आखिर क्या वजह है कि जब चुनाव प्रचार के लिए सभी उम्मीदवारों को 40 दिन का समय मिलता है और वोट डालने के लिए सिर्फ एक दिन? यह कैसे संभव है कि सवा अरब की आबादी वाले देश के करीब 70-80 करोड़ से ज्यादा मतदाता एक ही दिन में वोट दाल दें? आखिर दलों और प्रत्याशियों को चालीस दिन और मतदाता को 40 घंटे भी नहीं?

ऐसा तो नहीं है कि हर बात पर नुक्ताचीनी करने वाले इस बात को नहीं जानते हैं और उन्होंने  कभी सोचा नहीं है? हाँ, यह जरुर हो सकता है कि कोई भी इस बारे में ना सोंचे, ऐसा जरुर सबकी मिलिभागत से तय हो सकता है, यही वजह है इस दिशा में आज तक कोई कुछ बोला ही नहीं। संसद में बहुमत साबित करने के लिए जब पचास फीसदी समर्थन जरुरी है तब जनता का प्रतिनिधि चुने जाने के लिए यह अनिवार्यता क्यों नहीं? हाँ, यह व्ययवस्था जरुर है की अगर कहीं 90 प्रतिशात वोट पद गए तो दोबारा वोट डलवाने की प्रक्रिया हो सकती है।

अब जब भारत के निर्माण और पुनर्निर्माण की बात हो रही है तब यह सवाल भी इससे पहले होना चाहिए की इस देश के नागरिकों की उसके निर्माण और चलाने में क्या हैसियत है। सोचने वाली बात है कि आज हम विदेशों से हर मामले में तकनीक और तौर तरीके ले रहे हैं। हमारे अफसर और नेता-मंत्री रोजाना विदेश में कुछ नया सीखने और करने ही जाते हैं। मगर हमने आज तक अपने देश की चुनाव प्रणाली को अत्याधुनिक और अनिवार्य बनाने की नहीं सोची। सत्ता और विपक्ष में से किसी ने नहीं सोचा, आखिर इस सोंच में फायदा तो किसी का नहीं है। संविधान के मुताबिक लोकसभा भंग होते ही और चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही सारी व्यवस्थाएं केंद्रीय चुनाव आयोग के आधीन हो जाती हैं, आयोग ही सारी व्यवस्थाएं तय करता है। उसमें सरकार का द्खल नहीं होता है। अब आयोग की जिम्मेदारी है कि वह सोंचे।
 
1– क्या प्रचार का समय कम करके, या न भी किया जाए तो मतदान का समय न्यूनतम एक सप्ताह नहीं किया जा सकता? इससे हर नागरिक को अपनी सुविधा से वोट डालने का उपयुक्त अवसर मिलेगा। मतदान का प्रतिशत बढेगा।
2– एक ऐसी  व्यवस्था भी कायम की जा सकती है जिसके जरिये किसी के भी मतदान न करने का कारण पूछा जा सकता है। बिना किसी कारण के मतदान न करने का मतलब यह नहीं हो सकता की एक व्त्यक्ति का इस देश की व्यवस्था में यकीन ही नहीं है। आखिर राईट-टू-रिजेक्ट इसके अलावा और क्या है? यह व्यवस्था या तो चुनाव आयोग के हवाले की जाए या फिर इसके लिए अलग से एक तंत्र का गठन किया जाना चाहिए। यह आज जन लोकपाल कानून से भी बड़ी आवश्यकता है। हाल में जोड़ा गया राईट-टू-रिजेक्ट से कुछ नहीं होना, जरूरत है की पचास प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाले को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर दिया जाये उसमे यह देख लिया जाये कि किसको ज्यादा वोट मिले हैं।
3– देश में बैंकिंग को घर-घर तक ले जाने के लिए आज मोबाइल एटीएम की व्यवस्था है। आखिर मोबाइल वोटिंग मशीन की  व्यवस्था चुनाव में नहीं की जा सकती? यह मशीन घर या मोहल्लों में जाकर एक-एक नागरिक का वोट ले सकती हैं। युआईडी वाली तकनीक से दोहरे वोट का भी ख़तरा नहीं रहेगा।
4– कम से कम एक सप्ताह का समय भी मतदान के लिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकेगा। एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत मतदान का अभियान चलाया जाये, जैसे की यूआईडी और जरुरी बातों के लिए होता आया है। और न्युनतम एक माह तक लोगों को वोट डालने का अवसर दिया जाए, आखिर सरकार पांच साल के लिए बन रही है, और वह भी देश के लिए। और भी काफी बातें हैं, जो चुनाव की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए जरुरी हैं।
 
फिलहाल आम चुनाव के मुहाने पर खड़े देश में चुनाव की घोषणा होने से पहले ही जहां दो साल से सभी दल और उम्मीदवार चुनाव की तयारी में लगें हैं। अमेरिका और जापान के लोग भारत में चुनाव प्रचार के ठेके लिए हुए हैं, चुनाव का संचालन लगभग कार्पोरेट सिस्टम में चलने लगा है, जहां आदमी को आदमी की शक्ल तभी दिखाई देगी जब "ऊपर" वाला चाहेगा। अब पार्टियों के लिए काम करने वाले उनके कार्यकर्ता बेमानी होते जा रहे हैं, सारा का सारा काम वेतनभोगी लोग कर रहे हैं जिन्हें एक पहले से तय व्यवस्था के तहत अपनी जगह बनानी है। यहाँ तक कि उम्मीदवार का चयन भी अब जन स्वीकारोक्ति पर नहीं खुफिया तौर से निगहबानी करके किया जाने लगा है, तब तो यह और भी जरुरी हो जता है कि हमारी मतदान की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमे आखिरी आदमी की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके और इसके लिए भी आज के दौर में मुकम्मल इंतज़ाम करना केवल मौजूदा शासन और केंद्रीय चुनाव आयोग को अपनी इच्छाशक्ति का ही प्रदर्शन करना है। साधन संसाधन कि कमी नहीं है।

जी हाँ, आने वाल समय वह है जिसमे नौकरी की भरती की ही तरह उन लोगों का भी चुनाव होना है जो राजनीति में आने वाले हैं, हालत के यही संकेत हैं जिसमे नेतृत्व उभरेगा नहीं, भरती होगा।

 

लेखक आशीष अग्रवाल बरेली के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनसे संपर्क ईमेल asheesh_agr64@yahoo.co.in पर किया जा सकता है।

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