पढ़ाई में सख्ती जरूरी है, लेकिन इतनी नहीं कि छात्र को जान गंवानी पड़े

कुछ ब्लैक बोर्ड, चॉक के टुकड़े और छुट्टी की घंटी किसी स्कूल की जरूरत हो सकती हैं, लेकिन परिचय और पहचान नहीं। उसका परिचय वे विद्यार्थी होते हैं जो वहां से अर्जित ज्ञान को समाज में अभिव्यक्त करते हैं। यह एक सामान्य तथ्य है कि स्कूलों में विद्यार्थियों की सोच और समझ काफी हद तक शिक्षकों से प्रभावित होती है। इस मामले में मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि मुझे बहुत अच्छे शिक्षकों का मार्गदर्शन मिला। हालांकि उनमें से कोई भी लंदन, न्यूयॉर्क या पेरिस से नहीं आए थे। वे सभी आस-पास के गांवों से हैं। उनमें से ज्यादातर के पढ़ाने का तरीका काबिले तारीफ रहा है। लेकिन मुझे कुछ ऐसे शिक्षकों से भी पढ़ने का अवसर मिला है जो हमारे दुर्भाग्य से शिक्षक बन गए थे। अगर वे शिक्षक नहीं बनते तो भी देश में शिक्षा के क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं होता। अगर वे आतंकवादियों व डकैतों का रिमांड लेने या फांसी की सजा पाए कैदियों को फंदे पर लटकाने की नौकरी करते तो वहां उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल होता।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे स्कूलों, खासतौर से गांव के सरकारी स्कूलों में बच्चों की बेरहमी से पिटाई होती है। यहां मैं सब शिक्षकों को जालिम नहीं बता रहा हूं और न ही सब स्कूलों को मार-पीट का अड्डा। मैं बच्चों को डांट और होमवर्क न करने पर पापा को बुलाने की हिदायत को भी गलत नहीं मानता, लेकिन यह कहां तक सही है कि किसी बच्चे को इस हद तक पीटा जाए कि उसे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़े। अपने स्कूली दिनों में मुझे एक ऐसे शिक्षक से पढ़ने का अवसर मिला था जो किसी बच्चे को तब तक पीटते थे जब तक कि वो अधमरा न हो जाए। उन शिक्षक महोदय की पिटाई से अब तक किसी बच्चे की जान नहीं गई। आप चाहें तो इसे उनकी दया या मेहरबानी समझ सकते हैं। गांव के स्कूलों में घोर अंधेरगर्दी है। यहां मानवाधिकार किस चिड़िया का नाम है, यह कोई नहीं जानता। न तो वे शिक्षक जो पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ते और न ही वे बच्चे जो आए दिन पिटते हैं।

प्रार्थना सभा में तोड़ दी चूड़ियां

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पुरुष अध्यापक ही पीटने में अव्वल हैं। कुछ अध्यापिकाएं भी पिटाई के मामले में किसी से कम नहीं होतीं। मैं एक अध्यापिका को जो जानता हूं, जिनका खासा खौफ था। कुछ साल पहले तक मेरे जिले में लड़कियों की कम उम्र में शादियां करने का प्रचलन था। ऐसे में स्कूलों में उन छात्राओं की काफी तादाद होती जो चूड़ियां पहनकर स्कूल आतीं। एक बार उन अध्यापिका ने प्रार्थना सभा में उन छात्राओं को अलग पंक्ति बनाने के लिए कहा जो चूड़ियां पहनकर आई थीं। उनके हुक्म का पालन हुआ और कुछ ही देर बाद वे हाथ में एक छड़ी लेकर आईं।उन्होंने सभी छात्राओं से हाथ आगे करने के लिए कहा और छड़ी से सभी चूड़ियां तोड़ दीं। चूंकि गांवों में ऐसे शिक्षकों के खिलाफ कोई भी बोलने की हिम्मत नहीं करता, लिहाजा कुछ ही दिनों में मामला ठंडा हो गया। इस बात को करीब एक महीना बीत गया। एक दिन चूड़ियां फोड़ने वाली उन अध्यापिका के पति की मौत हो गई। उन्हें उन छात्राओं के दुख का अहसास उस दिन हुआ।

आज जब मैंने रांची के पास स्थित मंदार शहर के निवासी सुजित मुंडा की खबर पढ़ी तो वह प्रार्थना सभा याद आ गई। सुजित न तो कोई उग्रवादी था और न ही उस पर किसी सरकार ने इनाम घोषित कर रखा था। वह सिर्फ आठ साल का एक बच्चा था। उसके शिक्षक (?) ने उसे इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। यह पहला मामला नहीं है और निश्चित रूप से अंतिम भी नहीं होगा। हमारे शिक्षक वेतन-भत्तों और काम के घंटे कम करने के लिए आए दिन आंदोलन करते हैं। वे ज्यादा से ज्यादा आराम और आसानी पसंद करते हैं लेकिन वे बच्चों की इस प्रकार घातक पिटाई के मामले में बिल्कुल उदासीन हैं। तब कोई शिक्षक सड़कों पर नहीं उतरता, क्योंकि मुर्दे किसी का वेतन नहीं बढ़वा सकते। मेरा मानना है कि पढ़ाई में कुछ सख्ती तो जरूरी है लेकिन यह इतनी भी जरूरी नहीं है कि किसी को अपनी जान गंवानी पड़े। बेहतर होगा कि सरकार स्कूल में बच्चों के अधिकारों के लिए भी कोई कानून बनाए और यदि कोई भूला-बिसरा कानून है भी तो कम से कम हर क्लास में लिखकर उसका जिक्र तो कीजिए। और सबसे ज्यादा जरूरी है कि ऐसे जालिम शिक्षकों के लिए किसी स्कूल में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि कोई छड़ी किसी से जिंदा रहने का हक न छीने।

 

लेखक राजीव शर्मा को उनके ब्लॉग ganvkagurukul.blogspot.com पर भी पढ़ा जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *