गोदौलिया प्रकरणः संदीप की लड़ाई उसका अखबार लड़े न लड़े, आईसीएन मीडिया ग्रुप उसके साथ है

मिर्ची। अपने कंधे पर जनसुरक्षा का दायित्व उठाने की सौगंध लिए घूम रही पुलिस ने जमीन छोड़ दिया है। शब्दों को अक्षरशः परिभाषित कर रही है जिले के दशाश्वमेघ थाने की पुलिस। नैतिकता, मानवाधिकार, और मानवीय संवेदनाओ को ताख पर रख चुकी पुलिस अपनी कार्यप्रणाली को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहती है। अमानवीय चेहरा दिखाते हुए दशाश्वमेघ थाने के गोदौलिया चौराहे पर दो पुलिसकर्मियों ने आम जनता को अपने कोपभाजन का शिकार बनाने के साथ-साथ मीडियाकर्मी संदीप त्रिपाठी, भाई अरुण त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार और संदीप त्रिपाठी के चाचा राजनाथ त्रिपाठी पर ताबड़तोड़ डंडे का प्रयोग, वर्दी का रौब, नियम कानून की धज्जिया उड़ाने के बाद दिखा दिया कि असली गुंडे हम है।

जनविरोध हुआ मौके पर क्षेत्राधिकारी डीपी शुक्ल थाना प्रभारी निरीक्षक वीके सिंह पहुचे। एकत्र मीडियाकर्मियों के दबाव में एसएसपी जोगेंद्र कुमार ने चौराहे पर लगे सीसीटीवी फुटेज और मामले के सन्दर्भ में रिपोर्ट संग क्षेत्राधिकारी डीपी शुक्ल को तलब किया। हो-हंगामा घंटो की किचकिच और मत्थापच्ची के बाद निष्कर्ष निकला कि दोष मीडियाकर्मी संदीप त्रिपाठी का है। नैतिकता के आधार पर हम भी मानते है की संदीप दोषी है। उसने कार में पड़ी अपनी अस्वस्थ माँ का हवाला पुलिसकर्मियों को दिया बताया की वह पैदल घर तक नही जा सकती। लिहाजा कार ले जाने की अनुमति प्रदान करे। पुलिसकर्मी अपनी जगह पर बिलकुल सही है। चितपरिचित अंदाज में इन्होने जबाब दिया संदीप के साथ बदसलूकी की। माँ-बहन को देख लेने की बात कही।

शाश्वत सत्य तो यही है कि आम आदमी के साथ पुलिस का रवैया ऐसा ही होता है। यह बात बड़े-बड़ो ने मानी है। संदीप त्रिपाठी का बताना भारी पड़ा कि मै मीडियाकर्मी हूं क्राइम बीट पर काम करता हुं। 99 प्रतिशत मै आपको कापरेट करने के ऐवज में 1 प्रतिशत कॉपरेशन की भावना रखता हुं। यह गलती संदीप को नही करनी चाहिए थी। मौके पर 100-50 का नोट निकालकर पुलिसकर्मियों को अगर वह दे देता तो इतना बड़ा बखेड़ा न खड़ा होता। पुलिस की अच्छाई की उन्होंने डंडे का रौब और तेवर संदीप को दिखाया और समझाया। हाल-फिलहाल संदीप त्रिपाठी का हाँथ फैक्चर है। कलम का सिपाही अब कई महिनो तक कलम न उठा पाएगा क्योंकि उसका हाथ टूट चूका है। पुलिस महकमा लामबद हो चूका है होना भी चाहिए पुलिसकर्मियों की बात है।

थूकते हैं हम पत्रकारों के मुंह पर। पुलिसकर्मियों से प्रेरणा लें कि अपनों की लड़ाई कैसे लड़ी जाती है। गलत और सही मायने नहीं रखता, मायने रखता है संदीप पत्रकार है। संदीप के हित की लड़ाई उसका अखबार लड़े या न लड़े, लाख गलती होने के बाबजुद आईसीएन मीडिया ग्रुप संदीप त्रिपाठी के साथ है। जरुरत पड़ी तो मौके पर जुत्तमपैजार होगा। मुकदमेबाजी से पार्टी नही डरती। उदाहरण चंद दिनों में सबके सामने होगा। मीडिया हाउसो के मालिकान का भला न चाहकर हम चाहते है भला कर्मचारियों का। अंततः वही बात, जय ही हो।

 

भड़ास को भेजा गया पत्र।
 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *