FB Yash (5) : स्वामी भड़ासानंद के फेसबुकी प्रवचन

Yashwant Singh : अगर आपको फेसबुक पर सच्चे साथी की तलाश हो तो बस इतना कीजै कि एक दिन संघियों उर्फ हाफपैंटियों, एक दिन कम्युनिस्टों उर्फ लालझंडा वालों, एक दिन इस्लामिक कट्टरपंथियों और एक दिन कट्टर हिंदूवादियों के खिलाफ टाइट वाला स्टेटस डाल दीजिए… जो जो विरोध करे, उन्हें ब्लाक करिए… बाकी जो बच जाएं, उनमें से परम मूर्ख और परम ज्ञानी की तलाश आसानी से कर लेंगे 🙂

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Yashwant Singh : विचार शून्य हो जाना सबसे बड़ी उपलब्धि है पर इसका रास्ता विचारधाराओं को जानने समझने और फिर उनसे उपर उठने से होकर जाता है.. शब्दों के तह तक पहुंच कर शब्दों से परे हो जाना बहुत बड़ा काम होता है… इस प्रक्रिया को वही समझ सकता है जो सच्चा साधक हो, खुले दिल दिमाग वाला हो, दिल-दिमाग और मजबूरियों से आजाद हो और अतिशय संवेदनशील हो… एक अन्य तरह की विचार शून्यता भी है जो किसी भी विचारधारा को जानने की जगह एक ही विचार धारा को या सामाजिक-परिवेशगत पनपी धारणाओं को कट्टर तरीके से कसकर पकड़ के उसके लिए जीने मरने मारने की बात करे और बाकियों को विरोधी माने… फिलहाल जो स्थिति है उसमें कट्टरपन हावी है… डेमोक्रेटिक होना और रेशनल होना, ये पहली सीढ़ी है विचारवान बनने की ओर बढ़ने का.. उसके बाद ग्लोबल यूनिवर्सल नजरिया डेवलप करते हुए सूक्ष्मतम से लेकर दीर्घतम तक को अपने हिसाब से एनालाइज करना और साइंस व स्प्रिचुवल्टी के अब तक खोजों के प्रकाश में देखते हुए आगे राह तलाशना बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है… इस राह पर चल चुके ज्यादातर लोग मौन को प्रीफर करते हैं, बंद आंखों से दुनिया देखते हैं, बिना बोले सब कुछ समझते कहते रहते हैं…

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Yashwant Singh : लताजी जब आती हैं तो एसपी बालासुब्रमण्यम उनका पैर छूते हैं.. फिर शुरू हो जाते हैं दोनों गायक… तू कहे तो, नाम तेरे, कर दूं सारी जवानी… गज़ब जिद है प्यार में.. तू कहे तो नाम तेरे कर दूं सारी जवानी… हर उम्र की एक तड़प होती है… बचपन की अलग, किशोर उम्र की अलग, युवा दिनों की अलग, अधेड़ उम्र की अलग औरर बुजुर्ग अवस्था की अलग… मुश्किल ये है कि …बाजार, मार्केट, पैसा, बिजनेस, कारोबार… ने सिर्फ प्यार और सेक्स को इस कदर एक्सपोज कर रखा है कि हर कोई हर दौर हर उम्र में इसी से चार्ज्ड है या चार्ज्ड होने को अभिशप्त है… इस कारण वह इससे बड़ी और जरूरी कई तड़पों की तरफ ध्यान, दिल, दिमाग नहीं ले जा पाता है…

खैर, प्रवचन लंबा हो जाएगा.. फिलहाल ये कहना है कि ये वीडियो इसलिए जरूर देखें कि वही गाना जो आप फिल्म में हीरो-हीरोइन को मुंह हिलाते सुनते हैं और जब इसे इसके ओरीजनल गायकों की जुबान से सुनते हैं तो कितना फर्क महसूस होता है.. मुझे इन दोनों लताजी और एसपीबी को गाते हुए सुनने में ज्यादा आनंद आया…

एक लाइव कनसर्ट की रिकार्डिंग है. पुराना है.

एसपीबी ने लताजी का पैर छुवा और दोनों ने क्या खूब गाया…

ये दोनों सामान्य मनुष्य नहीं, ये अपने फन अपने पैशन को इतना गहरे डूबकर जीते हैं कि एक पल को या गाते हुए ये खुद के होने ना होने के एहसास से उपर उठ जाते हैं..

ऐसी ही तड़प होनी चाहिए… किसी भी चीज के प्रति… चाहे वो बुरा हो या अच्छा हो… क्योंकि दुनिया में सही गलत अच्छा बुरा कुछ नहीं होता…

सही गलत अच्छा बुरा खराब ठीक… ये सब औसत मनुष्यों द्वारा औसत मनुष्यों के लिए बनाई गई स्थूल किस्म की गाइडलाइन है, साथ ही, हमारा आपका परसेप्शन भी, जो परंपरागत परिवेश व परंपरागत समाज से तोहफे में मिला है और हम दूसरों को देते चले जाते हैं ….

एक उलटबांसी देखिए… खराब और अच्छा के गलबंहिया डालने की परिघटना देखिए कि सभ्यता को सभ्य बनाते-बनाते हमने जंगली जानवरों पर काबू कर लिया या उनका खात्मा कर दिया लेकिन बनती बढ़ती संवरती जा रही सभ्यता की असभ्यता की हद ये कि जंगली आदमियों की तादाद दिन प्रतिदिन बढ़ती चली गई.. आज जंगली जानवरों से मनुष्यता-सभ्यता को खतरा बिलकुल नहीं, जंगली आदमियों से हर कोई हलकान, परेशान, हैरान है… आजकल जो कुछ हो रहा है, इसी संदर्भ में देखिए और सोचिए…

खैर, नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करिए और आनंद लीजिए इस गाने का… सुन बेलिया… शुक्रिया… मेहरबानी… तू कहे तो, नाम तेरे, कर दूं सारी जवानी… लताजी और एसपीबी की आवाज में…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/706/media-music/lataji-and-spb-live-in-concert.html


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

फेसबुकी संपर्क: https://www.facebook.com/yashwant.bhadas4media

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