गोधरा दंगों के 11 साल बाद मोदी की सद्धभावना या दुर्भावना!

गोधरा दंगों को पूरे 11 साल हो गए हैं, लेकिन अपने मूल से उखड़े हुए आज कितने लोग निर्वासित की जिंदगी जी रहें हैं. अलीफ दरिया खान पठान कभी गुजरात के वीरमगाम में रहते थे, हांलाकि रहने को पतरे वाली झोपड़ी थी लेकिन वीरमगाम के डाय केमिकल फैक्टरी में उन्हें जीविकोपार्जन के लिए कम से कम 2000 रुपए का मासिक वेतन तो मिल जाता था और उनकी पत्नी भी लोगों के कपड़े सिलकर घर की गुजर-बसर कर लेती थी, लेकिन 2002 में हुए गोधरा दंगों की ऐसी मार पड़ी कि ना केवल वह पतरे वाली झोपड़ी आग में भस्मीभूत हो गई बल्कि घर से बेघर हो गए. अब घर से दूर कड़ी के दिल्ला गांव की राहत छावनी में वे निर्वासित सी जिंदगी गुजार रहें हैं, आर्थिक रुप से तो वे टूटे ही क्योंकि कड़ी में उन्हें 50 रु. की मजदूरी करनी पड्ती है और मजदूरी भी रोज नहीं मिलती.

गुजरात में 2002 में हुए जनसंहार के बाद दो लाख से भी ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे, लेकिन 16,087 लोग आज भी ऐसे हैं जो दस साल बाद अपने घरों में वापिस ना लौटकर मुस्लिम स्वैच्छिक संस्थाओं और स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा बनाई गई राहत छावनी में जीवन जीने को बाध्य हैं. और करीबन 83 राहत कॉलोनी में 16,087 लोग नर्क से भी बदतर जीवन जीने जी रहे हैं, क्योंकि इन छावनियों में पानी, गटर, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, कितनी अजीब त्रासदी है कि गोधरा दंगों के 11 साल बाद भी इस नर्कागार में रह रहे लोगों के लिए एक ऐसी विभाजन रेखा खींच गई है, जो गोधरा दंगों का दंश भूलने नही दे रही, वो भी ऐसे समय में जबकि गुजरात में रह रहे 4 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के लिए विकास का दावा करने वाले मोदी ने गुजरात के सभी जिलों में सद्भावना उपवास के साथ करोड़ों रुपए के पैकेज़ की बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर चुके हैं, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अल्पसंख्यकों के लिए यह मोदी की सद्भावना है या दुर्भावना.

ये वे लोग हैं जो अपने घरों में जाने से घबराते हैं, जो 2002 में स्वैच्छिक संस्थाओं और मुस्लिम सेवा संस्थाओं द्वारा बनाई गई राहत छावनियों में रह रहे हैं. हालांकि यूनाइटेड नेशन की ‘’गाइडिंग प्रिंसिपल ऑन डिसप्लेसमेंट’’ की धारा 18 के अनुसार आंतरिक विस्थापित लोगों को सड़क, पानी स्वास्थ्य, शिक्षण आदि जैसी प्राथमिक सुविधाएं मुहैया करवानी चाहिए, लेकिन दस सालों के बाद भी वे इन सुविधाओं से वंचित हैं. और अहमदाबाद की ‘’जनविकास’’ संस्था ने हाल ही में 8 जिलों की 83 कॉलोनियों को रहने वाले दंगा पीडितों को  लेकर सर्वे किया है, जिसमें बताया है कि 33 प्रतिशत मकानों में पीने के पानी की किल्लत है, जिसमें आणंद और अहमदाबाद की स्थिति सबसे ज्यादा बदतर है. आणंद के आनंद शिवराज भाई कहते हैं कि आणंद के 33 गांव में 68 परिवार रहते हैं जहां मस्जिद के पास एक बोर है और उस बोर से सब पानी लेने आते हैं, लेकिन इस बोर का पानी भी पीने लायक नहीं है.

उल्लेखनीय है, कि आणंद के पास ओढ में 27 लोग मारे गए थे, लेकिन आज तक वे लोग वापिस नहीं जा पाए हैं और उन्हीं राहत शिविरों में रहने को बाध्य हैं, वहां ना स्कूल हैं, ना सरकारी अस्पताल और ना आंगनबाडी और ना बालमंदिर है. प्राइवेट स्कूल भी 13 कि.मी. दूर है. वे कहते हैं पिछले दस सालों में हमने कितनी ही अर्जियां तहसीलदार से लेकर जिला आयुक्त और अल्पसंख्यक आयोग को दी, लेकिन उन्होंने सभी अर्जिय़ां ले-लेकर फाइलों का ढेर बना दिया. सरकार योजनाएं पर योजनाएं बना रही हैं लेकिन ना हमारे नाम मकान है और ना ही हमारे नाम बिजली का बिल आता है, और सबूत ना होने की वजह से हमें लोन भी नहीं मिलता. दंगा पीडित अय्यूब भाई जो मसाना के विजापुर से 6 किमी लडोद गांव में रहते हैं, उनका कहना है कि मसाना में इस्लामिक रिलीफ कमेटी ने विस्थापित लोगों के लिए एक कमरे के करीबन 97 मकान बनाकर दिए हैं, लेकिन वहां तो इतना बुरा हाल है कि जहां कि कुछ कॉलोनी में पानी लेने के लिए लोगों को एक गांव से दूसरे गांव में जाना पडता है. कुछ कॉलोनी में तो गटर लाइन जुड़ने के कारण पहले 15 मिनट गंदा पानी आता है, और फिर साफ आता है. मसाना नगरपालिका को कहने के बावजूद भी कोई सुनवाई  नहीं होती.

जनविकास की रिपोर्ट के अनुसार 81 प्रतिशत मकानों में आज भी गटर की सुविधा नहीं है, जिसमें पंचमहल, खेडा, और आणंद जिले की 32 कॉलोनियां भी शामिल हैं. पहले इन मकानों में शौचालयों की व्यवस्था भी नहीं थी, लेकिन लोगों ने जैसे तैसे कर अपने घरों में शौचालय बनवा लिए, लेकिन इस्लामिक रिलीफ फंड मकान इनके नाम नहीं कर रही है, क्योंकि इन्हें डर है कि कहीं ये लोग मकान बेचकर ना चले जाएं, इसीलिए घरों के मकान के बिल इनके नाम नहीं आते.

रिपोर्ट के आधार पर 81 प्रतिशत कॉलोनी ऐसी हैं, जो शहर और तालुका और गांवों से दूर है, जिससे लोग मुख्य (एप्रोच) रोड की सुविधा से वंचित हैं. क्योंकि आणंद, मसाना, साबरकांठा और अहमदाबाद की कॉलोनियों में बारिश में पानी भरने से बच्चों को दूर स्कूल भेजने में मुश्किलों का सामना करना पडता है. जिससे बच्चों की शिक्षा पर असर पडता है. 85 प्रतिशत कॉलोनियों आंतरिक रास्तों की सुविधाओं की कमी से निरंतर जूझ रही हैं. जिससे बरसात में पानी भरने से मलेरिया, डेंगू, हैजा, जैसे रोगों का निरंतर सामना करना पडता है. रास्तों के अभाव में तात्कालिक उपचार के लिए अस्पताल पहुंचना भी दूभर हो जाता है. 41 प्रतिशत कॉलोनियों में स्ट्रीट लाइट की सुविधा नहीं है, सिर्फ पंचमहल, बडोदरा और साबरकांठा जिले के मात्र 50 पतिशत मकानों में ही स्ट्रीट लाइट देखने को मिली है., हांलाकि लोगों का कहना है कि स्ट्रीट लाइट के लिए लोगों ने अपनी मजदूरी से पैसे बचा-बचाकर भरे थे, लेकिन सरकार ने बिजली के खंबे खड़े करने में उदासीनता ही दिखाई.

भारत सरकार द्वारा संकलित बाल विकास योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों का विकास है, लेकिन 55 प्रतिशत कॉलोनियों में सरकार विस्थापित हुए लोगों के मामले में आंगबाडी और अन्य बाल कल्याण जैसी प्रवृतियों में सतत उदासीनता दिखा रही है. जितनी भी प्राथमिक शालाएं हैं वह मकानों से तीन किमी की दूरी पर हैं. जहां तक शिक्षण की गुणवता का सवाल है वह भी संतोषजनक नहीं. सबसे प्रमुख बात यह है कि 85 प्रतिशत कॉलोनियों में कोई भी कम्युनिटी हॉल नहीं बनाए गए हैं, यही कारण है कि हिन्दू मुस्लिम के बीच सीधा संवाद ना होने के कारण समाज से अलग बहिष्कृत जीवन जीने को बाध्य है. आंतरिक विस्थापित लोगों को खाद्य वितरण व्यवस्था द्वारा अनाज और राशन पर्याप्त मात्रा में मिले यह जरुरी है लेकिन 23 प्रतिशत लोगों को राशन का जत्था नहीं पहुंचता. जिन लोगों के पास अंत्योदय कार्ड है वे कहते हैं कि इस कार्ड से अब सरकारी अस्पतालों में गरीबों की चिकित्सा बंद कर दी गई है. अब सरकारी अस्पताल के डाक्टर कहते हैं कि पहले पैसे जमा करो. और अब तो उन्हें राशन मिलना भी बंद हो गया है सिर्फ केरोसीन ही दिया जाता है. लेकिन जिन दंगा पीडितों के पास अंत्योदय कार्ड नहीं है. वे कहते हैं कि हम लोग 10 साल बाद सबूत कहां से लाए, क्योंकि वे राहत शिविरों में रह रहें हैं, और ना ही मकान और बिजली का बिल जो उन्हें भरना तो पड़ता है लेकिन उनके नाम नहीं आता है कि जिसका सबूत वे अंत्योदय कार्ड के लिए दें.

इस सर्वे में कहा गया है कि कुल 16,087 लोगों में से मात्र 159 विस्थापित लोगों को ही अलग-अलग सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं का लाभ मिला है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि सरकार के पास दंगों के कारण विस्थापित हुए लोगों की बस्ती में विधवा बहनें, या निराधार लोगों के आंकड़े उपलब्ध नहीं है. जबकि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग़ ने 2006 में राज्य सरकार को हिदायत दी थी कि ‘’अगर किसी महिला ने 2 वर्ष के अंदर पेंशन के लिए आवेदन नहीं किया या अगर किसी विधवा महिला का 18 वर्ष का बेटा है तो वह भी पेशन की हकदार है.’’ लेकिन इस सूचना की कभी राज्य सरकार ने कोई परवाह नहीं की. जनविकास की गीता ओझा का कहना है कि दंगों में विस्थापित हुए लोग आर्थिक रुप से काफी टूट गए और राज्य सरकार ने कभी इस दिशा में प्रयास ही नहीं किए कि लोगों को वापिस सुरक्षा की भावना का अहसास कर अपने वतन में वापिस लाया जाए. इतना ही नहीं दंगा पीडितों की संपत्ति को कितना नुकसान हुआ है या कितनी लूट या जला दी गई है, इस दिशा में कभी तटस्थ जांच भी नहीं की गई है. यही कारण है कि सद्भावना मिशन के बाद भी कोई अपने वतन लौटने को तैयार नहीं है.

अहमदाबाद से ऊषा चांदना की रिपोर्ट.

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