क्या फर्क पड़ता है कि हरिसिंह जाटव मर गया

बरेली। विगत 17 अप्रैल को आंवला लोक सभा क्षेत्र के देवचरा में एक मतदान बूथ पर हरिसिंह जाटव ने केरोसिन डाल कर आत्मदाह कर लिया था। हरिसिंह वोट डालने के लिए जयपुर से अपने घर आया था। वह राम भरोसे इंटर कॉलेज मतदान केंद्र के बूथ संख्या 310 पर वोट डालने भी गया। लेकिन मतदान पर्ची न होने के कारण मतदान कर्मियों ने उसे वोट नहीं डालने दिया। बार-बार मना किए जाने से क्षुब्ध हरिसिंह ने आत्मघाती कदम उठा लिया। फिर जैसा कि होना था, प्रशासन ने हरिसिंह को विक्षिप्त औऱ शराबी बता कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की और अपनी रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग को ये बात लिख भेजी।

इस मुद्दे को बरेली के मीडिया और कुछ समाजसेवी संगठनों ने प्रमुखता से उठाया है। इससे प्रशासन की तबीयत पर तो कुछ असर नहीं हुआ, हां हरिसिंह के आश्रितों (बूढ़ी मां, पत्नी और पांच छोटे बच्चे) की मदद के लिए हाथ ढेरों हाथ आगे आए हैं।

यहां कुछ सवाल चुनाव आयोग से भी है। हरिसिंह तक मतदान पर्ची क्यों नहीं पहुंची? उस तक पर्ची पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? मतदान पर्ची पहचान का दस्तावेज़ नहीं है और न ही उसे पोलिंग बूथ पर लाना आवश्यक है फिर हरिसिंह को बिना मतदान पर्ची वोट क्यों नहीं डालने दिया गया? क्या मतदान कर्मियों, सुरक्षाबल के जवानों को इतनी सख्त हिदायत दी गयी थी कि चाहे कुछ हो जाए वे अपने स्थान से नहीं हिलेंगे? क्या वोटरों को जागरूक करने के बाद चुनाव आयोग की ये जिम्मेदारी नहीं कि वो प्रत्येक वोटर का मतदान सुनिश्चित कराए?

प्रस्तुत है इस घटना पर अमर उजाला बरेली के संपादक दिनेश जुयाल का लिखा और अमर उजाला में 19 अप्रैल को प्रकाशित एक बहुत ही मार्मिक लेखः 


  

                      क्या फर्क पड़ता है कि हरिसिंह जाटव मर गया

बरेली। देवचरा मतदान केंद्र के अंदर स्कूल कैंपस में मेन गेट से करीब 25 मीटर दूर हरिसिंह की एक चप्पल, कॉलर का अधजला टुकड़ा और पैंट के साथ जली हुई खाल 30 घंटे के बाद भी वहीं पर है। सुबह की बारिश भी इसे बहा नहीं पायी। थानेदार जीएल यादव कह रहे हैं कि घटना स्थल सड़क पर है तो इसे ही सरकारी सच मानना पड़ेगा। पीपल का पेड़ गवाही नहीं दे सकता कि सारे बीएलओ यहीं पर बैठे थे, यहीं दो बार हरिसिंह की तकरार हुई, यहीं पर आग लगा कर वह बायीं तरफ काफी दूर तक भाग कर जमीन पर गिर गया था। स्कूल के चपरासी महेश को सब पता है, हमें उसने बताया भी लेकिन वह ऐसी गवाही नहीं देगा। वह कहेगा कि उस समय तो वह पानी पिलाने गया था। आग बुझाने के नाम पर अखबार से फटका मारने वाला दरोगा कुछ नहीं कहेगा। पता नहीं कितने लोग थे मौके पर, कौन उन्हें गवाही के लिए लाएगा? सीआईएसएफ के जवान भी ड्यूटी करके चले गए। सरकार ने आनन-फानन में लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस बुला कर कह दिया कि हरिसिंह की मौत की वजह मतदान से जुड़ी नहीं है। प्रशासन ने अपनी त्वरित रिपोर्ट में उसे पागल और शराबी तक करार दे दिया तो हरि सिंह प्रतिवाद नहीं करेगा उसे तो कल रात ही आनन-फानन में जला दिया। एक गरीब उस पर भी जाटव मजदूर खुद जल कर मर गया किसको फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता जो लोकतंत्र के महापर्व पर कोई दाग लगता, आफीशियली यह घोषित कर दिया कि ऐसा नहीं हुआ अब किसी बात से क्या फर्क पड़ता है।

नई बस्ती में कीचड़ का रास्ता पार कर एक अधबने मकान के पास हरिसिंह की फूस की झोपड़ी के बाहर उसकी मां-बीवी और पांच बच्चों को दिलासा देने बस्ती की कुछ महिलाएं बैठी हैं। यही वे लोग बचे हैं जिन्हें इस मौत से फर्क पड़ता है। हरिसिंह के कमजोर परिवार को सहारा देने वाले भजनलाल हों या फिर आसपास की महिलाएं, हरि को पागल और शराबी कहे जाने को सरकारी बेहयाई की मिसाल मानते हैं। कहते हैं, जो पेट मुश्किल से भर पाता हो वह शराब कहां से पीएगा। कभी मिल गई तो लगा ली लेकिन इस बार तो चुनाव की वजह से तीन दिन से यहां औरों ने भी शराब नहीं पी थी। सब कहते हैं उसे पागल कैसे करार दे सकते हैं? दिमागी रूप से सारे ही गरीब कमजोर होते हैं, बड़ा दिमाग होता तो बाबू साब नहीं होते। हरि जरी का बेहतरीन कारीगर था, हर तरह की मजदूरी करता था। पांच बच्चों का कच्चा परिवार है, कभी बीवी पर झुंझलाहट तो निकालता ही होगा। यह कल्पना कर एसडीएम ने लिख दिया गया कि वह पत्नी से झगड़ कर आया था। हरि का विसरा सुरक्षित कर लिया गया है, इसमें गंदा पानी बताया गया है। हो सकता है कि हजारों विसरों की तरह ये भी सालों यों ही पड़ा रहे। अगर फर्क पड़ता लगा तो जल्द जांच भी हो जाएगी और जैसी रिपोर्ट चाहे मिल जाएगी।

हरि के मामा बामसेफ से जुड़े हैं। शायद यही वजह थी कि यह जरी कारीगर बसपा को वोट देने के लिए जयपुर से यहां आया था। यकीनन उसने दबाव बनाने के लिए आत्मदाह का प्रयास किया लेकिन शायद मरना तो उसने भी नहीं चाहा होगा। बीएलओ से पहली बार हुए झगड़े की बात हरि की पत्नी वीरवती ने भी कही, तब वह भी साथ में थी। पर्ची हरि ही नहीं गांव के और लोगों को भी नहीं दी गई थी। गांव वाले इसकी तस्दीक कर रहे हैं लेकिन प्रशासन का इस पर ज्यादा जोर है कि बीएलओ की भूमिका सामने न आए वरना मामला चुनाव से जुड़ जाएगा। वीरवती की तहरीर को एसओ पहले ही झूठा बता रहे हैं, जांच के बाद इसका क्या हश्र होगा यह कहने की जरूरत नहीं।
 
एसओ भमोरा ने बताया कि मामले की जांच एसडीएम, सीओ और स्थानीय पुलिस कर रही है। दोपहर बाद तीन बजे तक इनमें से न कोई मौके पर दिखा न हरि के घर गया। एसओ ने बताया कि दरोगा सत्येंद्र जांच पर निकले हैं, शाम को आएंगे। घटनास्थल थाने से दो किलोमीटर और घर ढाई किलोमीटर पर है। जब उनसे कहा कि जांच के लिए बहुत दूर तो जाना नहीं तो बोले-मौके पर इतने लोग मौजूद थे कोई कर्नाटक पहुंच गया होगा और कोई बरेली, जांच इतनी जल्दी नहीं होती। खास कर इस मामले में तो लंबा समय लगना है। लोग कुछ भी लिखें-कहें सच वही माना जाएगा जो हमारा आईओ लिखेगा।
 
सारे प्रत्याशी शुक्रवार को थकान मिटा रहे थे लेकिन हरि जैसे वोटरों के मरने पर बसपा को शायद फर्क पड़ता है इसलिए कल रात बसपा विधायक सिनोद शाक्य यहां पहुंचे थे। गांव के प्रधान गुप्ता जी हरि के घर नहीं पहुंचे। हरि शायद उनका वोटर नहीं है इसलिए हरि का न बीपीएल कार्ड बना है और न इंदिरा आवास के लिए उसे पात्र माना गया। हरि की 10 गुणा आठ की झोपड़ी के अंदर एक कोने पर कुछ सूखी लकड़ियां हैं। कुछ गत्ते के छोटे-छोटे डिब्बे, एक लकड़ी का बक्सा और तीन खटिया। सामने बच्चों की कुछ किताबें भी हैं। बस इतनी सी पूंजी है। खाना घर के बाहर खुले में पकता है। कोई दरवाजा नहीं, एक टाट लटक रहा है। बड़ा बेटा तेरह साल का अनितेश साढ़े चार फुट का हो गया है। कभी-कभार शादी-ब्याह में उसे भी काम मिल जाता है। उसका नाम पांचवीं कक्षा में लिखाया गया है। प्रतीक्षा, अतुल और संजना तीनों कक्षा तीन में बैठती हैं और छह साल की स्वाति आंगनबाड़ी में। ये मिड डे मील वाले बच्चे हैं। इतना गरीब आदमी मर गया किसे फर्क पड़ेगा। मतदान प्रक्रिया पर दाग लगने से बच जाए ये चिंता किसी की हो सकती है लेकिन एक विधवा, पांच अनाथ बच्चे बूढ़ी बेसहारा मां इनकी चिंता पड़ोस के लोग और भजनलाल कब तक कर पाएंगे, पता नहीं। कह रहे थे इन्हें अनाथालय भिजवाने की व्यवस्था करवा दीजिए, हुजूर।

 

दिनेश जुयाल

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