गुजरात नहीं, उत्तर प्रदेश के ‘मामुओं’ की उपज हैं नरेंद्र मोदी

राष्ट्रीय परिदृश्य पर मोदी क्यों उभरे? जिस किसी से पूछिए तो वो गुजरात, गोधरा, विकास इन्ही शब्दों से गुंथा कुछ जवाब देता नज़र आयेगा, पर बात इतनी आसान नहीं है। मोदी उपज है विगत बीस वर्षों से भटकी हुई उत्तर प्रदेश की राजनीति की। जो यूपी देश को अपने सांसदों के दम पर प्रधानमंत्री देता था, वो ही मंडल कमीशन की आंधी के बाद जातीयता के दलदल में ऐसा धंसा कि मामुओं (मायावती का मा + मुलायम का मु + अखिलेश + आज़म का अ) के मोह में उलझ कर रह गया। राष्ट्रीय पार्टियों के न फलने फूलने का असर ये रहा कि न तो अब कोई राष्ट्रीय नेता है और न ही उच्च स्तर का विकास। गुजरात, मध्यप्रदेश, हिमांचल, हरियाणा जैसे राज्य यूपी से आगे निकल गए। इन राज्यों में कार्पोरेट पहुंचे, रोजी-रोजगार पहुंचा और हम वहीं के वहीं सपा बसपा के झंडाबरदार बने रहे और पापा-बेटा और बहन भैया को सींच-सींच कर ताकत देते रहे।

इन बीस सालों में उत्तरप्रदेश अपनी उपजाऊ जमीन, उपलब्ध सस्ते श्रम और हर तरह के उद्योग-धंधो के लिए प्राकृतिक अनुकूलता के बावजूद भूकम्प से तबाह गुजरात से पिछड़ गया। इसकी जिम्मेदार प्रदेश की सामंतशाही सरकारें है, जिनके मुखिया को अपने घर और गांव तो दीखते है लेकिन राष्ट्रीय सोच के अभाव में पूरा प्रदेश एक जैसा नहीं दिख पता। जिन कार्पोटरेट्स के साथ का आरोप मोदी पर लगाया जा रहा है, वो तो शुद्ध व्यापारी है, ये ही कार्पोरेट्स मुलायम और मायावती के साथ भी आते रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है इन मामुओं ने उनका लाभ सिर्फ अपनी पार्टी और अपने लिए लिया, जबकि मोदी ने गुजरात के लिए।

गंवई सोच के साथ सोचिये कि किसी भी व्यापारी को क्या चाहिए? व्यापार करने के लिए सस्ती और सुरक्षित जगह, हर दम बिजली, सड़क और आने जाने की सुविधा ताकि लोग बेधड़क अधिक से अधिक संख्या में आ जा सके। यूपी की सरकारें यही माहौल नहीं दे सकीं। कार्पोरेट्स ने भी यूपी से मुँह मोड़ा और यूपी अपनी बीन और अपनी झाल बजाता रहा। पर देश को तो आगे बढ़ना था, कार्पोरेट्स को तो अपने अनुकूल सरकारें चाहिए ही, सो उन्होंने मोदी को प्रोजेक्ट कर दिया। इसमें गलत भी कुछ नही है क्योकि पूरा विश्व कार्पोरेट्स की लाबीइंग के अनुसार ही चलता है, भारत भी चलेगा। अब केजरीवाल पागल होकर कपड़ा फाड़-फाड़ कर चिल्लायेंगे तो सूरज तो पश्चिम से उगेगा नहीं।

केंद्र सरकार की नज़रें इनायत कब होती हैं इसको बिहार के मौजूदा घटनाक्रम में देखिये, मुख्यमंत्री नितीश कुमार बिहार को केंद्र से विशेष राज्य का पैकेज़ दिलवाने को स्वयं आंदोलन और बंदी करवा रहे है, एड़ी-चोटि लगा रहे है पर चुनावो के मद्देनजर चुँकि हवा अच्छी नही है, सो सुनवाई नहीं हो रही है। यही केंद्र के महत्व की सरकार होती तो तुरंत पैकेज मिलता, एक बार राबड़ी तो पा ही चुकी है तब लालू किंगमेकर हुआ करते थे और राबड़ी मुख्यमंत्री बिहार। यही हाल यूपी का है, इन बीस सालो में जो भी प्रदेश सरकार होती है उसका केंद्र से छत्तीस का आंकड़ा बना रहता है, सो विकास माईफूट होगा। इन बीस सालों में न तो हमने राष्ट्रीय महत्व के नेता दिए और न ही राष्ट्रीय महत्व के दलों को पनपने दिया, सो राष्ट्रीय राजनीती में हम भी केवल संख्या भर रह गए और आज हमें गुजरात और उसके मुख्यमंत्री की ओर अपने विकास के लिए टकटकी लगा कर देखना पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी कार्पोरेट्स की नहीं बल्कि यूपी और बिहार की संकीर्ण जातिवादी, वंशवादी और भाई-भतीजावादी राजनीती की उपज है और इन राज्यों की नकारात्मक राजनीती की पैदाइश है। इन्हे हमने और आपने ही उगाया है और इन्हे हम और आप ही सींच रहे है।

 

लेखक अजित कुमार राय से उनके मो. 9450151999 या 9807206652 पर संपर्क किया जा सकता है।

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