आज ज़रूरत है ”हाउसकॉल्स” मैगज़ीन जैसी एक स्वतंत्र आवाज़ की

पंद्रह वर्ष के लंबे सफ़र के बाद हैदराबाद की डॉ रेड्डीज़ लबोरिट्रीज़ द्वारा प्रकाशित, अंग्रेजी द्विमासिक पत्रिका हाउसकॉल्स इस वर्ष बंद होने वाली है। हाउसकॉल्स की संपादक रत्ना राव सीकर ने पत्रिका के जनवरी-फ़रवरी अंक में प्रिंट मीडियो की उपयोगिता को बताते हुए उसके घटते प्रभाव पर दुख व्यक्त किया है।

 
वे लिखतीं हैं कि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार के चलते आजकल हम लोग बयानों के शोरगुल और सूचनाओं से घिरे हुए हैं, लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो प्राइम टाइम न्यूज़ को बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऐसे कार्यक्रमों में जाने-माने न्यूज़ एंकर अपनी तेज़ आवाज़ और प्रभाव के बल पर न सिर्फ अपना निर्णय थोपते हैं बल्कि दूसरों के मत को भी नकार देते हैं। भले ही ये विचार सम्मानित नागरिकों के ही क्यों न हों।

इस मामले में प्रिंट माध्यम भी कम नहीं है। वो भी सेलिब्रिटीज़ और सोशलाइट्स को खूब छपता है। वित्तीय घटे से ले कर फैशन ट्रेंड, सभी मुद्दो पर उनके विचार लिए और छापे जाते हैं। पेज भरने के लिए उनके बयानों से बड़े उनके फोटो लगाये जाते हैं।
 
स्वतंत्र पत्रकारिता के वे दिन बीत गए जब हम सुबह का न्यूज़ पेपर चलपति राऊ, सी. आर. ईरानी, या फिर कुलदीप नय्यर के गम्भीर विचारों को पढ़ने के लिए खोलते थे। आज तो स्वयं मीडिया के स्वामित्व पर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया हाउसेज़ या तो  किसी बिज़नेस या फिर पोलिटिकल ग्रुप द्वारा वित्त-पोषित हैं। पहले जैसी वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष खबरें अब नहीं मिलती जिन पर हम भरोसा कर सकें।
 
ये बड़े दुःख कि बात है के न्यूज़ भी खरीदी जा सकती है। आप जितना बड़ा चेक दे सकते हैं आपकी ख़बर उतनी ही बड़ी लग सकती है। हाल ही में एक सेलिब्रिटी के यौन हमले, एक हाई-प्रोफ़ाइल हत्या और एक क्रिकेटर के संन्यास कि खबरों को जिस तरह लगातार  कवर किया जाता रहा उससे पता चलता है कि टीवी और प्रिंट मीडिया की सोंच और दृष्टि कितनी विषम है।
 
ये आम चुनाव का वर्ष है, मीडिया को उस भारत पर फ़ोकस करना चाहिए जहाँ जवान लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं रूटीन हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया के लिए ऐसी घटनाएं सनसनीखेज़ नहीं हैं इसलिए न ही इनकी जांच पड़ताल की जाती है और न ही इन पर चर्चा होती है।

आधे सच के इस शोरगुल में सोशल मीडिया पे होने वाली बेलगाम बातचीत भी शामिल है। पूरी तरह स्वतंत्र होने के बाद भी, आत्म नियंत्रण या सम्पादकों के अभाव में सोशल मीडिया न्यूज़ पाने का परिपूर्ण माध्यम नहीं है। एक तरफ़ा मतों-विचारों का ऐसा जोर चल रहा है कि आज बहूत से लोग अपने ट्विटर और फेसबुक अकाउंट बंद कर देना चाहते हैं

पहले से कहीं ज्यादा आज हमें निष्पक्ष और सटीक लेखन की आवशयकता है जो हमें स्वतंत्र मत बनाने में सहायता करे। इसके लिए हमें टीवी की न्यूज़ नहीं चाहिए जो हमारी सोंच-समझ को इस तरह प्रभवित कर देती है कि हम उसी को सच मान लेते हैं जो सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी हमें दिखता है। न्यूज़ पढ़ने वालों कि बातों से प्रभावित होकर हम तैयार हो जाते हैं किसी की भी खाल उतारने के लिए या केंडल मार्च निकालने के लिए।
 
आजकल बहुत से लोग मानते हैं कि किताबें, मैगजीन्स और लेखक या तो मर गए हैं या उन्हें मर जाना चाहिए। लेकिन इस शोर के बीच हमें ज़रूरत हैं अंतर्दृष्टि और विवेक कि जो के एक अच्छी किताब या फिर निबंध में ही मिल सकता है। हमें ज़रूरत हैं लिखे हुए शब्द के भरोसे की। हमें ज़रूरत है लेखक के ह्रदय और उसके विचारों की सुंदरता को महसूस करने की। हमें चाहिए कि हम कुछ देर ठहरें और इन बातों पर विचार करें।

पहले से कहीं ज्यादा आज ज़रूरत है हाउसकॉल्स मैगज़ीन जैसी एक स्वतंत्र आवाज़ की, जो कि एक फार्मा कंपनी द्वारा सहायता प्राप्त होते हुए भी उसके प्रभाव से मुक्त थी। हाउसकॉल्स के लेख गूगल पर खोज के नहीं लिखे जाते जैसा कि आज चलन है। बल्कि लेखक फील्ड में काम करने के बाद बड़ी ईमानदारी से लेख लिखते थे। इसके लिए कई बार जान भी जोखिम में डालनी पड़ती थी ताकि लोगों को एक अच्छी स्टोरी पढ़ने को मिल सके।

 

By RATNA RAO SHEKAR

Increasingly these days, we are surrounded by a cacophony of soundbites and instant news.

It is not just I, but several people I know who cannot bear to watch prime time news. And this is mostly because well known anchors by the sheer force of their voice not only thrust their judgements on us but kill every other opinion ruthlessly, even if they come from respected citizens.

Our print media is no better in its over-indulgence of socialites and celebrities who air their views on everything from fiscal deficit to fashion trends (with the same élan), which are carried along with photographs that are bigger than their opinions.

Gone are the days of independent journalism when we opened the day’s papers to read the sane and sober reflections of a Chalapati Rau, a C.R. Irani or a Kuldip Nayar.

These days, when media ownership itself is suspect, funded as it is either by a business or a political group, we do not get the kind of objective and unbiased views we could fall back on in the past.

Sadly, as many of us have come to realise, even news can be bought, and you can get column inch space in proportion to the cheques you are willing to write for the media house.

How skewed the vision of both television and print media are, can be seen from the way they have recently been going on ad nauseam about celebrity sexual assaults, a high profile murder and the retirement of a cricketer.

This in the election year, when they ought to be focusing on the other India where there are rapes and murders of young girls on a routine basis! But these are not sensational enough for the mainstream media to take up so these stories are not discussed or dissected.

Added to this cacophony of half truths and dishonest opinions, we have the unrestrained chatter on the social media.

In the absence of any self-censorship, or editors who are in effect gatekeepers (and not just people who draw big salaries), the social media for all its freedom is a far from perfect way of receiving news.

In fact, there is such a slew of one-sided opinions, even hatred by certain right wing groups, that many want to shut their Twitter and Facebook accounts and move on.

More than ever in these times we need unbiased and nuanced writing that helps us in formulating independent opinions.

We need the resurrection of the common sense gene.
 
For this, certainly, we don’t need television news that numbs our senses so hopelessly that we begin to believe in a truth as given to us by CNN-IBN, or NDTV. We are ready to lynch or take out a candlelight march all based on the opinions of newscasters.

I have pointless arguments with people who believe that books, magazines and in fact writers themselves are dead, or should be dead. I say pointless, because in this intolerant world where there’s both sound and fury, we need the insight and wisdom offered to us in a good book or in a good essay.

We need the repose of the printed word.
 
We need to feel the heart of writers, and beauty of their ideas.
 
We need time to sit back and reflect.
 
Now, more than ever, we need the independent voice of a magazine like Housecalls which despite being supported by a pharma company was never about the sponsor or their viewpoints.

Nor were the articles Googled as is common nowadays.
 
Rather they were  written with integrity by writers who travelled the breadth of this country, often at a risk to their lives, looking for the good story to tell.

Since the last issue, we have been deluged by letters from distressed doctors and readers asking us why Housecalls is closing down, and if there was any way they could contribute.

I am not sure how they can help us, but am touched by the letters and feel vindicated that we were on the right track with the magazine – that what we had to say mattered and made a difference.

Now more than ever I believe in Housecalls.
 
Just as I do of the printed word.

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