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IBN की छंटनी में एक खास गुट के लोगों पर ही गाज गिरी है

ये सब कहने की बात है कि मीडिया में माहौल खराब है या मंदी की वजह से छंटनी हो रही है। ये सब मुनाफे को और बढ़ाने का मालिकों का खेल है। पत्रकारों की हालत मनरेगा के मजदूरों से भी खराब हो चली है। मुट्ठी भर पैसे देकर बोरी उठाने से भी ज्यादा मेहनत करवाता है मैनेजमेंट, या यूं कहें मैनेजमेंट के टुकड़ों पर पलने वाले संपादक। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूंगी।

ये सब कहने की बात है कि मीडिया में माहौल खराब है या मंदी की वजह से छंटनी हो रही है। ये सब मुनाफे को और बढ़ाने का मालिकों का खेल है। पत्रकारों की हालत मनरेगा के मजदूरों से भी खराब हो चली है। मुट्ठी भर पैसे देकर बोरी उठाने से भी ज्यादा मेहनत करवाता है मैनेजमेंट, या यूं कहें मैनेजमेंट के टुकड़ों पर पलने वाले संपादक। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूंगी।

हाल ही में ABP News जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में ऐसे शख्स को बतौर एंकर नौकरी मिली है जिसे एंकरिंग की ABCD नहीं आती और ना ही उसने अपने करियर में कभी एंकरिंग की। हर खबर पर हांफने वाले उस बंदे ने एक दिन देश की खराब अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लाइव बुलेटिन में ही कह दिया कि "इन दिन अर्थव्यवस्था की बैंड बजी हुई है"…भला सोचिए ये कोई भाषा होती है नेशनल चैनल की।

इसी एंकर ने एक दिन कहा कि "आईए अब आपको राज्यसभा लिए चलते हैं जहां डिफेंस मिनिस्टर का बयान करवाया जा रहा है।"  जिसे ये भी नहीं पता कि ऑन एयर और ऑफ एयर की भाषा में क्या डिफरेंस है। वो तथाकथित राजनीतिक तौर पर सजग चैनल का एंकर बन गया है। किसी एंकर के पास जानकारी का अभाव हो ये तो चल भी जाएगा लेकिन जिसे स्पष्ट बोलना ना आता हो, जिसे सेंटेंस फोर्मेशन का ना पता हो, वो सिर्फ जुगाड़ के दम पर ABP NEWS जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी पा जाता है ।

अच्छे अच्छे एंकर संपादकों के चक्कर लगाते रह जाते हैं, उन्हें मिलने का एप्यांटमेंट तक नहीं मिलता। हद तो ये कि जिस एंकर का मैं यहां जिक्र कर रही हूं वो लखटकिया क्लब में शामिल हैं। मतलब साफ है मीडिया में कोई मंदी नहीं बल्कि मनमानी है। जिसका कोई माई बाप नहीं, वो तलवार की धार पर चलते हुए नौकरी करता है और जिसके बापों की कमी नहीं, हकला भी एंकर बन जाता है।

कहा तो ये भी जा रहा है कि IBN में जो छंटनी हुई है, एक खास गुट के लोगों पर ही गाज गिरी है। सोचिए भला चुनावी साल में किसी मीडिया हाउस को नुकसान हो सकता है। आधे घंटे के बुलेटिन में 16 से 18 मिनट के इन दिनों कर्मशियल चलते हैं। दुर्भाग्य है इस देश का दूसरों को राह दिखाने वाले मीडिया का ये चेहरा सामने आ रहा है और मुझे लगता है इस हालत के लिए संपादकों की वो टोली जिम्मेदार है जो मालिकों के आगे नंबर बढ़ाने के लिए मीनिमम कर्मचारी से काम करवाने पर हामी भर देते हैं। करें भी तो क्या आखिर उन्हें लाखों रुपए जो मिलते हैं। इन लोभियों – स्वार्थियों ने मीडिया का भविष्य दाव पर लगा दिया है…अफसोस

एक महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. उन्होंने खुद का नाम प्रकाशित न करने का अनुरोध किया है.

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